पीयूष गोयल ने जर्मनी में अमीर देशों को खरी-खरी सुनाई, जलवायु फंड पर खोली पोल
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी में बर्लिन ग्लोबल डायलॉग के दौरान अमीर देशों पर जलवायु फंड के वादों से मुकरने का आरोप लगाया और कहा कि 11 साल में कोई मदद नहीं मिली।
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी में आयोजित बर्लिन ग्लोबल डायलॉग के दौरान विकसित देशों को खरी-खरी सुनाई है और जलवायु फंड के मोर्चे पर उनकी पोल खोलकर रख दी है। दुनिया में प्रदूषण फैलाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले अमीर देश अब विकासशील देशों की मदद करने के अपने पुराने और बड़े वादों से पूरी तरह से पीछे हट रहे हैं। इस बात को प्रमुखता से उठाते हुए केंद्रीय मंत्री ने वैश्विक मंच पर विकसित देशों को करारा जवाब दिया है और उनसे यह सवाल पूछा है कि आखिर इस संकट की जिम्मेदारी कौन लेगा।
जलवायु परिवर्तन की गंभीर समस्या के लिए आखिर मुख्य रूप से जिम्मेदार कौन है और इसके विनाशकारी परिणामों से निपटने की भारी कीमत कौन चुकाएगा? इस महत्वपूर्ण सवाल पर भारत ने एक बार फिर विकसित देशों को दुनिया के सामने घेरा है। जर्मनी की राजधानी बर्लिन में आयोजित इस उच्चस्तरीय संवाद कार्यक्रम के दौरान पीयूष गोयल ने अमीर देशों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए आवश्यक आर्थिक मदद मुहैया कराने का वादा किया गया था, जिसे अब तक पूरा नहीं किया गया है। उन्होंने कड़े शब्दों में यह सवाल उठाया कि जब ऐतिहासिक रूप से प्रदूषण फैलाने में विकसित देशों की ही सबसे बड़ी भूमिका रही है, तो अब अपनी जिम्मेदारी निभाने और उसका निर्वहन करने के सही वक्त पर वे लगातार पीछे क्यों हट रहे हैं?
पीयूष गोयल ने बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में एक महत्वपूर्ण गोलमेज चर्चा में हिस्सा लेते हुए जलवायु फंड का संवेदनशील मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने याद दिलाया कि साल 2015 में आयोजित पेरिस जलवायु सम्मेलन के दौरान दुनिया भर के विकसित देशों ने यह प्रतिबद्धता जताई थी कि वे विकासशील और कम विकसित देशों को इस संकट से उबरने में आर्थिक सहायता देंगे। इसके तहत यह तय किया गया था कि हर साल एक सौ अरब डॉलर यानी 100 अरब डॉलर की भारी-भरकम जलवायु सहायता राशि जुटाई जाएगी और जरूरतमंद देशों को दी जाएगी। गोयल के मुताबिक, इस बड़े वादे को किए हुए पूरे 11 साल बीत चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद विकासशील देशों को इसका एक फूटी कौड़ी का भी वास्तविक लाभ नहीं मिल पाया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ये तमाम प्रतिबद्धताएं और वादे सिर्फ और सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं और जमीन पर इनका कोई अता-पता नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने यूरोपीय संघ और उसके कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी सीबीएएम को लेकर भी कड़े सवाल उठाए और इसके प्रभावों पर चिंता व्यक्त की।
आबादी और कार्बन उत्सर्जन का भारी अंतर
अपने संबोधन और चर्चा के दौरान पीयूष गोयल ने भारत और यूरोप के बीच की कुल आबादी तथा प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन के आंकड़ों के अंतर का बहुत ही बारीकी से जिक्र किया। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि अकेला भारत दुनिया की करीब 17 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन इसके बावजूद वैश्विक स्तर पर होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन में भारत का योगदान 3 प्रतिशत से भी बहुत कम है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि यूरोप के विभिन्न देशों में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन का स्तर भारत की तुलना में बेहद अधिक है और वे इसके मुख्य जिम्मेदार हैं। गोयल के अनुसार, विकसित देशों ने पिछले कई दशकों तक अपने अंधाधुंध औद्योगिक विकास से भारी-भरकम फायदा उठाया है, लेकिन अब जब दुनिया के सामने जलवायु परिवर्तन से निपटने की असल चुनौती खड़ी हुई है, तो वे विकासशील देशों को जरूरी आर्थिक और उन्नत तकनीकी सहायता देने के मामले में पीछे हट रहे हैं।
केंद्रीय मंत्री ने भारत की प्राथमिकताओं के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि वर्तमान में भारत के सामने अपनी 140 करोड़ से अधिक विशाल आबादी की तमाम ऊर्जा संबंधी जरूरतों और भोजन की प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरी निष्ठा से पूरा करने के साथ-साथ देश की संपूर्ण सुरक्षा को भी हर हाल में सुनिश्चित करने की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। इन तमाम बड़ी आंतरिक चुनौतियों और बाधाओं के बावजूद भारत लगातार स्वच्छ ऊर्जा और ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में बेहद तेजी से और प्रभावी ढंग से काम कर रहा है। उन्होंने एक बार फिर इस बात पर विशेष जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अब विकसित देशों को आगे आना होगा और अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से निभाना होगा। उनका यह साफ कहना था कि विकासशील देशों को अपने यहां कार्बन उत्सर्जन को तेजी से घटाने और स्वच्छ ऊर्जा के नए तरीकों को अपनाने के लिए पर्याप्त वित्तीय और ढांचागत मदद मिलनी ही चाहिए।
नॉफ ग्रुप के साथ द्विपक्षीय व्यापार और निवेश पर चर्चा
बर्लिन के अपने इस महत्वपूर्ण दौरे के दौरान केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने केवल वैश्विक मंचों पर ही अपनी बात नहीं रखी, बल्कि उन्होंने कई प्रमुख वैश्विक व्यावसायिक हस्तियों से भी मुलाकात की। इसी कड़ी में उन्होंने नॉफ ग्रुप के ग्लोबल जनरल पार्टनर मुरात अकयिल्दिज से भी एक उच्चस्तरीय बैठक की। इस विशेष बैठक के दौरान भारत में नॉफ ग्रुप की कंपनी के विनिर्माण विस्तार को लेकर विस्तार से चर्चा की गई। इसके अलावा, भारत में टिकाऊ निर्माण सामग्री के उत्पादन को बढ़ावा देने और देश के आधुनिक बुनियादी ढांचे के विकास में आपसी सहयोग को और अधिक मजबूत तथा व्यापक बनाने के विभिन्न तौर-तरीकों पर भी दोनों पक्षों के बीच सार्थक विचार-विमर्श हुआ। इस प्रकार यह दौरा भारत के आर्थिक हितों और वैश्विक जलवायु न्याय की मांग दोनों ही दृष्टियों से बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ है।
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