गलगोटिया यूनिवर्सिटी: चीनी रोबोट विवाद और सुनील गलगोटिया का व्यावसायिक सफर

गलगोटिया यूनिवर्सिटी को दिल्ली एआई समिट से चीनी रोबोट विवाद के कारण बाहर किया गया। जानें संस्थापक सुनील गलगोटिया का बुकस्टोर से यूनिवर्सिटी तक का सफर।

Feb 19, 2026 - 10:35
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गलगोटिया यूनिवर्सिटी: चीनी रोबोट विवाद और सुनील गलगोटिया का व्यावसायिक सफर

नई दिल्ली में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान ग्रेटर नोएडा स्थित गलगोटिया यूनिवर्सिटी एक बड़े विवाद के केंद्र में आ गई है। समिट के आयोजकों ने यूनिवर्सिटी को कार्यक्रम से बाहर कर दिया है। यह कार्रवाई उस समय की गई जब यूनिवर्सिटी के स्टॉल पर प्रदर्शित ‘ओरियन’ (Orion) नामक रोबोट डॉग के बारे में यह पाया गया कि वह संस्थान का मौलिक नवाचार नहीं बल्कि एक चीनी कंपनी का उत्पाद है। इस घटना ने न केवल शैक्षणिक जगत में नैतिकता पर सवाल उठाए हैं बल्कि यूनिवर्सिटी के संस्थापक सुनील गलगोटिया के व्यावसायिक इतिहास को भी चर्चा में ला दिया है।

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में विवाद का घटनाक्रम

दिल्ली में आयोजित इस प्रतिष्ठित समिट में गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एक स्टॉल लगाया था जहाँ उन्होंने ‘ओरियन’ नामक एक रोबोटिक डॉग का प्रदर्शन किया। यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधियों ने दावा किया कि यह रोबोट उनके सेंटर ऑफ एक्सीलेंस द्वारा विकसित किया गया है। अधिकारियों के अनुसार समिट में मौजूद तकनीकी विशेषज्ञों और अन्य प्रतिभागियों ने इस दावे पर संदेह जताया। जांच में पाया गया कि यह रोबोट असल में चीन की प्रसिद्ध कंपनी यूनिट्री रोबोटिक्स (Unitree Robotics) का मॉडल यूनिट्री गो2 (Unitree Go2) है। विवाद बढ़ने और सोशल मीडिया पर तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने के बाद आयोजकों ने यूनिवर्सिटी को समिट से बाहर करने का निर्णय लिया।

ओरियन रोबोट और चीनी कंपनी यूनिट्री का कनेक्शन

तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार यूनिट्री गो2 एक व्यावसायिक रूप से उपलब्ध रोबोट है जिसे कोई भी व्यक्ति या संस्थान अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीद सकता है। 00 लाख के बीच बताई जाती है। गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने समिट के दौरान दावा किया था कि उन्होंने एआई और रोबोटिक्स अनुसंधान में ₹350 करोड़ से अधिक का निवेश किया है। हालांकि जब यह स्पष्ट हुआ कि प्रदर्शित रोबोट केवल एक री-ब्रांडेड उत्पाद था तो यूनिवर्सिटी की ओर से सफाई दी गई कि यह प्रस्तुति में हुई एक गलतफहमी थी। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने बाद में स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य तकनीक के अनुप्रयोग को दिखाना था न कि इसके निर्माण का गलत दावा करना।

सुनील गलगोटिया: बुकस्टोर से यूनिवर्सिटी साम्राज्य तक का सफर

इस विवाद के बाद यूनिवर्सिटी के मालिक सुनील गलगोटिया की पृष्ठभूमि पर ध्यान केंद्रित हुआ है। सुनील गलगोटिया का परिवार दशकों से दिल्ली के व्यापारिक परिदृश्य का हिस्सा रहा है। उनके परिवार की व्यावसायिक जड़ें 1930 के दशक में दिल्ली के कनॉट प्लेस में स्थित एक छोटे से बुकस्टोर ‘गलगोटियास’ से जुड़ी हैं। सुनील गलगोटिया ने दिल्ली के प्रतिष्ठित श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) से अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की। 1980 के दशक में उन्होंने पारिवारिक व्यवसाय को विस्तार देते हुए पब्लिशिंग के क्षेत्र में कदम रखा और गलगोटियास पब्लिकेशंस की स्थापना की। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर की तकनीकी और शैक्षिक पुस्तकों के वितरण अधिकार हासिल कर पब्लिशिंग जगत में अपनी पहचान बनाई।

गलगोटियास पब्लिकेशंस और शैक्षणिक विस्तार की नींव

पब्लिशिंग व्यवसाय में सफलता के बाद सुनील गलगोटिया ने शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश करने का निर्णय लिया। साल 2000 में उन्होंने गलगोटियास इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी (GIMT) की स्थापना की। रिपोर्टों के अनुसार इस संस्थान की शुरुआत केवल 40 छात्रों के साथ हुई थी। इसके बाद उन्होंने इंजीनियरिंग और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए अलग-अलग कॉलेज शुरू किए। साल 2011 में उत्तर प्रदेश सरकार से मान्यता मिलने के बाद इसे पूर्ण विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ। आज यह संस्थान ग्रेटर नोएडा के एक विशाल परिसर में संचालित होता है जहाँ हजारों छात्र विभिन्न संकायों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

यूनिवर्सिटी का वर्तमान स्वरूप और वित्तीय निवेश के दावे

वर्तमान में गलगोटिया यूनिवर्सिटी देश की प्रमुख निजी यूनिवर्सिटीज में गिनी जाती है। सुनील गलगोटिया के नेतृत्व में संस्थान ने आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और प्लेसमेंट रिकॉर्ड के आधार पर अपनी ब्रांडिंग की है। यूनिवर्सिटी अक्सर अपनी एआई लैब और अनुसंधान केंद्रों के लिए भारी निवेश के दावे करती रही है। हालिया विवाद में ₹350 करोड़ के निवेश का आंकड़ा भी इसी कड़ी का हिस्सा था। सुनील गलगोटिया का व्यावसायिक साम्राज्य अब केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है बल्कि उनकी कुल संपत्ति और टर्नओवर हजारों करोड़ रुपये में आंका जाता है। हालांकि इस ताजा विवाद ने संस्थान की अनुसंधान संबंधी साख और दावों की सत्यता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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