नेपाल या चीन: भोटेकोशी में आई भीषण तबाही के लिए कौन है असली जिम्मेदार?
नेपाल की भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ और चीन के साथ जारी कूटनीतिक विवाद की पूरी जानकारी। जानें क्या थे बाढ़ के मुख्य कारण।
नेपाल में बुधवार 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी में अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। इस प्राकृतिक आपदा ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। सरकार द्वारा जारी शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, इस जल प्रलय के कारण देश के बुनियादी ढांचे को भारी चोट पहुंची है और लगभग 15 अरब रुपये का इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से नष्ट हो गया है। जान-माल का नुकसान भी अत्यंत दुखद है, जिसमें 200 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है और 1000 से अधिक लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। इस आपदा के बाद अब काठमांडू से लेकर बीजिंग तक इस बात पर बहस छिड़ गई है कि इस तबाही का असली जिम्मेदार कौन है।
बाढ़ के कारणों को लेकर तीन प्रमुख थ्योरी
नेपाल में आई इस भयावह बाढ़ के पीछे वर्तमान में तीन मुख्य थ्योरी पर चर्चा हो रही है। पहली थ्योरी के अनुसार, तिब्बत के ग्योरिंग के पास एक बड़ी लैंडस्लाइड यानी भूस्खलन की घटना हुई, जिसके कारण वहां मौजूद ग्लेशियर टूट गया और उसका पानी तेजी से नीचे की ओर बहा। दूसरी थ्योरी भूकंप से जुड़ी है और इसके मुताबिक, तिब्बत में आए भूकंप के कारण लैंडस्लाइड हुआ, जिसने वहां स्थित एक झील के डैम को तोड़ दिया। डैम के टूटने से पानी का एक बड़ा विस्फोट हुआ जो बाढ़ का रूप ले लिया।
तीसरी थ्योरी यह बताती है कि भूकंप पहले नेपाल में आया था। इस भूकंप के कारण नेपाल के भीतर ही लैंडस्लाइड हुआ, जिससे नदी का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध हो गया। मार्ग बंद होने के कारण पानी ने अपना रास्ता बदल लिया और भोटेकोशी क्षेत्र में भीषण जल प्रलय की स्थिति पैदा हो गई। इन तीनों थ्योरी के बीच नेपाल और चीन एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं।
चीन पर जानकारी छिपाने और देरी करने का आरोप
इस पूरे मामले में नेपाल ने चीन पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। नेपाल का कहना है कि चीन ने बाढ़ और जल स्तर बढ़ने की जानकारी देने में 45 मिनट की देरी की। नेपाल के अनुसार, यदि यह जानकारी समय पर मिल जाती, तो हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकता था और मौतों का आंकड़ा कम हो सकता था। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड ने इस घटना के बाद सूचना साझा करने की प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाने की पुरजोर मांग की है। नेपाल में हुई एक सर्वदलीय बैठक में सभी राजनीतिक दलों ने एक स्वर में कहा कि जब तक सूचना तंत्र को दुरुस्त नहीं किया जाएगा, ऐसी आपदाओं से निपटना मुश्किल होगा। उन्होंने भारत, चीन और नेपाल के बीच मौसम पूर्वानुमान साझा करने के लिए एक साझा चैनल बनाने का सुझाव दिया है।
खतरनाक हिमनद झीलें और वैज्ञानिक रिपोर्ट
अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (आईसीआईएमओडी) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की एक विस्तृत रिपोर्ट ने इस खतरे की गंभीरता को उजागर किया है और रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल और चीन की सीमा के पास कुल 3624 हिमनद झीलें मौजूद हैं। इनमें से 47 झीलों को अत्यंत खतरनाक श्रेणी में रखा गया है, जबकि 8 झीलों को विस्फोटक माना गया है। विशेष बात यह है कि ये सभी 8 विस्फोटक झीलें चीन के क्षेत्र में स्थित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जो झील फटी है, वह भी चीन के हिस्से में ही थी, हालांकि चीन ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
भूकंप के केंद्र को लेकर विरोधाभास
बाढ़ की शुरुआत करने वाले भूकंप के स्थान को लेकर भी नेपाल और चीन के बीच मतभेद हैं और नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने जानकारी दी कि भूकंप के बाद ही लैंडस्लाइड की घटना हुई थी, लेकिन उन्होंने भूकंप के सटीक स्थान का जिक्र नहीं किया। इसके विपरीत, चीनी दूतावास ने एक बयान जारी कर दावा किया कि भूकंप नेपाल में ही आया था और लैंडस्लाइड की घटना भी नेपाल की सीमा के भीतर ही हुई थी। वहीं, नेपाल टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, हिमस्खलन 7245 मीटर ऊंचे लांगटांग लिरुंग पर्वत के उत्तरी हिस्से में हुआ था, जो नेपाल में स्थित है। इस भूस्खलन ने लैंडे नदी का रास्ता रोक दिया था, जिसकी सूचना नेपाल को काफी देर बाद चीन के माध्यम से प्राप्त हुई।
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