सुभाष चंद्रा का 22006 करोड़ का कर्ज 6.5 करोड़ में सेटल, NCLT ने दी मंजूरी
NCLT ने सुभाष चंद्रा के 22006 करोड़ 57 लाख रुपये के कर्ज को 6 करोड़ 50 लाख रुपये में सेटल करने की मंजूरी दी। LIC हाउसिंग फाइनेंस को हुआ भारी नुकसान।
देश के बैंकिंग सिस्टम में आम आदमी और बड़े उद्योगपतियों के लिए अलग-अलग मापदंडों की कड़वी सच्चाई एक बार फिर सामने आई है। जहां एक तरफ बैंक की एक ईएमआई चूकने पर आम आदमी को रिकवरी एजेंटों का सामना करना पड़ता है, वहीं मीडिया जगत के दिग्गज सुभाष चंद्रा के मामले में सिस्टम का रुख बेहद नरम दिखा है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत दिवालिया समाधान प्रक्रिया के तहत एक चौंकाने वाला फैसला सुनाया है। चंद्रा पर कुल 22006 करोड़ 57 लाख रुपये का भारी-भरकम कर्ज बकाया था, जिसे चुकाने के लिए उन्होंने केवल 6 करोड़ 50 लाख रुपये का सेटलमेंट प्लान पेश किया था। 97 प्रतिशत पैसे से हाथ धोना पड़ेगा।
कानूनी प्रक्रिया और ट्रिब्यूनल का फैसला
यह पूरा मामला इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की धारा 114 के तहत निपटाया गया है। इस मामले की सुनवाई के दौरान शुरुआत में दो सदस्यों वाली मूल बेंच के जजों के बीच एक राय नहीं बन पाई थी। इसके समाधान के लिए नीलेश शर्मा को तीसरे न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया था। उनके फैसले के बाद ही इस विवादित सेटलमेंट प्लान पर अंतिम मुहर लग सकी। एक तरफ जहां देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ 22 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज महज कुछ करोड़ रुपये में रफा-दफा कर दिया गया। यह फैसला मौजूदा दिवालिया कानून की उन खामियों को भी उजागर करता है, जिनका फायदा बड़े डिफाल्टर उठा सकते हैं।
LIC हाउसिंग फाइनेंस को लगा सबसे बड़ा झटका
इस सेटलमेंट प्रक्रिया में सबसे अधिक नुकसान सरकारी संस्थान LIC हाउसिंग फाइनेंस को उठाना पड़ा है। LIC हाउसिंग फाइनेंस ने सुभाष चंद्रा के इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया था, लेकिन उनकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया गया। संस्थान का कुल दावा 1322 करोड़ 39 लाख रुपये का था। नए स्वीकृत प्लान के अनुसार, उन्हें इस भारी-भरकम राशि के बदले केवल 38 लाख 9 हजार रुपये ही दिए जाएंगे। 028 प्रतिशत हिस्सा है। LIC हाउसिंग फाइनेंस ने ट्रिब्यूनल के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा था कि यह सेटलमेंट प्लान पूरी तरह से गैर-व्यावहारिक और गैर-कानूनी है, लेकिन बहुमत के आगे उनकी एक न चली।
ट्रिब्यूनल द्वारा मंजूरी देने का मुख्य कारण
NCLT ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि उसने LIC हाउसिंग फाइनेंस की बात क्यों नहीं मानी। ट्रिब्यूनल के अनुसार, विरोध करने वाले कर्जदाताओं का कुल वोटिंग शेयर 20 प्रतिशत से भी कम था। 81 प्रतिशत बहुमत वाले कर्जदाताओं ने अपनी मर्जी से इस 6 करोड़ 50 लाख रुपये के सेटलमेंट प्लान को पास किया था। रेजोल्यूशन प्रोफेशनल की रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि सुभाष चंद्रा की निजी संपत्ति की कुल कीमत 6 करोड़ 50 लाख रुपये से भी कम है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि वह कर्जदाताओं के व्यापारिक फैसले यानी कमर्शियल विजडम में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। NCLT का मुख्य कार्य कानूनी प्रक्रिया की निगरानी करना है, न कि कर्जदाताओं के लाभ या हानि का आकलन करना।
विरोध करने वाले संस्थानों की मजबूरी और बाजार का हाल
सिस्टम की विडंबना यह है कि जिन संस्थानों ने इस प्लान का विरोध किया था, उन्हें भी अब इसे मानने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। NCLT ने IBC की धारा 115 का हवाला देते हुए साफ किया कि एक बार मंजूर होने के बाद यह प्लान सभी कर्जदाताओं पर समान रूप से लागू होता है। अब विरोध करने वाले संस्थान वसूली के लिए अलग से कोई कानूनी लड़ाई नहीं लड़ पाएंगे। रेजोल्यूशन प्रोफेशनल अब बकायेदारों की अंतिम सूची तैयार करेंगे, जिसके बाद औपचारिक आदेश जारी होगा। इस भारी कर्ज माफी के बीच शेयर बाजार में ज़ी एंटरटेनमेंट के शेयरों में तेजी देखी गई। 43 प्रतिशत की बढ़त के साथ 104 रुपये 85 पैसे पर कारोबार कर रहे थे। पिछले छह महीनों में इस स्टॉक में लगभग 20 प्रतिशत का उछाल आया है।
What's Your Reaction?