चुनाव आयोग विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: CJI सूर्यकांत ने याचिका को अगले हफ्ते सूचीबद्ध करने का दिया आदेश
सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकारों से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करेगा।
चुनाव आयोग को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी विवाद अब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले में दायर याचिका पर सुनवाई करने के लिए अपनी सहमति दे दी है। यह मामला मुख्य रूप से चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और नियमों के पालन से जुड़ा है। अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे अगले हफ्ते सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए दी सहमति
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने आज इस मामले को वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने मेंशन किया। उन्होंने अदालत से इस याचिका पर जल्द सुनवाई करने का अनुरोध किया, जिसे स्वीकार करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि इसे अगले हफ्ते सूचीबद्ध किया जाए। इस याचिका में चुनाव आयोग के कामकाज के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जो सीधे तौर पर देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की निष्पक्षता से जुड़े हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकारों पर कानूनी सवाल
इस पूरे विवाद की जड़ में यह सवाल है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग की ओर से अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना एकतरफा फैसले ले सकते हैं और वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने CJI सूर्यकांत की बेंच के सामने दलील दी कि कानूनी नियमों के अनुसार, चुनाव आयोग जैसी बहु-सदस्यीय संस्था के सभी फैसले या तो सर्वसम्मति से होने चाहिए या फिर बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि आयोग को बहु-सदस्यीय बनाने का मूल उद्देश्य ही यही था कि कोई भी निर्णय व्यक्तिगत न होकर सामूहिक हो।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) पर विवाद
याचिका में विशेष रूप से स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के फैसले पर सवाल उठाए गए हैं और वकील विकास सिंह ने अदालत के सामने यह मुद्दा उठाया कि क्या SIR को लेकर वास्तव में चुनाव आयोग ने सामूहिक रूप से कोई फैसला लिया था। उन्होंने कहा कि अगर आयोग के स्तर पर सर्वसम्मति या बहुमत से फैसला नहीं हुआ है, तो यह एक अत्यंत गंभीर मुद्दा है। चिंता की बात यह है कि इस फैसले को अदालत के सामने भी पूरे चुनाव आयोग का आधिकारिक फैसला बताकर पेश किया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, तो यह संस्थागत मर्यादा का उल्लंघन है।
आंतरिक मतभेद की खबरें और आयोग का पक्ष
यह विवाद तब और गहरा गया जब कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया कि चुनाव आयोग के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। इन रिपोर्ट्स में कहा गया कि SIR को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और बाकी दो चुनाव आयुक्तों के बीच गहरे मतभेद हैं। हालांकि, इन खबरों के सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने एक आधिकारिक बयान जारी कर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की थी। आयोग ने अपने बयान में कहा था कि SIR से जुड़े सभी निर्णय तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने आंतरिक कलह की खबरों को सिरे से खारिज कर दिया था।
विपक्ष का विरोध और इस्तीफे की मांग
चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों ने कड़ा रुख अपनाया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर प्रदर्शन किया है और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की जा रही है। विपक्ष का आरोप है कि संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता का अभाव लोकतंत्र के लिए खतरा है। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जहां अगले हफ्ते इस मामले की विस्तृत सुनवाई होगी और यह तय होगा कि आयोग के भीतर फैसले लेने की कानूनी प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।
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