मंगल ग्रह के रहस्यों से उठेगा पर्दा: जापान का ऐतिहासिक MMX मिशन फोबोस से लाएगा मिट्टी, दुनिया हैरान
जापान का MMX मिशन मंगल के चंद्रमा फोबोस से मिट्टी और चट्टानों के नमूने लाने के लिए रवाना हो गया है। जानिए इस ऐतिहासिक 2031 अंतरिक्ष अभियान की पूरी विस्तृत जानकारी।
मंगल ग्रह के सबसे बड़े और रहस्यमयी चंद्रमा फोबोस के रहस्यों को सुलझाने और वहां से अनमोल नमूने सीधे धरती पर लाने के लिए जापान का एक अत्याधुनिक अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष की अथाह गहराइयों में मंगल ग्रह की ओर रवाना हो चुका है। पांच साल तक चलने वाले इस बेहद साहसिक और ऐतिहासिक मिशन में दुनिया की कुल पांच अंतरिक्ष एजेंसियां आपसी सहयोग के साथ मिलकर काम कर रही हैं और इस महत्वाकांक्षी अभियान के तहत वैज्ञानिक मंगल ग्रह के दो छोटे प्राकृतिक उपग्रहों में से बड़े और करीब स्थित चंद्रमा फोबोस की सतह पर एक उन्नत रोबोटिक प्रोस्पेक्टर और एक विशेष रोवर को उतारने का प्रयास करेंगे।
इस पूरे अंतरिक्ष अभियान का नेतृत्व देश की प्रमुख अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी यानी JAXA द्वारा किया जा रहा है। एजेंसी ने तनेगाशिमा द्वीप पर स्थित देश के मुख्य स्पेसपोर्ट से मंगलवार यानी 20 अक्टूबर की सुबह इस विशाल अंतरिक्ष यान को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है। इस अनोखे और चुनौतीपूर्ण अभियान का आधिकारिक नाम मार्शियन मून्स एक्सप्लोरेशन यानी MMX रखा गया है। इस पूरे अंतरिक्ष मिशन पर कुल मिलाकर 57 करोड़ 80 लाख डॉलर खर्च होने का अनुमान लगाया गया है, जो अंतरिक्ष अनुसंधान के इतिहास में एक बड़ा निवेश माना जा रहा है।
अंतरिक्ष इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी चुनौती
अंतरिक्ष अन्वेषण के पिछले 50 वर्षों के इतिहास पर नजर डालें तो अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने अब तक मंगल ग्रह की सतह पर सफलतापूर्वक कुल नौ अंतरिक्ष यान उतारे हैं, जबकि वर्ष 2021 में चीन ने भी अपने अंतरिक्ष यान को सफलतापूर्वक मंगल की धरती पर उतारा था। इसके बावजूद आज तक दुनिया का कोई भी देश मंगल ग्रह के किसी भी चंद्रमा यानी फोबोस या उसके साथी चंद्रमा डीमोस तक पहुंचने में कामयाब नहीं हो पाया है। इसके साथ ही, मंगल ग्रह या उसके किसी भी चंद्रमा की सतह से मिट्टी और चट्टानों के नमूने वापस धरती पर लाने की सफलता भी अब तक किसी भी देश को नहीं मिल पाई है।
यही कारण है कि अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में इस मिशन को बेहद खास माना जा रहा है। अगर जापान का यह मार्शियन मून्स एक्सप्लोरेशन मिशन अपनी योजना के अनुसार पूरी तरह सफल रहता है, तो वर्ष 2031 तक फोबोस की प्राचीन धूल, मिट्टी और ठोस चट्टानों के अनमोल नमूने सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर पहुंच जाएंगे। इतिहास में यह पहला ऐसा मौका होगा जब मंगल ग्रह के किसी चंद्रमा से नमूने लाकर धरती की आधुनिक प्रयोगशालाओं में उनका गहन अध्ययन किया जाएगा। देश-विदेश के वैज्ञानिकों को पूरी उम्मीद है कि इन नमूनों के अध्ययन से मंगल के चंद्रमाओं की उत्पत्ति और हमारे सौरमंडल के ग्रहों के निर्माण से जुड़े अनगिनत रहस्यों को सुलझाने में अभूतपूर्व मदद मिलेगी।
एस्टेरॉयड से नमूने लाने का जापान का पुराना अनुभव
इस प्रोजेक्ट से जुड़े अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के जाने-माने खगोल भौतिक विज्ञानी यानी एस्ट्रोफिजिसिस्ट टॉम स्टैटलर ने अपने बयान में कहा है कि इस पूरे अभियान में बहुत सारा रोमांच, असीम उत्साह और अद्भुत आश्चर्य छिपा हुआ है। जापान के पास इस विशिष्ट क्षेत्र में एक बड़ी रणनीतिक बढ़त हासिल है, क्योंकि वह अंतरिक्ष अनुसंधान के इतिहास में पहले ही दो बार क्षुद्रग्रहों यानी एस्टेरॉयड से सफलतापूर्वक नमूने वापस धरती पर ला चुका है। वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार फोबोस अंतरिक्ष में तैरती हुई आलू के आकार की एक अत्यंत ऊबड़-खाबड़ और प्राचीन चट्टान है, जिसका व्यास लगभग 14 मील यानी 22 किलोमीटर के आसपास है। फोबोस के इन छोटे-छोटे टुकड़ों की सूक्ष्म जांच से यह स्पष्ट रूप से पता चल सकता है कि मंगल ग्रह के चंद्रमा और शायद ब्रह्मांड की दूसरी जगहों के चंद्रमा किस प्रकार अस्तित्व में आए थे।
मार्शियन मून्स एक्सप्लोरेशन यानी MMX नाम के इस वृहद मिशन में कुल एक मुख्य अंतरिक्ष यान शामिल किया गया है, जो आगामी गर्मियों के आखिर तक अपनी लंबी यात्रा पूरी करके मंगल ग्रह तक पहुंच जाएगा। यह शक्तिशाली यान लाल ग्रह यानी मंगल के चारों ओर फोबोस की निर्धारित कक्षा में सफलताપूर्वक स्थापित हो जाएगा और फिर वहीं से एक आधुनिक फ्रांसीसी-जर्मन रोवर को फोबोस की सतह की तरफ छोड़ेगा। इस अनोखे रोवर का नाम इडेफिक्स रखा गया है, जिसका नाम लोकप्रिय एस्टेरिक्स कॉमिक्स के एक प्रसिद्ध सफेद टेरियर कुत्ते के नाम पर रखा गया है।
माइक्रोवेव ओवन से भी छोटा रोवर इडेफिक्स
आकार के मामले में एक साधारण माइक्रोवेव ओवन से भी बड़ा न होने वाला यह छोटा रोवर इडेफिक्स अंतरिक्ष में खुद ही उतरकर फोबोस की सतह को छुएगा। चूंकि फोबोस की सतह पर प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण बेहद कम है, इसलिए यह रोवर किसी ठोस स्थान पर रुकने से पहले अंतरिक्ष में कुछ मिनटों तक लगातार उछलता रहेगा। इस विशेष चार पहियों वाले रोवर को इस अनूठी तकनीक के साथ डिजाइन किया गया है कि अगर यह किसी कारणवश सतह पर उल्टा भी गिर जाए, तो भी यह अपनी आंतरिक प्रणाली की मदद से खुद को आसानी से सीधा कर सके।
हालांकि इस तकनीकी पहलू पर बोलते हुए फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी के विशेषज्ञ जूलियन बारौख ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि अगर यह रोवर किसी बहुत नरम मिट्टी में गहराई तक धंस जाता है या फिर बड़ी-बड़ी नुकीली चट्टानों के बीच बुरी तरह फंस जाता है, तो फिर इसके बचाव के बारे में कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। उन्होंने आगे बताया कि एक बार जब इस रोवर के सौर पैनल यानी सोलर पैनल अंतरिक्ष में पूरी तरह खुल जाएंगे, तो यह किसी भी स्थिति में खुद को दोबारा सीधा नहीं कर पाएगा। 04 इंच प्रति सेकंड की रफ्तार से आगे बढ़ाया जाएगा।
वैज्ञानिक जूलियन बारौख के अनुसार, यह रोवर इडेफिक्स कुल 100 दिनों तक फोबोस की सतह के चारों ओर घूमकर एक सुरक्षा स्काउट यानी जांचकर्ता की तरह बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। जापानी अंतरिक्ष एजेंसी के फ्लाइट कंट्रोलर्स यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जब वर्ष 2028 के आखिर या वर्ष 2029 में उनका मुख्य अंतरिक्ष यान यानी चार पैरों वाला स्थिर लैंडर फोबोस की सतह पर नमूने इकट्ठा करने के लिए उतरे, तो वह किसी भी प्रकार की धूल भरी मिट्टी और खतरनाक ऊबड़-खाबड़ इलाकों से सुरक्षित रूप से बच सके।
फोबोस की सतह पर केवल दो घंटे बिताएगा लैंडर
निर्धारित योजना के अनुसार मुख्य लैंडर फोबोस की सतह पर केवल दो घंटे का बेहद सीमित समय बिताएगा। इस अत्यंत अल्प काल के दौरान यह अंतरिक्ष यान सतह पर अत्याधुनिक ड्रिलिंग मशीन के जरिए छेद करेगा और कम से कम 10 ग्राम सामग्री या मिट्टी को सफलताપूर्वक इकट्ठा करेगा। आवश्यक सामग्री एकत्र करने के तुरंत बाद यह लैंडर तेजी से वापस अंतरिक्ष की कक्षा में रवाना हो जाएगा। इसके बाद वर्ष 2030 में मंगल ग्रह के आसपास के इस संपूर्ण इलाके को पूरी तरह छोड़ने से पहले, यह यान कई बार फ्लाईबाय यानी पास से गुजरने की वैज्ञानिक प्रक्रिया के माध्यम से मंगल के दूसरे चंद्रमा डीमोस का भी विस्तृत अध्ययन करेगा। इसके बाद यह यान अपनी तीव्र गति से पृथ्वी की ओर वापसी की यात्रा शुरू करेगा, ताकि वर्ष 2031 के दौरान ऑस्ट्रेलिया के विशाल रेगिस्तान में इन अनमोल नमूनों को सुरक्षित रूप से गिराया जा सके।
अत्यंत जोखिम भरा और चुनौतीपूर्ण अभियान
यह पूरा अंतरिक्ष अभियान तकनीकी रूप से एक बेहद जोखिम भरा और खतरनाक सफर है, जिसके अंतरिक्षीय मार्ग में पहले से ही अंतरिक्ष के कई टूटे-फूटे मलबे और उल्कापिंडों के अवशेष बिखरे पड़े हैं। दिलचस्प बात यह है कि मंगल ग्रह के इन दोनों चंद्रमाओं के नाम भी अंतरिक्ष विज्ञान में कुछ खास सुकून देने वाले नहीं हैं। प्राचीन ग्रीक पौराणिक कथाओं के अनुसार फोबोस शब्द का शाब्दिक अर्थ डर होता है, जबकि डीमोस शब्द का शाब्दिक अर्थ खौफ माना जाता है। ये दोनों ही पौराणिक कथाओं में युद्ध के देवता एरेस यानी रोमन पौराणिक कथाओं में मार्स या मंगल कहे जाने वाले देवता के जुड़वां बेटे के रूप में जाने जाते हैं।
अंतरिक्ष इतिहास गवाह है कि रूस को फोबोस से जुड़े अपने तीनों महत्वपूर्ण अभियानों में और मंगल ग्रह से जुड़े कई अन्य अंतरिक्ष अभियानों में भी लगातार भारी असफलता का सामना करना पड़ा है। इसके अलावा जापान के इतिहास के एक अन्य मंगल मिशन में भी उनका अंतरिक्ष यान इस लाल ग्रह की निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक पहुंचने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ था। यहाँ तक कि शक्तिशाली अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा को भी इस बेहद अहम वैज्ञानिक सवाल का सटीक जवाब खोजने की कोशिश में अपने कई अभियानों में असफलता का कड़वा घूंट पीना पड़ा है कि क्या ब्रह्मांड में कभी मंगल ग्रह पर भी जीवन का अस्तित्व मौजूद था या नहीं।
मंगल के चंद्रमाओं की उत्पत्ति के अनसुलझे रहस्य
वैज्ञानिकों का मानना है कि मंगल ग्रह के इन दोनों चंद्रमाओं का सूक्ष्म अध्ययन करके वे इस बात का ठोस पता लगाने की उम्मीद कर रहे हैं कि क्या फोबोस और डीमोस का निर्माण आज से अरबों वर्ष पहले मंगल ग्रह और किसी अंतरिक्षीय चट्टान यानी एस्टेरॉयड के बीच हुई किसी भीषण टक्कर के परिणामस्वरुप हुआ था या नहीं। इसके अलावा यह संभावना भी पूरी तरह से संभव है कि ये दोनों चंद्रमा असल में ब्रह्मांड में भटकते हुए आवारा एस्टेरॉयड हों, जो किसी समय मंगल ग्रह के विशाल गुरुत्वाकर्षण खिंचाव क्षेत्र में फंसकर इसके उपग्रह बन गए।
किसी भी वैज्ञानिक परिदृश्य में वैज्ञानिकों को यह प्रबल उम्मीद है कि फोबोस की सतह पर उन्हें मंगल ग्रह के कुछ मूल अंश और सूक्ष्म अवशेष अवश्य प्राप्त हो जाएंगे। अंतरिक्ष विज्ञान के जानकारों के अनुसार ये मिलने वाले सैंपल वास्तव में एक साथ दो लाभ यानी दो-में-एक का एक बेहतरीन और दुर्लभ मौका साबित होंगे, जो ग्रहों और चंद्रमाओं के बनने की जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया के साथ-साथ शायद इस ब्रह्मांड में जीवन की उत्पत्ति के गहरे रहस्यों को समझने में भी बहुत बड़ी मदद कर सकते हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की कार्यवाहक प्लैनेटरी साइंस डायरेक्टर लिंडसे हेस ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों वाले मानव मिशनों सहित आने वाले सभी नए मंगल मिशनों की रूपरेखा तैयार करने में इन अनोखी खोजों की भूमिका सबसे अहम होगी।
जर्मन स्पेस एजेंसी के रोवर प्रमुख मार्कस ग्रेबेनस्टीन ने इस ऐतिहासिक अवसर पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मानव जीवन में केवल एक बार मिलने वाला दुर्लभ मौका है। हम सभी इस बात से बेहद गौरवान्वित हैं कि हम मंगल प्रणाली से अनमोल सैंपल वापस धरती पर लाने वाले दुनिया के पहले अंतरिक्ष मिशन का एक अभिन्न हिस्सा बन रहे हैं। हालांकि मंगल प्रणाली की प्राचीन चट्टानों और मिट्टी में छिपे इस अपार वैज्ञानिक खजाने को सबसे पहले हासिल करने की कोशिश करने वाला जापान अकेला देश नहीं है और एशिया की एक अन्य महाशक्ति चीन भी वर्ष 2028 के दौरान मंगल ग्रह की सतह से वैज्ञानिक सैंपल वापस धरती पर लाने के लिए एक नए स्वतंत्र मिशन को लॉन्च करने की पक्की योजना बना रहा है। दूसरी ओर अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा अभी भी इस गंभीर तकनीकी विचार-विमर्श में जुटी हुई है कि उनके प्रसिद्ध पर्सिवरेंस मार्स रोवर द्वारा जो पृथ्वी के बाहर गाड़ी चलाने के मामले में सबसे आगे है, सफलताપूर्वक इकट्ठा की गई 30 से अधिक अमूल्य सैंपल ट्यूबों को आखिर किस सुरक्षित तरीके से वापस पृथ्वी पर लाया जाए।
अंतरिक्ष की दौड़ में जापान और चीन के बीच कड़ी टक्कर
मंगल प्रणाली से वैज्ञानिक सैंपल वापस अपनी धरती पर लाने की इस ऐतिहासिक और रोमांचक वैश्विक होड़ में जापान और चीन के बीच आने वाले समय में बेहद कड़ी टक्कर देखने को मिल सकती है, क्योंकि दोनों ही देश मुख्य रूप से वर्ष 2031 के ही निश्चित लक्ष्य को सामने रखकर अपनी अंतरिक्ष तैयारियों को आगे बढ़ा रहे हैं। इस विशालकाय अंतरिक्ष मिशन में जापान अपनी तरफ से कुल 35 करोड़ डॉलर का भारी-भरकम निवेश कर रहा है। इसके साथ ही इस अंतरराष्ट्रीय सहयोग में नासा लगभग 8 करोड़ 70 लाख डॉलर, फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी लगभग 6 करोड़ 80 लाख डॉलर, जर्मन अंतरिक्ष एजेंसी लगभग 5 करोड़ 60 लाख डॉलर और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी लगभग 1 करोड़ 70 लाख डॉलर का आर्थिक और तकनीकी योगदान दे रही है।
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