सरकार ने IPO नियमों में दी ढील, बड़ी कंपनियों की लिस्टिंग आसान

भारत सरकार ने बड़े आईपीओ के लिए नियमों में ढील दी है, जिससे 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कंपनियों के लिए लिस्टिंग आसान होगी।

Mar 14, 2026 - 11:35
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सरकार ने IPO नियमों में दी ढील, बड़ी कंपनियों की लिस्टिंग आसान

भारत सरकार ने देश के पूंजी बाजार में बड़ी कंपनियों की प्रविष्टि को सुगम बनाने के लिए लिस्टिंग नियमों में महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। शुक्रवार देर रात जारी एक आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, सरकार ने प्रतिभूति अनुबंध (विनियमन) नियमों में बदलाव किया है, जिससे अब विशालकाय कंपनियों को आईपीओ (IPO) के समय कम शेयर बेचने की अनुमति होगी। अधिकारियों के अनुसार, इस कदम का मुख्य उद्देश्य नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और रिलायंस जियो जैसी बड़ी संस्थाओं के लिए शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की प्रक्रिया को सरल बनाना है।

5 लाख करोड़ से अधिक मूल्य वाली कंपनियों के लिए नए नियम

5 प्रतिशत हिस्सा ही सार्वजनिक रूप से पेश करना होगा। इससे पहले, बड़ी कंपनियों के लिए न्यूनतम सार्वजनिक पेशकश की सीमा अधिक थी, जिससे उन्हें बाजार में बड़ी मात्रा में इक्विटी जारी करनी पड़ती थी और 5 प्रतिशत शेयर आम जनता को ऑफर किए जा सकते हैं। यह बदलाव विशेष रूप से उन कंपनियों के लिए फायदेमंद है जिनका मूल्यांकन बहुत अधिक है और जो एक बार में बड़ी हिस्सेदारी नहीं बेचना चाहती हैं।

पब्लिक शेयरहोल्डिंग के लिए 'ग्लाइड पाथ' की समय-सीमा

सरकार ने 25 प्रतिशत न्यूनतम सार्वजनिक शेयरहोल्डिंग (MPS) के नियम तक पहुंचने के लिए एक अनिवार्य 'ग्लाइड पाथ' या समय-सीमा भी निर्धारित की है। नियमों के अनुसार, यदि किसी कंपनी की लिस्टिंग के समय सार्वजनिक शेयरहोल्डिंग 15 प्रतिशत से कम है, तो उसे 15 प्रतिशत तक पहुंचने के लिए 5 साल और अंततः 25 प्रतिशत के स्तर तक पहुंचने के लिए कुल 10 साल का समय दिया जाएगा। यह लंबी समय-सीमा बड़ी कंपनियों को बाजार की स्थितियों के अनुसार धीरे-धीरे अपनी हिस्सेदारी कम करने की अनुमति देती है।

विभिन्न मार्केट कैप श्रेणियों के लिए न्यूनतम पब्लिक फ्लोट

अधिसूचना में विभिन्न बाजार पूंजीकरण श्रेणियों के लिए अलग-अलग न्यूनतम पब्लिक फ्लोट निर्धारित किए गए हैं। 75 प्रतिशत तय किया गया है। वहीं, 50,000 करोड़ रुपये से 1 लाख करोड़ रुपये के बीच मार्केट कैप वाली कंपनियों के लिए यह सीमा 8 प्रतिशत रखी गई है। यदि लिस्टिंग के समय किसी कंपनी का पब्लिक फ्लोट 15 प्रतिशत से अधिक है, तो उसे 25 प्रतिशत के अनिवार्य स्तर तक पहुंचने के लिए 5 साल का समय मिलेगा।

सुपीरियर वोटिंग राइट्स और अन्य अनिवार्य प्रावधान

नए नियमों में सुपीरियर वोटिंग राइट्स (SR) वाले शेयरों के संबंध में भी स्पष्टता प्रदान की गई है। यदि कोई कंपनी, जिसके पास सुपीरियर वोटिंग राइट्स वाली इक्विटी शेयरों की कोई श्रेणी मौजूद है, अपने साधारण शेयर (Ordinary Shares) लिस्ट करती है, तो उसे अनिवार्य रूप से अपने सुपीरियर वोटिंग राइट्स वाले शेयरों को भी लिस्ट करना होगा। यह प्रावधान कॉर्पोरेट प्रशासन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जोड़ा गया है और इन बदलावों के माध्यम से सरकार ने भारतीय शेयर बाजार में बड़े कॉर्पोरेट घरानों की भागीदारी बढ़ाने और वैश्विक निवेशकों को आकर्षित करने का प्रयास किया है।

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