इजराइल में नेतन्याहू क्यों अब भी बना सकते हैं सरकार और क्या हैं उनके रास्ते

इजराइल चुनाव में 53 सीटें मिलने के बावजूद बेंजामिन नेतन्याहू के प्रधानमंत्री बने रहने की संभावनाओं और सरकार गठन के विभिन्न रास्तों की पूरी जानकारी।

Nov 7, 2026 - 15:35
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इजराइल में नेतन्याहू क्यों अब भी बना सकते हैं सरकार और क्या हैं उनके रास्ते

इजराइल की राजनीति में चुनाव के परिणामों से ज्यादा इस बात की चर्चा हो रही है कि अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा। बीते महीने हुए चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन को 120 सदस्यीय संसद में सिर्फ 53 सीटें मिली हैं, जबकि उनके विरोधी दलों को कुल 67 सीटें मिली हैं, जो कि बहुमत के आंकड़े से ज्यादा हैं। आंकड़ों को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि नेतन्याहू को सत्ता छोड़नी पड़ेगी क्योंकि उनके पास 61 सीटों का बहुमत नहीं है। मगर ये डेटा इतने साफ नहीं हैं और इजराइल में ऐसे समीकरण बन रहे हैं, जिससे इस बात की उम्मीद जगी है कि नेतन्याहू प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं।

विपक्ष का समर्थन और अंदरूनी मतभेद

पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति के सामने 67 सांसदों का समर्थन भी मिल गया है। इसके बावजूद नेतन्याहू की सत्ता खत्म होना तय नहीं है। इसकी मुख्य वजह यह है कि आइजेनकोट के समर्थन में शामिल सभी दल उनके साथ सरकार बनाने को पूरी तरह तैयार नहीं हैं। खासकर अरब पार्टियों के साथ गठबंधन को लेकर विपक्षी दलों के बीच गहरे मतभेद हैं। इजराइल की 120 सदस्यीय संसद में बहुमत के लिए 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। चुनाव में नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं, जबकि गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिली हैं। वहीं अरब पार्टियों के पास 19 सीटें हैं। इन पार्टियों के समर्थन से ही आइजेनकोट के पक्ष में 67 सांसदों का गणित बनता है, लेकिन विपक्षी दल अरब पार्टियों के समर्थन को लेकर एकमत नहीं हैं। अगर इस मुद्दे पर उनके बीच सहमति नहीं बनती है, तो आइजेनकोट के लिए सरकार बनाना बेहद मुश्किल हो सकता है और इसका सीधा फायदा नेतन्याहू को मिल सकता है।

छोटे दलों का समर्थन और नेतन्याहू की रणनीति

नेतन्याहू के गठबंधन के पास 53 सीटें हैं, यानी बहुमत से वह 8 सीट पीछे हैं। ऐसे में उन्हें विपक्षी खेमे के कुछ सांसदों या छोटे दलों का समर्थन जुटाना होगा। उनकी पुरानी सहयोगी अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स पार्टी यूनाइटेड टोरा जूडिज्म (UTJ) के पास 7 सीटें हैं। हालांकि इस पार्टी ने इस बार चुनाव में नेतन्याहू के समर्थन में सिफारिश नहीं की है। धार्मिक छात्रों को सैन्य सेवा से छूट देने के मुद्दे पर उसका नेतन्याहू सरकार से मतभेद रहा है और अगर नेतन्याहू इस पार्टी को फिर से अपने साथ लाने में सफल हो जाते हैं, तो बहुमत के लिए उन्हें सिर्फ एक और सांसद के समर्थन की जरूरत रह जाएगी। इसके अलावा सरकार बनाने का दूसरा मौका मिलने की भी संभावना है। इजराइल के राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग पहले आइजेनकोट को सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं। इसके लिए उन्हें 28 दिन मिलेंगे और जरूरत पड़ने पर 14 दिन का अतिरिक्त समय भी दिया जा सकता है। अगर आइजेनकोट इस दौरान बहुमत जुटाने में नाकाम रहते हैं, तो राष्ट्रपति किसी दूसरे सांसद को सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं, और इस स्थिति में नेतन्याहू भी एक बड़े दावेदार हो सकते हैं।

राष्ट्रीय एकता सरकार और दोबारा चुनाव के विकल्प

नेतन्याहू और आइजेनकोट के बीच समझौता होने पर दोनों खेमे मिलकर राष्ट्रीय एकता सरकार भी बना सकते हैं। इसमें प्रधानमंत्री पद साझा करने यानी रोटेशन का फॉर्मूला अपनाया जा सकता है और इसके तहत एक तय अवधि तक एक नेता प्रधानमंत्री रहेगा और उसके बाद दूसरा नेता यह जिम्मेदारी संभालेगा। हालांकि यह रास्ता बिल्कुल आसान नहीं है क्योंकि आइजेनकोट पहले ही नेतन्याहू के नेतृत्व में सरकार बनाने के प्रस्ताव को साफ तौर पर खारिज कर चुके हैं और ऐसे में दोनों नेताओं को अपने पुराने रुख में बड़ा बदलाव करना होगा। अगर सरकार बनाने की सभी कोशिशें आखिरकार नाकाम रहती हैं, तो इजराइल में दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ सकती है। अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च सर्विस (CRS) के मुताबिक, पहली कोशिश में नाकामी के बाद दूसरे और फिर तीसरे सांसद को भी सरकार बनाने का मौका मिल सकता है। अगर इसके बाद भी बहुमत नहीं बनता है, तो संसद भंग होकर नए चुनाव का रास्ता खुल जाएगा और तब तक नेतन्याहू की मौजूदा सरकार कार्यवाहक सरकार के तौर पर काम करती रहेगी और वह प्रधानमंत्री बने रहेंगे।

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