FII Selling: 3 दिन में ₹29,613 करोड़ की भारी बिकवाली, जानें विदेशी निवेशकों के बाहर निकलने की वजह
विदेशी निवेशकों ने 3 दिनों में भारतीय बाजार से 29,613 करोड़ रुपये निकाले। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, 100 डॉलर का कच्चा तेल और 13 प्रतिशत मानसून घाटा इसकी मुख्य वजह हैं।
भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई (FII) की बिकवाली का सिलसिला एक बार फिर बेहद तेज हो गया है। पिछले केवल तीन कारोबारी दिनों के भीतर विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार से लगभग 29,613 करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि निकाल ली है। इस बिकवाली ने बाजार के सेंटिमेंट पर गहरा असर डाला है और निवेशकों के बीच चिंता की लहर पैदा कर दी है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 में अब तक विदेशी निवेशकों द्वारा की गई कुल बिकवाली का आंकड़ा लगभग 4 लाख 3 हजार करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच चुका है, जो भारतीय बाजार के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है।
तीन दिनों में 30 हजार करोड़ रुपये के करीब निकासी
विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि निकासी की रफ्तार कितनी तेज है। एफआईआई ने 29 सितंबर को 9,980 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की। इसके अगले ही दिन यानी 30 सितंबर को यह आंकड़ा और बढ़ गया और निवेशकों ने 10,148 करोड़ रुपये बाजार से निकाल लिए। बिकवाली का यह दौर अक्टूबर महीने की शुरुआत में भी जारी रहा, जहां 1 अक्टूबर को 9,484 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली दर्ज की गई। इस प्रकार, केवल इन तीन दिनों के भीतर ही कुल 29,612 करोड़ और 85 लाख रुपये भारतीय शेयरों से बाहर निकल गए हैं।
वर्ष 2026 का पूरा कैलेंडर वर्ष अब तक विदेशी निवेशकों की बिकवाली के साये में रहा है। जनवरी से लेकर सितंबर तक के हर महीने में एफआईआई नेट सेलर यानी शुद्ध बिकवाल रहे हैं। अकेले सितंबर के महीने में ही लगभग 44,013 करोड़ रुपये की बिकवाली देखी गई थी। इससे पहले मार्च के महीने में बिकवाली का सबसे भयावह रूप देखने को मिला था, जब यह आंकड़ा 1 लाख 22 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा दर्ज किया गया था। अक्टूबर की शुरुआत भी इसी नकारात्मक रुझान के साथ हुई है, जो बाजार के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी है मुख्य कारण
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से हाथ खींचने के पीछे सबसे बड़ी और प्रमुख वजह अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में हो रही लगातार बढ़ोतरी है और अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड वर्तमान में लगभग 5 दशमलव 34 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह स्तर पिछले कई दशकों के उच्चतम स्तरों में से एक माना जा रहा है। जब अमेरिकी बॉन्ड से डॉलर में मिलने वाला रिटर्न बढ़ने लगता है, तो वैश्विक निवेशक उभरते बाजारों जैसे कि भारत से अपनी पूंजी निकालकर सुरक्षित निवेश के तौर पर अमेरिका की ओर ले जाने लगते हैं।
इसके साथ ही डॉलर इंडेक्स भी मजबूती दिखा रहा है और यह 101 से 102 के दायरे में पहुंच गया है। डॉलर की इस मजबूती और बॉन्ड यील्ड में उछाल ने एफआईआई आउटफ्लो को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में स्थिरता नहीं आती, तब तक उभरते बाजारों पर बिकवाली का यह दबाव बना रह सकता है।
100 डॉलर के पार कच्चा तेल और वैश्विक तनाव
भारत के लिए दूसरी सबसे बड़ी चिंता का विषय कच्चे तेल की कीमतों में हो रहा इजाफा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें लंबे समय से 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने तेल की कीमतों में आग लगाने का काम किया है। आंकड़ों के मुताबिक, इस साल अब तक कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 65 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
चूंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए तेल की कीमतों में होने वाली हर बढ़ोतरी भारत के आयात बिल को बढ़ा देती है। महंगा कच्चा तेल न केवल देश में महंगाई को बढ़ावा देता है, बल्कि यह भारतीय रुपये पर भी दबाव डालता है। बाजार विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर के ऊपर बनी रहती हैं, तो इसका सीधा असर भारत की आर्थिक वृद्धि दर और भारतीय कंपनियों की कमाई पर पड़ सकता है, जिससे निवेशकों का भरोसा डगमगा रहा है।
कमजोर मानसून और घरेलू चुनौतियां
विदेशी निवेशकों की चिंता केवल वैश्विक कारणों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि घरेलू स्तर पर भी कुछ चुनौतियां सामने आ रही हैं। इस साल मानसून के प्रदर्शन ने निवेशकों को निराश किया है। आंकड़ों के अनुसार, इस साल मानसून में लगभग 13 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। देश के कुछ राज्यों में कम बारिश के कारण सूखे जैसे हालात पैदा होने की आशंका जताई गई है।
मानसून में इस कमी का सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ने की संभावना है। कम पैदावार होने से खाद्य वस्तुओं की कीमतों में उछाल आ सकता है, जिससे देश में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और कमजोर मानसून के इस दोहरे झटके ने भारतीय रुपये की स्थिति और व्यापार घाटे को लेकर भी चिंताएं बढ़ा दी हैं और विदेशी निवेशक इन परिस्थितियों को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम के रूप में देख रहे हैं।
आरबीआई की आगामी बैठक पर टिकी नजरें
अब बाजार के सभी भागीदारों की नजरें भारतीय रिजर्व बैंक की आगामी मौद्रिक नीति समिति की बैठक पर टिकी हुई हैं और निवेशक यह देखना चाहते हैं कि केंद्रीय बैंक इन बदलती आर्थिक परिस्थितियों और महंगाई के दबाव से निपटने के लिए क्या कदम उठाता है। इसके अलावा, निवेशक अमेरिकी बॉन्ड यील्ड की दिशा, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, रुपये की चाल और मानसून की अंतिम स्थिति जैसे महत्वपूर्ण संकेतकों पर भी अपनी पैनी नजर बनाए रखेंगे। एफआईआई की बिकवाली का यह दौर कब थमेगा, यह काफी हद तक इन वैश्विक और घरेलू आर्थिक कारकों में आने वाले सुधारों पर निर्भर करेगा।
What's Your Reaction?