समय रैना शो: तंजानियाई छात्र के वजीफे पर खुलासे से भड़के भारतीय टैक्सपेयर्स, छिड़ी बड़ी बहस

समय रैना के शो में एक तंजानियाई छात्र ने खुलासा किया कि वह भारत सरकार से मिलने वाला वजीफा अपने घर भेजता है, जिससे भारतीय टैक्सपेयर्स भड़क गए हैं।

Aug 13, 2026 - 12:35
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समय रैना शो: तंजानियाई छात्र के वजीफे पर खुलासे से भड़के भारतीय टैक्सपेयर्स, छिड़ी बड़ी बहस

मशहूर स्टैंडअप कॉमेडियन समय रैना का शो इंडियाज गॉट लेटेंट एक बार फिर सुर्खियों में है। हालांकि इस बार चर्चा का विषय कोई कॉमेडी एक्ट नहीं बल्कि एक विदेशी छात्र द्वारा किया गया खुलासा है। इस खुलासे ने भारतीय करदाताओं के बीच एक नई बहस छेड़ दी है और लोग सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब शो में आए एक तंजानियाई छात्र ने अपनी छात्रवृत्ति और वजीफे के इस्तेमाल को लेकर कुछ ऐसी बातें कहीं जो भारतीय टैक्सपेयर्स को रास नहीं आईं।

तंजानियाई छात्र का चौंकाने वाला खुलासा

विवाद की जड़ वह पल है जब समय रैना के शो में तंजानिया से आए एक छात्र ने अपनी पढ़ाई और खर्चों के बारे में बात की। छात्र ने बताया कि भारत में पढ़ाई के दौरान उसे भारत सरकार की ओर से छात्रवृत्ति और हर महीने एक निश्चित स्टाइपेंड यानी वजीफा मिलता है। जब उससे यह पूछा गया कि वह अपने पैसों का प्रबंधन कैसे करता है, तो उसने कथित तौर पर कहा कि सरकार से मिलने वाले इसी वजीफे में से वह कुछ हिस्सा बचा लेता है और उसे तंजानिया में अपनी मां को भेज देता है। छात्र के इस बयान ने सोशल मीडिया पर एक बड़ा हंगामा खड़ा कर दिया है और लोग इस पर तीखी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

सोशल मीडिया पर टैक्सपेयर्स का फूटा गुस्सा

इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब नेहा पटेल नाम की एक एक्स यूजर ने इस बातचीत का वीडियो क्लिप साझा किया। नेहा ने अपनी पोस्ट में सीधे तौर पर सरकार और इस व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि वह इनकम टैक्स इसलिए नहीं भरती हैं ताकि उनकी मेहनत की कमाई तंजानिया भेज दी जाए। उन्होंने इसे हर टैक्स देने वाले भारतीय का अपमान बताया। नेहा ने इस स्थिति की तुलना एक ऐसे परिवार से की जो अपने बच्चों को तो ठीक से खाना नहीं दे पाता लेकिन दुनिया के सामने अच्छा बनने के लिए पड़ोसियों के बच्चों पर पैसे लुटाता है। इस पोस्ट के बाद बड़ी संख्या में लोग उनके समर्थन में उतर आए और अपनी नाराजगी व्यक्त की।

भारतीय छात्रों के संघर्ष से तुलना

टैक्सपेयर्स के गुस्से का एक बड़ा कारण भारतीय छात्रों का संघर्ष भी है और सोशल मीडिया पर कई लोगों ने तर्क दिया कि एक तरफ भारत के लाखों छात्र आईआईटी, एम्स और दिल्ली यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में हॉस्टल की एक सीट और किताबों के लिए तरस रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विदेशी छात्रों को भारतीय करदाताओं के पैसे से आर्थिक मदद दी जा रही है। लोगों का कहना है कि जब देश के अपने छात्र संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं, तो विदेशी छात्रों को वजीफा देकर उसे दूसरे देश भेजने की अनुमति देना तर्कसंगत नहीं लगता। इस मुद्दे ने देश के भीतर शिक्षा के बजट और प्राथमिकताओं पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है।

कूटनीति और आईसीसीआर का पक्ष

हालांकि इस विवाद के बीच कुछ लोगों ने भारत की अंतर्राष्ट्रीय नीतियों का बचाव भी किया है। चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद यानी आईसीसीआर के तहत विदेशी छात्रों को भारत में रहने और खाने के लिए लगभग 20000 रुपये प्रति माह का स्टाइपेंड दिया जाता है। समर्थकों का कहना है कि यह एक सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया है जिसे शिक्षा कूटनीति कहा जाता है। उनके अनुसार इन छात्रवृत्तियों के बदले भारत को अफ्रीकी और अन्य देशों में व्यापारिक और रणनीतिक लाभ मिलते हैं। यह भारत की सॉफ्ट पावर को बढ़ाने का एक तरीका है जिससे भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश को मजबूती मिलती है।

वैश्विक छात्र विनिमय कार्यक्रमों का महत्व

बहस में यह पहलू भी उभर कर आया कि छात्र विनिमय कार्यक्रम केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। कई यूजर्स ने याद दिलाया कि एरास्मस मुंडस जैसी विदेशी छात्रवृत्तियों का सबसे ज्यादा फायदा भारतीय छात्रों को ही मिलता है और जब भारतीय छात्र अमेरिका, यूरोप या कोरिया जैसे देशों में जाकर पढ़ाई करते हैं, तो वहां की सरकारें भी उन्हें इसी तरह की वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं। तर्क यह दिया जा रहा है कि यदि भारत चाहता है कि उसके छात्र विदेशों में जाकर पढ़ें और वहां की सुविधाओं का लाभ उठाएं, तो उसे भी अपने यहां विदेशी छात्रों को आमंत्रित करना होगा। फिलहाल यह मुद्दा सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है और लोग इस पर अपनी अलग-अलग राय रख रहे हैं।

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