:अरावली पर सुप्रीम कोर्ट का महामुकाबला आज, क्या बच पाएंगी पहाड़ियां? जानें पूरा विवाद

अरावली पर्वतमाला मामले में आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई। 100 मीटर ऊंचाई वाले नियम पर केंद्र और राज्यों से मांगा गया जवाब। जानें क्या है पूरा मामला।

Jan 21, 2026 - 09:35
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:अरावली पर सुप्रीम कोर्ट का महामुकाबला आज, क्या बच पाएंगी पहाड़ियां? जानें पूरा विवाद

अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व को लेकर आज देश की सर्वोच्च अदालत में एक बार फिर गहमागहमी देखने को मिलेगी।  मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई कर रही है, जिसमें अरावली की परिभाषा और उसके संरक्षण के मानकों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं और पिछली सुनवाई के दौरान अदालत ने उस विवादास्पद नियम पर रोक लगा दी थी, जिसमें केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली का हिस्सा मानने की बात कही गई थी।   इस नियम ने पर्यावरणविदों और आम जनता के बीच भारी आक्रोश पैदा कर दिया था, क्योंकि इससे छोटी पहाड़ियों पर खनन का रास्ता साफ होने का डर था।   आज की सुनवाई में केंद्र सरकार और चार संबंधित राज्यों राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी है।   विवाद की मुख्य जड़ क्या है?   दरअसल, यह पूरा विवाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति की सिफारिशों के बाद शुरू हुआ।  समिति ने सुझाव दिया था कि केवल उन्हीं संरचनाओं को अरावली।  माना जाए जिनकी ऊंचाई जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक है।   इस सिफारिश को अगर लागू कर दिया जाता, तो अरावली की सैकड़ों छोटी पहाड़ियां कानूनी संरक्षण से बाहर हो जातीं।   पर्यावरण विशेषज्ञों का तर्क है कि अरावली कोई अलग-अलग पहाड़ियों का समूह नहीं बल्कि एक पूरी पारिस्थितिकी तंत्र की श्रृंखला है।   छोटी पहाड़ियों को बाहर करने का मतलब होगा उन्हें भू-माफियाओं और खनन कंपनियों के हवाले कर देना।   विपक्ष और पर्यावरणविदों का कड़ा विरोध राजस्थान और हरियाणा में इस फैसले के खिलाफ राजनीतिक माहौल भी गरमाया हुआ है।  विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार बड़े कॉर्पोरेट घरानों को फायदा।  पहुंचाने के लिए अरावली के सुरक्षा घेरे को कमजोर कर रही है।


उनका कहना है कि अगर छोटी पहाड़ियों को अरावली की श्रेणी से हटा दिया गया, तो इससे न केवल जैव विविधता नष्ट होगी बल्कि दिल्ली-एनसीआर में धूल भरी आंधियों का प्रकोप भी बढ़ जाएगा और अरावली रेगिस्तान के विस्तार को रोकने के लिए एक प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती है।   अदालत की पिछली टिप्पणियां और स्पष्टीकरण सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में स्पष्ट किया था कि उसकी टिप्पणियों और रिपोर्ट का गलत अर्थ निकाला जा रहा है।   अदालत ने कहा था कि जब तक मामले की पूरी गहराई से जांच नहीं हो जाती, तब तक 100 मीटर वाला नियम प्रभावी नहीं होगा।  कोर्ट ने यह भी माना कि अरावली का संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी तकनीकी परिभाषा की आड़ में पर्यावरण के साथ खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा और आज केंद्र सरकार को यह बताना होगा कि वह अरावली की सुरक्षा के लिए क्या ठोस कदम उठा रही है और क्या वह अपनी पुरानी सिफारिशों पर कायम है या उनमें बदलाव करेगी।   अरावली का पारिस्थितिक महत्व अरावली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है।   यह न केवल वन्यजीवों का घर है, बल्कि यह उत्तर भारत के भूजल स्तर को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।   दिल्ली-एनसीआर के लिए यह फेफड़ों की तरह काम करती है, जो प्रदूषण को सोखने में मदद करती है।   यदि खनन के कारण ये पहाड़ियां गायब होती हैं, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी और शुद्ध हवा का संकट खड़ा हो जाएगा।   आज की सुनवाई यह तय करेगी कि विकास की दौड़ में हम अपनी प्राकृतिक विरासत को कितना सुरक्षित रख पाते हैं।

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