भारत-यूके एफटीए: 2030 तक 115 अरब डॉलर पहुंचेगा व्यापार, लाखों नौकरियां मिलने का अनुमान
एसोचैम की रिपोर्ट के अनुसार भारत-यूके एफटीए से 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार 115 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है और 10 लाख नौकरियां पैदा हो सकती हैं।
भारत और ब्रिटेन के बीच होने वाले मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) का प्रभाव आने वाले वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था और व्यापारिक परिदृश्य पर व्यापक रूप से दिखाई देने वाला है। उद्योग संगठन एसोचैम द्वारा जारी एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, इस ऐतिहासिक समझौते की मदद से 2030 तक भारत और ब्रिटेन के बीच होने वाला द्विपक्षीय व्यापार 115 अरब डॉलर के प्रभावशाली स्तर तक पहुंच सकता है। यह अनुमान भारतीय निर्यात क्षेत्र के लिए एक नई ऊर्जा और विस्तार के अवसरों का संकेत देता है, जो देश की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
व्यापार वृद्धि और भविष्य का अनुमान
वर्तमान में भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक संबंध मजबूती की ओर अग्रसर हैं। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार 58 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया गया है। हालांकि, 15 जुलाई 2026 से प्रभावी होने वाले भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौते के बाद इस स्थिति में बड़ा सकारात्मक बदलाव आने की उम्मीद है। एसोचैम का मानना है कि यदि भारतीय निर्यातकों ने इस समझौते के तहत मिलने वाले अवसरों का सही दिशा में उपयोग किया, तो 2030 तक कुल व्यापार लगभग दोगुना होकर 115 अरब डॉलर के आंकड़े को छू सकता है। यह वृद्धि दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग के एक नए युग की शुरुआत करेगी।
रोजगार सृजन और आर्थिक प्रभाव
इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसरों का सृजन होना है। एसोचैम की रिपोर्ट में यह संभावना जताई गई है कि व्यापार में होने वाली इस बढ़ोतरी से देश में 7 लाख से लेकर 10 लाख तक नए रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। यह रोजगार वृद्धि न केवल शहरी क्षेत्रों बल्कि औद्योगिक केंद्रों में भी देखने को मिलेगी, जिससे भारतीय श्रम बाजार को काफी मजबूती मिलेगी। निर्यात में वृद्धि होने से उत्पादन क्षमता बढ़ेगी, जिसका सीधा लाभ देश के युवाओं और कुशल श्रमिकों को मिलेगा।
भारतीय कंपनियों के सामने चुनौतियां और मानक
हालांकि इस समझौते से लाभ की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन एसोचैम ने भारतीय कंपनियों को कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों के प्रति भी सचेत किया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस संभावित बढ़ोतरी का पूरा लाभ उठाने के लिए भारतीय कंपनियों को वैश्विक मानकों पर खरा उतरना अनिवार्य होगा। उन्हें अपने उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार करना होगा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य जरूरी सर्टिफिकेशन प्राप्त करने होंगे। इसके अलावा, कंपनियों को रूल्स ऑफ ओरिजिन और अंतरराष्ट्रीय सस्टेनेबिलिटी मानकों का कड़ाई से पालन करना होगा। इन मानकों को पूरा करना ब्रिटिश बाजार में भारतीय उत्पादों की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए आवश्यक है।
MSME और इंजीनियरिंग सेक्टर को विशेष लाभ
एसोचैम के अध्यक्ष निर्मल के. मिंडा के अनुसार, इस समझौते का सबसे बड़ा और सीधा फायदा इंजीनियरिंग गुड्स सेक्टर को मिलने की उम्मीद है। इससे सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) के लिए निर्यात के नए द्वार खुलेंगे। इंजीनियरिंग क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत को देखते हुए यह समझौता इस सेक्टर के लिए एक बड़ा बूस्टर साबित हो सकता है। एमएसएमई क्षेत्र में होने वाली वृद्धि से न केवल निर्यात बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन में भी तेजी आएगी, जो ग्रामीण और अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
सुधार और बुनियादी ढांचे की भूमिका
निर्मल के और मिंडा ने यह भी स्पष्ट किया कि व्यापार करने में आसानी (Ease of Doing Business) से जुड़े सुधार, बेहतर बुनियादी ढांचा और एक मजबूत आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) में निवेश करना भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारतीय उद्योग इन वैश्विक मानकों और बुनियादी ढांचे की आवश्यकताओं को पूरा करने में सफल रहते हैं, तो भारत-यूके एफटीए देश के निर्यात और समग्र आर्थिक विकास के लिए एक बड़ा गेमचेंजर साबित होगा। यह समझौता भारत को वैश्विक व्यापार मानचित्र पर एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा।
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