महिला आरक्षण संशोधन: लोकसभा में बहुमत से चूकी मोदी सरकार, क्या यह सोची-समझी रणनीति?

लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन पर वोटिंग के दौरान मोदी सरकार बहुमत जुटाने में विफल रही। जानें आंकड़ों का पूरा गणित और राजनीतिक प्रभाव।

Apr 19, 2026 - 08:35
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महिला आरक्षण संशोधन: लोकसभा में बहुमत से चूकी मोदी सरकार, क्या यह सोची-समझी रणनीति?

लोकसभा में वोटिंग का पूरा गणित और आंकड़ों का खेल

नारी शक्ति वंदन अधिनियम से जुड़े संविधान संशोधन पर शुक्रवार रात लोकसभा में मतदान हुआ। इस दौरान सदन में कुल 528 सांसद मौजूद थे। संविधान संशोधन को पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोटों की आवश्यकता थी, लेकिन सत्ता पक्ष केवल 298 वोटों पर ही सिमट गया। दूसरी ओर, विपक्ष को कुल 230 वोट मिले। आंकड़ों के इस खेल में दिलचस्प बात यह रही कि विपक्ष ने 235 वोटों का दावा किया था, लेकिन उनके 5 वोट कम पड़े। वहीं, सरकार के पास 293 का अपना आंकड़ा था, जिसे 5 अतिरिक्त वोट प्राप्त हुए। इनमें वाईएस जगनमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआरसीपी के चार सांसद और एक निर्दलीय का समर्थन शामिल रहा।

ऐतिहासिक संदर्भ: जब पहले भी सदन में गिरीं सरकारें

2014 के बाद यह पहली बार है जब मोदी सरकार किसी बिल पर स्पष्ट बहुमत जुटाने में विफल रही है। इससे पहले 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा लाया गया आतंकवाद निरोधक कानून (POTA) राज्यसभा में गिर गया था। हालांकि बाद में इसे संयुक्त सत्र बुलाकर पास करा लिया गया था। इसी तरह, 1989 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया 64वां संविधान संशोधन (पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने के लिए) भी राज्यसभा में गिर गया था। बाद में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में यह 73वें संशोधन के रूप में लाया गया। मोदी सरकार ने इससे पहले कृषि कानून 2020 को पास करने के बाद वापस लिया था और भूमि अधिग्रहण बिल 2015 को ऑर्डिनेंस के जरिए लागू किया था लेकिन बाद में बिल नहीं लाया गया।

विपक्ष का तर्क और संघीय ढांचे की रक्षा का सवाल

संसद में विपक्ष ने इस मुद्दे को महिला आरक्षण से आगे बढ़ाया और इसे परिसीमन और संघीय संतुलन से जोड़ा। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल समेत कई नेताओं ने इसे राज्यों के बीच पावर बैलेंस का सवाल बताया। नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में ही पास हो चुका है, जिसे 16 अप्रैल रात 10 बजे एक्ट के तौर पर नोटिफाई किया गया। लेकिन इसका क्रियान्वयन जनगणना और परिसीमन से जुड़ा है। विपक्ष इसे संघीय ढांचे की रक्षा की लड़ाई बता रहा है, यानी संसद के भीतर की हार चुनावी मैदान में अलग-अलग नैरेटिव बनकर सामने आएगी।

सरकार का काउंटर और उत्तर-दक्षिण का नया विवाद

इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का काउंटर भी तैयार था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के सवाल पर जवाब तैयार रखा था। इस मुद्दे को महिला प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के फ्रेम में रखा जाएगा। सरकार का तर्क है कि परिसीमन से SC/ST सीटें भी बढ़तीं लेकिन विपक्ष ने इसका समर्थन नहीं किया और इस बहस में एक नया एंगल 'उत्तर बनाम दक्षिण' का भी उभरा है। जनसंख्या आधारित परिसीमन से बड़े राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है, जबकि दक्षिणी राज्यों में हिस्सेदारी घटने की आशंका जताई जा रही है। सरकार इसे महिला आरक्षण के विरोध के रूप में पेश कर रही है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक नक्शे की नई बिसात मान रहा है।

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