भारत सरकार चीन से एफडीआई नियमों में ढील देने पर कर रही विचार

भारत सरकार चीन से आने वाले एफडीआई नियमों में ढील देने और प्रेस नोट 3 की समीक्षा करने पर विचार कर रही है। जानें इसका विनिर्माण क्षेत्र पर क्या असर होगा।

Feb 16, 2026 - 19:35
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भारत सरकार चीन से एफडीआई नियमों में ढील देने पर कर रही विचार

भारत सरकार चीन से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव करने की प्रक्रिया में है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सरकार 'प्रेस नोट 3' की समीक्षा कर रही है, जिसके तहत छोटे निवेशों को सरकारी मंजूरी के बिना प्रवेश मिल सकता है। यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब सीमा पर तनाव कम करने के प्रयास जारी हैं और घरेलू विनिर्माण क्षेत्र को तकनीकी सहयोग की आवश्यकता है। अधिकारियों के अनुसार, इस समीक्षा का मुख्य उद्देश्य उन भारतीय कंपनियों को राहत देना है जो पूंजी और उन्नत तकनीक के लिए विदेशी भागीदारों पर निर्भर हैं।

'प्रेस नोट 3' की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति

अप्रैल 2020 में भारत सरकार ने 'प्रेस नोट 3' जारी किया था, जिसने निवेश नियमों को कड़ा कर दिया था। इस नियम के तहत भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले किसी भी निवेश के लिए सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी गई थी। उस समय इस कदम का प्राथमिक उद्देश्य कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय कंपनियों के अवसरवादी अधिग्रहण को रोकना था। इस नियम के लागू होने के बाद से चीन से आने वाले निवेश प्रस्तावों की जांच प्रक्रिया काफी जटिल और समय लेने वाली हो गई थी, जिससे कई औद्योगिक परियोजनाओं में देरी हुई।

'डी मिनिमिस' सीमा और छोटे निवेश का प्रस्ताव

रिपोर्ट के अनुसार, सरकार अब एक 'डी मिनिमिस' (de minimis) सीमा तय करने पर विचार कर रही है और इस प्रावधान के तहत यदि कोई निवेश एक निश्चित छोटी राशि या हिस्सेदारी तक सीमित है, तो उसे सरकारी मंजूरी के लंबे और जटिल मार्ग से गुजरने की आवश्यकता नहीं होगी। अधिकारियों का कहना है कि वे इस बात का आकलन कर रहे हैं कि क्या छोटे निवेशों को ऑटोमैटिक रूट के माध्यम से अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रेस नोट 3 को पूरी तरह से वापस नहीं लिया जाएगा, बल्कि इसमें केवल व्यावहारिक ढील दी जाएगी ताकि व्यापारिक सुगमता बनी रहे।

इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में संयुक्त उद्यम की आवश्यकता

भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग ने सरकार से चीनी कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम (Joint Venture) बनाने की अनुमति देने का आग्रह किया है और उद्योग जगत का तर्क है कि भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए चीनी आपूर्ति श्रृंखला और उनकी विशेषज्ञता अनिवार्य है। कंपनियों ने सुझाव दिया है कि चीनी भागीदारों को संयुक्त उद्यमों में अधिकतम 26% तक की हिस्सेदारी की अनुमति दी जानी चाहिए। 26% की यह सीमा इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे भारतीय प्रमोटरों के पास कंपनी का प्रभावी नियंत्रण बना रहेगा, जबकि उन्हें आवश्यक तकनीक और निवेश प्राप्त हो सकेगा।

विनिर्माण क्षमता और आर्थिक दृष्टिकोण

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, चीन से आने वाले सामानों पर केवल आयात शुल्क लगाना पर्याप्त नहीं है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्यों ने सुझाव दिया है कि चीन से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को सावधानीपूर्वक अनुमति देना अधिक प्रभावी हो सकता है। तर्क यह है कि यदि चीनी कंपनियां भारत में अपनी विनिर्माण इकाइयां स्थापित करती हैं, तो इससे न केवल घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ेगी बल्कि आयात पर निर्भरता भी कम होगी। इससे 'मेक इन इंडिया' पहल को मजबूती मिलेगी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। निजी क्षेत्र में निवेश की कमी को देखते हुए विदेशी पूंजी का प्रवाह एक महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है।

सुरक्षा प्रोटोकॉल और रणनीतिक निगरानी

नियमों में ढील देने के विचार के बावजूद, सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करने के रुख पर कायम है। अधिकारियों के अनुसार, बड़े और रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में आने वाले निवेश प्रस्तावों की सख्त जांच जारी रहेगी। गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय प्रत्येक प्रस्ताव का बारीकी से विश्लेषण करेंगे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि निवेश का स्रोत किसी भी प्रकार के सुरक्षा जोखिम से जुड़ा न हो। 'डी मिनिमिस' छूट केवल उन क्षेत्रों और निवेशों के लिए होगी जो रणनीतिक रूप से कम संवेदनशील माने जाते हैं और सरकार का ध्यान इस बात पर है कि आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच एक संतुलन स्थापित किया जा सके।

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