:संसद गतिरोध: शशि थरूर ने राहुल गांधी को चुप कराने पर उठाए सवाल

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने राहुल गांधी को संसद में बोलने से रोकने पर सरकार की आलोचना की और चीन मुद्दे पर पारदर्शिता की मांग की।

Feb 2, 2026 - 19:35
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:संसद गतिरोध: शशि थरूर ने राहुल गांधी को चुप कराने पर उठाए सवाल

एम. नरवणे के संस्मरणों का उल्लेख किए जाने के बाद मचे हंगामे पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरूर ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। थरूर ने सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब जानकारी पहले से ही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है, तो सदन की कार्यवाही को बाधित करना तर्कसंगत नहीं है और यह विवाद तब शुरू हुआ जब राहुल गांधी ने एक पत्रिका में छपे लेख का हवाला देते हुए चीन सीमा पर स्थिति और सैन्य निर्णयों पर चर्चा की मांग की, जिसके बाद सदन को स्थगित करना पड़ा।

सार्वजनिक डोमेन में जानकारी का तर्क

शशि थरूर ने स्पष्ट किया कि राहुल गांधी जिस लेख का संदर्भ दे रहे थे, वह 'कारवां' पत्रिका में पहले ही प्रकाशित हो चुका है। थरूर के अनुसार, यह लेख जनरल नरवणे के उन संस्मरणों पर आधारित है जो अभी आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुए हैं, लेकिन उनकी सामग्री सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। थरूर ने तर्क दिया कि सरकार को इस बात पर आपत्ति जताने के बजाय कि किताब अभी बाजार में नहीं आई है, राहुल गांधी को अपनी बात पूरी करने देनी चाहिए थी और उन्होंने कहा कि यदि सरकार को लगता है कि तथ्य गलत हैं, तो उन्हें तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए था, न कि चर्चा को रोकना चाहिए था।

नेहरू काल और ऐतिहासिक बहसों का संदर्भ

लोकतांत्रिक परंपराओं का हवाला देते हुए शशि थरूर ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल की याद दिलाई और उन्होंने उल्लेख किया कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान भी संसद में प्रतिदिन बहस होती थी। थरूर ने कहा कि उस समय सरकारी सांसद भी प्रधानमंत्री की आलोचना करने के लिए स्वतंत्र थे और देश को हर महत्वपूर्ण घटनाक्रम के बारे में विश्वास में लिया जाता था। उन्होंने 1965 और 1971 के युद्धों का भी उदाहरण दिया, जब युद्ध के दौरान भी संसदीय सत्र सुचारू रूप से चले थे और रक्षा मामलों पर विस्तार से चर्चा की गई थी।

चीन मुद्दे पर पारदर्शिता की मांग

कांग्रेस सांसद ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछा कि वर्तमान प्रशासन चर्चा से क्यों डर रहा है। थरूर ने जोर देकर कहा कि चीन के साथ सीमा विवाद पूरे देश के लिए गहरी चिंता का विषय है और इस पर संसद में खुली बहस होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री को सदन में आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए ताकि जनता को वास्तविक स्थिति का पता चल सके और थरूर के अनुसार, सूचनाओं को छिपाना या चर्चा से बचना लोकतंत्र और संसदीय कार्यप्रणाली के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है।

विश्लेषकों के अनुसार संसदीय गरिमा का महत्व

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, संसद का मुख्य कार्य राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर बहस और समाधान खोजना है। थरूर का बयान इस विचार को पुष्ट करता है कि तथ्यों को दबाने के बजाय उनका खंडन तर्कों से किया जाना चाहिए और विशेषज्ञों का मानना है कि विपक्ष द्वारा उठाए गए संवेदनशील मुद्दों पर सरकार की अत्यधिक प्रतिक्रिया अक्सर सदन की कार्यवाही में गतिरोध पैदा करती है, जिससे विधायी कार्यों में देरी होती है। थरूर ने स्पष्ट किया कि राहुल गांधी का उद्देश्य सेना पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के रणनीतिक फैसलों पर सवाल उठाना था।

लोकतांत्रिक जवाबदेही

शशि थरूर ने अंत में कहा कि सरकार को बातचीत को बढ़ावा देना चाहिए और गलतफहमियों को दूर करने के लिए संसद का उपयोग करना चाहिए। उन्होंने दोहराया कि तथ्यों को सामने आने से रोकना समाधान नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक जवाबदेही को कमजोर करता है। चीन सीमा पर मौजूदा स्थिति और पूर्व सैन्य अधिकारियों के बयानों पर पारदर्शिता की मांग करते हुए उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में सरकार ऐसे संवेदनशील विषयों पर चर्चा के लिए अधिक लचीला रुख अपनाएगी।

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