शेयर बाजार में मार्जिन ट्रेडिंग का रिकॉर्ड: 1 लाख 27 हजार करोड़ रुपये पर पहुंचा कर्ज
भारत में मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) बुक मई 2026 में 1 लाख 27 हजार करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। विशेषज्ञों ने बाजार में लीवरेज बढ़ने पर चिंता जताई है।
भारतीय शेयर बाजार में निवेश के लिए उधार लेने की प्रवृत्ति अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। केयरएज रेटिंग्स (CareEdge Ratings) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मई 2026 तक भारत का औसत मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) बुक सालाना आधार पर 65 दशमलव 4 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 1 लाख 27 हजार करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा जनवरी के पिछले रिकॉर्ड स्तर को भी पीछे छोड़ चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में लीवरेज यानी उधार आधारित निवेश का यह बढ़ता स्तर एक बड़े जोखिम का संकेत दे रहा है, जो बाजार में गिरावट आने पर पूरे वित्तीय तंत्र को प्रभावित कर सकता है।
क्या है मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी और यह कैसे काम करती है?
मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) एक ऐसी सुविधा है जिसके तहत निवेशक अपनी कम पूंजी लगाकर अधिक मूल्य के शेयर खरीद सकता है और इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि कोई ब्रोकर 3:1 का लीवरेज देता है, तो निवेशक केवल 25 रुपये लगाकर 100 रुपये के शेयर खरीद सकता है। इसमें बाकी के 75 रुपये ब्रोकर द्वारा कर्ज के रूप में दिए जाते हैं। हालांकि यह सुविधा मुनाफे की संभावना को बढ़ा देती है, लेकिन बाजार में गिरावट की स्थिति में यह नुकसान को भी कई गुना बढ़ा देती है और यही कारण है कि विशेषज्ञ रिटेल निवेशकों को इस बढ़ते कर्ज के प्रति आगाह कर रहे हैं।
बाजार की स्थिति और विदेशी निवेशकों का रुख
रिपोर्ट में एक दिलचस्प तथ्य यह सामने आया है कि जहां एक तरफ निवेशक उधार लेकर शेयर खरीद रहे हैं, वहीं बाजार में कुल ट्रेडिंग वॉल्यूम लगभग स्थिर बना हुआ है और मई 2026 में फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) और इक्विटी बाजार का औसत दैनिक कारोबार स्थिर रहा है। इसका एक मुख्य कारण डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग पर बढ़ा हुआ सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) है, जिससे कारोबार की लागत बढ़ गई है। दूसरी ओर, विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) इस साल अब तक भारतीय शेयर बाजार से करीब 2 लाख 80 हजार करोड़ रुपये की भारी निकासी कर चुके हैं। विदेशी निवेशकों की इस बिकवाली के बीच घरेलू निवेशकों का उधार लेकर निवेश करना चिंता का विषय बना हुआ है।
तरलता का संकट और मिडकैप-स्मॉलकैप का जोखिम
विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि MTF का एक बड़ा हिस्सा ऐसे शेयरों में लगा है जिनमें पर्याप्त तरलता (Liquidity) नहीं है। आंकड़ों के अनुसार, पूरे उद्योग के MTF बुक का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा गैर-F&O शेयरों में लगा है, जिनमें मुख्य रूप से मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियां शामिल हैं। यदि इन शेयरों में तेज गिरावट आती है, तो ब्रोकर निवेशकों से अतिरिक्त मार्जिन की मांग करेंगे। यदि निवेशक समय पर पैसा नहीं जुटा पाते, तो ब्रोकर उनकी होल्डिंग को बाजार में बेचने लगेंगे। इससे बाजार में गिरावट और भी तेज हो सकती है क्योंकि इन शेयरों में खरीदार कम होते हैं।
ब्रोकरों पर बढ़ता दबाव और आरबीआई के नए नियम
इस स्थिति का जोखिम केवल निवेशकों तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्रोकरों पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। जेरोधा (Zerodha) के सीईओ नितिन कामथ ने इस मुद्दे पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि यदि बाजार में लगातार लोअर सर्किट लगते हैं और खरीदार नहीं मिलते, तो ब्रोकरों को MTF पोजिशन से भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ सकता है। फिलहाल पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से बाजार को थोड़ी राहत मिली है, लेकिन असली परीक्षा जुलाई 2026 से होगी। इस दौरान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए नियामकीय नियम लागू होने वाले हैं, जो बाजार की लिक्विडिटी और भारी लीवरेज के सहारे निवेश करने वालों की क्षमता को परखेंगे।
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