FCRA संशोधन विधेयक 2026 जेपीसी को भेजा गया, विपक्ष का भारी विरोध और अखिलेश यादव का बड़ा बयान

विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 को 31 सदस्यीय जेपीसी के पास भेजा गया है। अखिलेश यादव ने इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताया है।

Aug 12, 2026 - 15:35
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FCRA संशोधन विधेयक 2026 जेपीसी को भेजा गया, विपक्ष का भारी विरोध और अखिलेश यादव का बड़ा बयान

केंद्र सरकार ने आज बुधवार को विपक्षी दलों के कड़े विरोध और हंगामे के बीच विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA) को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजने का निर्णय लिया है। लोकसभा में इस विधेयक को जेपीसी को सौंपने का प्रस्ताव पेश किया गया, जिसे सदन की मंजूरी मिल गई और हालांकि, इस विधायी कदम पर राजनीतिक घमासान कम नहीं हुआ है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस विधेयक का पुरजोर विरोध करते हुए इसे अल्पसंख्यकों के हितों के खिलाफ बताया है। उनका तर्क है कि यह बिल विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदायों को लक्षित करने के लिए लाया गया है।

विधेयक की प्रस्तुति और जेपीसी का गठन

सदन की कार्यवाही के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अनुपस्थिति में गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने इस महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक को लोकसभा के पटल पर रखा और विपक्ष के भारी विरोध को देखते हुए सरकार ने इसे 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजने का प्रस्ताव रखा। इस समिति की संरचना के अनुसार, इसमें कुल 31 सदस्य होंगे, जिनमें लोकसभा के 21 सांसद और राज्यसभा के 10 सांसद शामिल किए जाएंगे। इस समिति को विधेयक के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करने और अगले सत्र तक अपनी रिपोर्ट या जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।

विभिन्न राजनीतिक दलों का रुख

इससे पहले ही राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज थी कि सरकार एफसीआरए विधेयक को संसद की संयुक्त समिति को भेजने पर विचार कर रही है और सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, राज्यसभा की कार्य मंत्रणा समिति (BAC) की बैठक के दौरान कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस विधेयक को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए थे। इन दलों ने सदन में विधेयक को पेश किए जाने के समय और प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी और सरकार ने इन आपत्तियों पर कहा कि इस बारे में उचित समय पर निर्णय लिया जाएगा।

जहां कांग्रेस और टीएमसी जैसे दल इस विधेयक को पूरी तरह वापस लेने की मांग कर रहे हैं, वहीं बीजू जनता दल (BJD) जैसे अन्य दलों का मानना है कि इस पर विस्तृत चर्चा की आवश्यकता है और इसे जेपीसी के पास भेजा जाना एक सही कदम हो सकता है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने भी अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि या तो इस विधेयक को वापस लिया जाए या फिर इसे जेपीसी के पास भेजा जाए और विपक्षी दलों का मुख्य आरोप यह है कि यह विधेयक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है और इसके प्रावधानों से ईसाई एनजीओ और अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा संचालित सामाजिक कल्याण एवं शैक्षणिक संस्थानों के वैध वित्तपोषण में बाधा उत्पन्न होगी।

विधेयक का इतिहास और सरकार का पक्ष

यह महत्वपूर्ण विधेयक इसी साल 25 मार्च को बजट सत्र के दौरान लोकसभा में पेश किया गया था। इस विधेयक के माध्यम से सरकार ने देश में गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और उन्हें मिलने वाले विदेशी वित्तपोषण पर कड़ी निगरानी रखने का प्रस्ताव दिया है। विपक्ष के आरोपों के विपरीत, सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रस्तावित कानून का किसी विशेष धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। सरकार का कहना है कि इस संशोधन का एकमात्र उद्देश्य विदेशी अंशदान की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना और उसमें सुधार करना है।

कार्य मंत्रणा समिति की बैठक के विवरण

कल मंगलवार को राज्यसभा की बीएसी की बैठक आयोजित की गई थी, जिसकी अध्यक्षता सभापति सी और पी. राधाकृष्णन ने की। इस उच्च स्तरीय बैठक में कई प्रमुख नेता शामिल हुए, जिनमें शामिल हैं:

  • संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू
  • जे. पी. नड्डा
  • विपक्षी नेता जयराम रमेश (कांग्रेस)
  • तिरूची शिवा (डीएमके)
  • सस्मित पात्रा (बीजेडी)

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या जेपीसी की समीक्षा के दौरान विपक्षी दलों की चिंताओं को दूर किया जाएगा या विधेयक अपने मूल स्वरूप में ही आगे बढ़ेगा। समिति को अपनी रिपोर्ट अगले सत्र तक देनी है, जिससे इस मुद्दे पर भविष्य की दिशा तय होगी।

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