तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन की मांग: अमेरिका-चीन का वीटो पावर छीन लो
तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की वीटो पावर खत्म करने की मांग की है, इसे पुरानी व्यवस्था बताया है।
तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान कार्यप्रणाली और उसकी संरचना पर गंभीर सवाल उठाते हुए एक बहुत बड़ी मांग अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखी है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों को प्राप्त वीटो पावर को पूरी तरह से समाप्त करने की पुरजोर वकालत की है। एर्दोगन का स्पष्ट और कड़ा मानना है कि संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा व्यवस्था अब पुरानी हो चुकी है और इसमें आज की तेजी से बदलती दुनिया की जरूरतों और वास्तविकताओं के हिसाब से आमूल-चूल परिवर्तन करने की तत्काल आवश्यकता है। तुर्की के राष्ट्रपति के अनुसार, यह व्यवस्था दूसरे विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों में बनाई गई थी, जो अब 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम नहीं रह गई है।
वीटो पावर पर एर्दोगन का कड़ा प्रहार
राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने अपने विचारों को विस्तार से साझा करते हुए कहा कि जब भी दुनिया के किसी भी हिस्से में कोई बड़ा संकट, युद्ध या मानवीय त्रासदी आती है, तो पूरी दुनिया की निगाहें समाधान और न्याय के लिए संयुक्त राष्ट्र की ओर मुड़ती हैं। लेकिन विडंबना यह है कि कई अत्यंत महत्वपूर्ण अवसरों पर सुरक्षा परिषद किसी भी ठोस प्रस्ताव पर फैसला लेने में पूरी तरह विफल रहती है। इस विफलता का एक सबसे बड़ा और मुख्य कारण वीटो पावर है। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों के पास यह विशेष अधिकार है कि वे किसी भी प्रस्ताव को, चाहे उसे दुनिया के अधिकांश देशों का समर्थन प्राप्त हो, अकेले ही रोक सकते हैं और एर्दोगन ने इसी व्यवस्था को चुनौती दी है और कहा है कि दुनिया की बड़ी समस्याओं का फैसला कुछ ही देशों की इच्छा या उनके हितों पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
ब्लूमबर्ग के लेख में एर्दोगन के विचार
एर्दोगन ने अपनी इन बातों को ब्लूमबर्ग में प्रकाशित एक विशेष लेख के माध्यम से दुनिया के सामने रखा है। उन्होंने अपने लेख में उल्लेख किया कि पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई बड़ी त्रासदियां और वैश्विक संकट देखे हैं। इन घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि दुनिया की जटिल समस्याओं का समाधान केवल कुछ ही देशों की राजधानियों में लिए गए फैसलों पर निर्भर नहीं रह सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि संयुक्त राष्ट्र के फैसले लेने की पूरी व्यवस्था को आज की दुनिया के हिसाब से बदलने की जरूरत है और उनका कहना है कि किसी भी एक देश के पास ऐसा असीमित अधिकार नहीं होना चाहिए, जिससे वह दुनिया के ज्यादातर देशों की सामूहिक इच्छा के बावजूद किसी भी महत्वपूर्ण फैसले को बाधित कर सके। एर्दोगन के मुताबिक, वीटो पावर को खत्म करना संयुक्त राष्ट्र में सुधार की दिशा में पहला और सबसे बड़ा कदम होना चाहिए ताकि यह संस्था अधिक प्रभावी, बराबरी वाली और जवाबदेह बन सके।
एक बड़े वैश्विक गठबंधन की आवश्यकता
राष्ट्रपति एर्दोगन ने केवल आलोचना ही नहीं की, बल्कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में दुनिया के कई देशों को एक साथ लाकर एक बड़ा गठबंधन बनाने की बात भी कही है। उनका मानना है कि दुनिया के देशों को मिलकर एक ऐसी नई व्यवस्था के लिए काम करना चाहिए, जिसमें किसी एक देश के पास बाकी देशों के बहुमत के फैसले को रोकने की स्थायी और निरंकुश ताकत न हो। उनका मुख्य जोर इस बात पर है कि सुरक्षा परिषद में दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों और देशों को अधिक और बेहतर प्रतिनिधित्व मिले। वह चाहते हैं कि फैसले लेने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक हो और आज की वैश्विक परिस्थितियों के अनुकूल हो। उनके अनुसार, वर्तमान व्यवस्था में शक्ति का संतुलन बिगड़ा हुआ है जिसे ठीक करना अनिवार्य है।
संयुक्त राष्ट्र सुधारों पर बढ़ती वैश्विक बहस
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की वीटो व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले एर्दोगन अकेले नेता नहीं हैं, बल्कि समय-समय पर अन्य देशों ने भी इस पर आपत्ति जताई है। इसी साल जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल ने भी वीटो पावर की वजह से सुरक्षा परिषद में निर्णय लेने की प्रक्रिया में आने वाली बाधाओं की कड़ी आलोचना की थी। अब एर्दोगन की इस ताजा और मुखर मांग से एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा व्यवस्था और वीटो पावर की प्रासंगिकता को लेकर वैश्विक बहस तेज हो गई है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि वीटो पावर को खत्म करना कोई आसान काम नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में बड़े बदलाव करने होंगे और इसके लिए उन पांच स्थायी सदस्यों की सहमति भी आवश्यक होगी जिनके पास वर्तमान में यह शक्ति है। फिर भी, एर्दोगन की इस अपील ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुधारों की आवश्यकता को एक नई दिशा दी है।
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