ईरान-अमेरिका युद्धविराम: ट्रंप के समझौते को क्यों माना जा रहा रणनीतिक हार?

ईरान और अमेरिका के बीच 39 दिनों के युद्ध के बाद सीजफायर हुआ है। जानिए क्यों इस समझौते को ट्रंप की रणनीतिक हार बताया जा रहा है।

Apr 8, 2026 - 17:35
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ईरान-अमेरिका युद्धविराम: ट्रंप के समझौते को क्यों माना जा रहा रणनीतिक हार?

वाशिंगटन और तेहरान के बीच 39 दिनों तक चले भीषण सैन्य संघर्ष के बाद अब युद्धविराम की स्थिति बनी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ हुए इस अस्थायी समझौते को अमेरिका के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया है। हालांकि, इस समझौते की शर्तों और इसके समय को लेकर अमेरिका के भीतर ही तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और रिपोर्टों के अनुसार, इस युद्ध के दौरान अमेरिका ने लगभग $40 billion खर्च किए हैं, लेकिन इसके बावजूद वह ईरान को अपनी सभी शर्तों पर झुकाने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है।

होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का नया नियंत्रण

इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद शर्त होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जुड़ी है। अब तक इस अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग से जहाजों का आवागमन मुफ्त था, लेकिन नए समझौते के तहत ईरान अब यहां से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलने का अधिकार रखेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह वैश्विक व्यापार मार्ग पर ईरान के नियंत्रण को आधिकारिक मान्यता देने जैसा है। अमेरिकी सीनेटरों का तर्क है कि जिस मार्ग को अमेरिका हमेशा से स्वतंत्र रखना चाहता था, वहां अब ईरान की शर्तों को मानना एक बड़ी कूटनीतिक विफलता है।

यूरेनियम संवर्धन और परमाणु शर्तों में बदलाव

युद्ध की शुरुआत में अमेरिका की प्राथमिक शर्त यह थी कि ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम के भंडार को देश से बाहर स्थानांतरित करे। हालांकि, वर्तमान 2 सप्ताह के अस्थायी समझौते में इस शर्त को प्राथमिकता नहीं दी गई है। इसके बजाय, ध्यान केवल तत्काल युद्धविराम और होर्मुज के रास्ते को सशर्त खोलने पर केंद्रित किया गया है। आलोचकों का कहना है कि परमाणु कार्यक्रम पर ठोस आश्वासन के बिना युद्धविराम करना ईरान को फिर से संगठित होने का अवसर प्रदान कर सकता है।

सहयोगियों की अनदेखी और जल्दबाजी में लिया गया निर्णय

अमेरिकी प्रशासन पर यह आरोप लग रहे हैं कि यह समझौता काफी जल्दबाजी में किया गया है। INSS के वरिष्ठ फेलो डेनिस सिट्रिनोविच के अनुसार, युद्ध की बढ़ती लागत और घरेलू दबाव के कारण वाशिंगटन ने ईरान के प्रस्तावों को स्वीकार कर लिया। इस प्रक्रिया में मिडिल ईस्ट में अमेरिका के प्रमुख सहयोगियों, विशेष रूप से इजराइल के साथ पर्याप्त विचार-विमर्श नहीं किया गया। इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री नेफ्ताली बेन्नेट ने इस समझौते को सुरक्षा के लिहाज से बेहद खतरनाक बताया है।

शासन परिवर्तन के लक्ष्य से पीछे हटना

संघर्ष के शुरुआती दिनों में राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान में शासन परिवर्तन (Regime Change) की संभावनाओं की ओर संकेत दिया था। लेकिन 40 दिनों के बाद भी ईरान के इस्लामिक गणराज्य की संरचना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। इसके विपरीत, ट्रंप ने समझौते के लिए ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई से सीधा संपर्क साधा। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर मुज्तबा खामेनेई को एक 'कम कट्टरपंथी' नेता के रूप में संबोधित किया है, जिसे जानकार अमेरिकी रुख में एक बड़े बदलाव के रूप में देख रहे हैं।

भविष्य की वार्ताओं पर समझौते का प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते के बाद अब अमेरिका भविष्य की वार्ताओं में सैन्य दबाव या 'जंग की धौंस' का उपयोग प्रभावी ढंग से नहीं कर पाएगा। ईरान ने इस 39 दिवसीय संघर्ष में अमेरिका के सैन्य दबाव का सामना किया है, जिससे उसका आत्मविश्वास बढ़ा है। अब आगे की बातचीत केवल व्यावसायिक और कूटनीतिक हितों के आधार पर होने की संभावना है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलिना लैविट ने हालांकि इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि ईरान सैन्य रूप से कमजोर हुआ है और यह समझौता अमेरिका की कूटनीतिक जीत है।

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