विदेशी निवेशकों की चांदी: जून तिमाही में सेंसेक्स और निफ्टी को पछाड़ा, मिला बंपर रिटर्न

जून तिमाही में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने निफ्टी और सेंसेक्स को पीछे छोड़ते हुए 10 से 37 प्रतिशत तक का रिटर्न हासिल किया है। जानें उनकी निवेश रणनीति।

Aug 14, 2026 - 14:35
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विदेशी निवेशकों की चांदी: जून तिमाही में सेंसेक्स और निफ्टी को पछाड़ा, मिला बंपर रिटर्न

भारतीय शेयर बाजार के लिए चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है। वैश्विक स्तर पर मंदी के बादलों और भू-राजनीतिक तनाव के बीच, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी एफपीआई ने भारतीय इक्विटी बाजार में जबरदस्त सूझबूझ का परिचय दिया है। जून तिमाही के दौरान, जहां आम निवेशक बाजार की अस्थिरता से चिंतित थे, वहीं बड़े अंतरराष्ट्रीय फंड्स ने भारतीय बाजार से शानदार मुनाफा कमाया है। इन विदेशी निवेशकों के पोर्टफोलियो की वैल्यू में हुई बढ़ोतरी ने शेयर बाजार के मुख्य सूचकांकों को भी पीछे छोड़ दिया है। यह प्रदर्शन दर्शाता है कि सही समय पर सही सेक्टर्स का चुनाव और जोखिम प्रबंधन किस तरह से बड़े रिटर्न दिला सकता है। एफपीआई ने बाजार की हर गिरावट को एक अवसर के रूप में देखा और वैल्यू बाइंग के जरिए अपने पोर्टफोलियो को मजबूत किया।

एफपीआई का शानदार प्रदर्शन और बेंचमार्क इंडेक्स की स्थिति

प्राइम डेटाबेस द्वारा किए गए एक विस्तृत अध्ययन के अनुसार, जून तिमाही में भारतीय इक्विटी में अपना भरोसा बनाए रखने वाले गोल्डमैन सैक्स, कैपिटल ग्रुप और अन्य बड़े विदेशी फंड्स को इसका भरपूर लाभ मिला है और यह वह दौर था जब ईरान संकट के तुरंत बाद ज्यादातर विदेशी निवेशक स्थानीय रिस्की एसेट्स से बाहर निकल रहे थे। अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि भारत में सक्रिय टॉप 20 विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों में से कम से कम 75 प्रतिशत के पोर्टफोलियो की वैल्यू में 10 प्रतिशत से लेकर 37 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी देखी गई। अगर हम इसकी तुलना इसी अवधि के दौरान सेंसेक्स और निफ्टी के प्रदर्शन से करें, तो अंतर साफ नजर आता है। इस तिमाही में सेंसेक्स में लगभग 6 पॉइंट 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि निफ्टी 6 पॉइंट 8 प्रतिशत बढ़ा। एफपीआई का रिटर्न इन मुख्य सूचकांकों की तुलना में काफी अधिक रहा है, जो उनकी सटीक निवेश रणनीति को दर्शाता है।

मिडकैप और स्मॉलकैप से मिला सहारा

विदेशी निवेशकों की इस सफलता के पीछे मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों पर उनका विशेष फोकस रहा है। बे कैपिटल के मैनेजिंग पार्टनर और सीआईओ केयूर मजूमदार के अनुसार, हालिया बिकवाली मुख्य रूप से इंडेक्स में ज्यादा वेटेज वाले शेयरों, जैसे बैंकों और आईटी कंपनियों में देखी गई। इसके विपरीत, कई मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों के साथ-साथ नए जमाने के बिजनेस ने शानदार प्रदर्शन किया है। आंकड़ों पर नजर डालें तो बीएसई मिड-कैप 150 में 17 प्रतिशत और बीएसई स्मॉल-कैप 250 में 24 पॉइंट 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। जिन फंड्स ने ब्रॉडर मार्केट में सही शेयरों को चुना, उन्होंने बेंचमार्क की तुलना में कहीं बेहतर प्रदर्शन किया। कैपिटल ग्रुप, आईएनक्यू होल्डिंग्स एलएलसी, फिडेलिटी, आईएफसी इमर्जिंग एशिया फंड, गोल्डमैन सैक्स, इंटरनेशनल अपॉर्चुनिटीज फंड, इंडसइंड इंटरनेशनल होल्डिंग्स, नॉर्दर्न टीके वेंचर्स, नालंदा और जीक्यूजी पार्टनर्स जैसे एफपीआई के फंड इस दौड़ में सबसे आगे रहे हैं।

वैश्विक बाजारों से तुलना और भारतीय बाजार की मजबूती

हालांकि भारतीय बाजार ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन वैश्विक स्तर पर कुछ अन्य बाजारों में और भी अधिक तेजी देखी गई और डॉलर के हिसाब से चीन में 22 पॉइंट 2 प्रतिशत, ताइवान में 46 पॉइंट 3 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया में 64 पॉइंट 24 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इन देशों में मुख्य रूप से सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े शेयरों में आई तेजी ने सूचकांकों को ऊपर खींचा और एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स में भी 23 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि एआई से जुड़े ट्रेड कम होने के बाद पूर्वी एशियाई सूचकांकों में गिरावट आई है, जबकि भारतीय बाजार में एफपीआई का प्रदर्शन अधिक स्थिर रहा है। यह साबित करता है कि भारत का बाजार स्टॉक चुनने वालों के लिए एक बेहतरीन जगह है, जहां पोर्टफोलियो से मिलने वाला रिटर्न मुख्य इंडेक्स के रिटर्न से काफी अलग और बेहतर हो सकता है।

निवेशकों के लिए बड़ी सीख

विदेशी निवेशकों के इस प्रदर्शन से आम निवेशकों के लिए भी बड़ी सीख छिपी है और एफपीआई ने न केवल सही समय पर कैपिटल री-एलोकेशन किया, बल्कि जोखिम को संतुलित करने के लिए अपने पोर्टफोलियो में विविधता भी लाई। उन्होंने केवल बड़े शेयरों पर निर्भर रहने के बजाय उभरते हुए सेक्टर्स और मिड-कैप कंपनियों पर दांव लगाया। इसके अलावा, बाजार की अस्थिरता के बीच घबराने के बजाय उन्होंने हर बड़ी गिरावट का फायदा उठाकर खरीदारी की। पोर्टफोलियो की वैल्यू में यह बढ़ोतरी केवल शेयरों की कीमतों में वृद्धि से ही नहीं, बल्कि नई और समझदारी भरी खरीदारी की वजह से भी हुई है। आने वाले समय में भी विदेशी निवेशकों की यह रणनीति भारतीय बाजार में उनके दबदबे को बनाए रख सकती है, बशर्ते वे सही शेयरों की पहचान करना जारी रखें।

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