क्रिटिकल मिनरल्स पर चीन का एकाधिकार खत्म करेगा भारत, 20 अरब डॉलर की क्वाड डील और 34300 करोड़ का मिशन शुरू
भारत ने ईवी और स्मार्टफोन के लिए क्रिटिकल मिनरल्स में चीन के एकाधिकार को खत्म करने के लिए 34300 करोड़ रुपये का मिशन और 20 अरब डॉलर की क्वाड डील शुरू की है।
भारत ने क्रिटिकल मिनरल्स यानी दुर्लभ खनिजों के क्षेत्र में चीन के लंबे समय से चले आ रहे एकाधिकार को खत्म करने के लिए एक व्यापक मास्टरप्लान तैयार कर लिया है। इलेक्ट्रिक वाहनों, स्मार्टफोन, विंड टर्बाइन से लेकर सेना की मिसाइलों तक, आज की हर आधुनिक तकनीक इन्हीं दुर्लभ खनिजों पर टिकी हुई है। इस रणनीतिक कमजोरी को पहचानते हुए भारत अब खनिज प्रोसेसिंग के एक नए वैश्विक केंद्र के रूप में खुद को स्थापित कर रहा है। इस महत्वाकांक्षी बदलाव को क्वाड देशों के साथ 20 अरब डॉलर के बड़े समझौते और 34300 करोड़ रुपये के घरेलू मिशन का समर्थन प्राप्त है, जिसका उद्देश्य चीन पर निर्भरता को हमेशा के लिए समाप्त करना है।
क्वाड क्रिटिकल मिनरल्स इनिशिएटिव फ्रेमवर्क
एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक कदम के तहत, क्वाड देशों जिसमें भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं, ने हाल ही में नई दिल्ली में 20 अरब डॉलर के क्वाड क्रिटिकल मिनरल्स इनिशिएटिव फ्रेमवर्क पर अपनी मुहर लगा दी है। इस भारी-भरकम निवेश का मुख्य उद्देश्य खनन, प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग के लिए एक मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार करना है। वैश्विक सप्लाई चेन को सुरक्षित करके, यह पहल भारत को चीन के एक मजबूत विकल्प के रूप में खड़ा करना चाहती है। इस सहयोग को वर्तमान बाजार की स्थितियों के जवाब के रूप में देखा जा रहा है, जहां एक ही देश का आवश्यक संसाधनों पर अत्यधिक नियंत्रण है।
चीन के रणनीतिक कब्जे को तोड़ने की तैयारी
इस मिशन की तात्कालिकता चीन के वैश्विक बाजार पर अत्यधिक नियंत्रण से उत्पन्न होती है। वर्तमान में, दुनिया भर में दुर्लभ खनिजों की रिफाइनिंग क्षमता का 80 फीसदी हिस्सा अकेले चीन नियंत्रित करता है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि इलेक्ट्रिक वाहनों और रक्षा प्रौद्योगिकियों के लिए महत्वपूर्ण परमानेंट मैग्नेट के उत्पादन में चीन की हिस्सेदारी 94 फीसदी है। साल 2023 में, चीन ने इस एकाधिकार का लाभ उठाते हुए इन खनिजों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिए थे। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि ऐसी महत्वपूर्ण तकनीक को किसी एक देश की दादागिरी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी खनन से लेकर प्रोसेसिंग तक पूरी सप्लाई चेन में आपसी सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
भारत का वैश्विक रणनीतिक विस्तार
चीन का मुकाबला करने के लिए, नई दिल्ली ने देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खदानों की अपनी खोज तेज कर दी है। कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए, जनवरी 2024 में सरकारी कंपनी काबिल (KABIL) ने अर्जेंटीना में लिथियम ब्लॉक के लिए अपना पहला विदेशी समझौता किया। इसके अलावा, अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री की जापान यात्रा के दौरान क्रिटिकल मिनरल्स के संबंध में एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। ऑस्ट्रेलिया के साथ लिथियम और कोबाल्ट परियोजनाओं को लेकर भी बातचीत आगे बढ़ी है। हाल ही में, 1 जून को भारत ने दुर्लभ खनिजों के संबंध में म्यांमार के साथ महत्वपूर्ण बातचीत पूरी की है, जिससे कच्चे माल के स्रोतों में और विविधता आएगी।
प्रोसेसिंग की चुनौती और समाधान
कच्चा माल प्राप्त करना एक बड़ा कदम है, लेकिन असली चुनौती उसकी प्रोसेसिंग में है। आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि भारत आज भी अपने परमानेंट मैग्नेट का 80 से 90 फीसदी हिस्सा चीन से आयात करता है। देश की वर्तमान रिफाइनिंग क्षमता घरेलू मांग के 25 फीसदी से भी कम है। हालांकि केरल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में इन खनिजों से भरपूर मोनाज़ाइट सैंड्स मौजूद हैं, लेकिन उनमें थोरियम और यूरेनियम भी होता है। परिणामस्वरूप, ये संसाधन परमाणु ऊर्जा कानून के अंतर्गत आते हैं, जिसका अर्थ है कि निजी कंपनियों को इनके प्रसंस्करण की अनुमति नहीं है और यह कार्य केवल सरकारी संस्थाओं के पास है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को नई खदानें खोलने के साथ-साथ धातु-से-मिश्र धातु (मेटल-टू-अलॉय) परिवर्तन क्षमता को तेजी से बढ़ाना होगा।
34300 करोड़ रुपये का राष्ट्रीय मिशन
इन घरेलू बाधाओं को दूर करने के लिए, सरकार ने जनवरी 2025 में 34300 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन को मंजूरी दी। इसके अतिरिक्त, वित्त वर्ष 2027 के बजट में चार राज्यों में रेयर अर्थ कॉरिडोर बनाने की घोषणा की गई। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) अब पारंपरिक खनन क्षेत्रों से आगे बढ़कर आधुनिक तकनीक का उपयोग करके राजस्थान, गुजरात और असम के नए क्षेत्रों में खोज कर रहा है और विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि कोई भी देश क्रिटिकल मिनरल्स में 100 फीसदी आत्मनिर्भर नहीं हो सकता, लेकिन अगर भारत अगले दशक तक क्वाड भागीदारों के साथ लगातार निवेश करता है, तो वह चीन का एक बड़ा विकल्प बन सकता है। इससे न केवल भारत की रणनीतिक सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि उपभोक्ताओं के लिए इलेक्ट्रिक वाहन और इलेक्ट्रॉनिक्स सामान भी सस्ते हो सकेंगे।
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