ओबामा की डील रद्द करके ट्रंप ने आखिर कौन सा तीर मारा? जानें US-Iran समझौते का सच
अमेरिका और ईरान के बीच 108 दिनों के युद्ध के बाद शांति समझौता हुआ है। जानें ओबामा की 2015 की डील और ट्रंप की 2025 की नई डील के बीच का पूरा अंतर और इतिहास।
अमेरिका और ईरान के बीच 108 दिनों तक चले भीषण खून-खराबे और सैन्य संघर्ष के बाद आखिरकार दोनों देश एक शांति समझौते पर सहमत हो गए हैं। इस ऐतिहासिक समझौते के तहत मध्य पूर्व के सभी मोर्चों पर, जिसमें लेबनान भी शामिल है, तुरंत युद्ध विराम लागू करने पर सहमति बनी है। शांति समझौते की लगभग सभी महत्वपूर्ण शर्तें अब दुनिया के सामने आ चुकी हैं। इस समझौते की सबसे प्रमुख शर्त यह है कि ईरान भविष्य में कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं करेगा और इसके साथ ही, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए तुरंत खोल दिया जाएगा। स्विट्जरलैंड में 19 जून को एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर होते ही यह संधि पूरी तरह से प्रभावी हो जाएगी। हालांकि, इस घटनाक्रम के बीच अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि अंत में यही समझौता करना था, तो ओबामा की पुरानी डील को रद्द करने और ईरान के साथ युद्ध में उलझने की क्या आवश्यकता थी।
अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु विवाद का इतिहास
अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर विवाद की शुरुआत साल 2002 में हुई थी। उस समय पहली बार दुनिया को यह पता चला कि ईरान नतांज और अरक जैसे स्थानों पर गुप्त रूप से परमाणु कार्यक्रम संचालित कर रहा है। अमेरिका को अंदेशा था कि ईरान इन संयंत्रों के जरिए परमाणु बम बनाने की क्षमता विकसित कर सकता है। इसके बाद ईरान पर अमेरिका, यूरोप और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) का दबाव बढ़ने लगा। साल 2006 के बाद संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और यूरोपीय देशों ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। इन प्रतिबंधों के कारण ईरान का तेल निर्यात और बैंकिंग क्षेत्र पूरी तरह चरमरा गया, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में फंस गई। इसी दबाव के बीच ईरान ने प्रतिबंधों से राहत पाने के लिए बातचीत के रास्ते तलाशने शुरू किए।
ओबामा का कार्यकाल और 2015 का JCPOA समझौता
साल 2009 में अमेरिका में डेमोक्रेट बराक ओबामा राष्ट्रपति बने। ओबामा का स्पष्ट मानना था कि युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। साल 2012 और 2013 के दौरान ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच गुप्त बातचीत का दौर शुरू हुआ। उस समय ईरान में डॉ. हसन रूहानी की सरकार थी, जो पश्चिम के साथ संबंधों को सुधारने के पक्ष में थे। इस गुप्त बातचीत ने औपचारिक चर्चा के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। इसके बाद अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, रूस, चीन और ईरान के बीच करीब 2 साल तक लंबी बातचीत चली। अंततः साल 2015 में JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते के तहत ओबामा ने ईरान के यूयूरेनियम संवर्धन को 3 दशमलव 67 प्रतिशत तक सीमित कर दिया था और संवर्धित यूरेनियम के भंडार को 300 किलोग्राम तक सीमित रखने की शर्त रखी थी। इसके बदले में ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों से बड़ी राहत दी गई थी।
ट्रंप का पहला कार्यकाल और समझौते से वापसी
साल 2017 में डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति के रूप में कार्यभार संभाला। चुनाव प्रचार के दौरान से ही ट्रंप ओबामा की इस डील को एकतरफा और खराब समझौता बताते रहे थे। मई 2018 में ट्रंप ने आधिकारिक तौर पर अमेरिका को JCPOA से बाहर कर लिया। ट्रंप का तर्क था कि ओबामा की डील स्थायी नहीं है क्योंकि इसके कुछ प्रतिबंध 15 साल बाद खत्म होने वाले थे। ट्रंप चाहते थे कि ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों, जैसे हिजबुल्लाह और हूती विद्रोहियों को मिलने वाले समर्थन पर भी रोक लगाई जाए। ट्रंप का मानना था कि ईरान पर अधिकतम दबाव (Maximum Pressure) डालकर उसे एक बेहतर और व्यापक समझौते के लिए मजबूर किया जा सकता है।
ट्रंप का दूसरा कार्यकाल और नया शांति समझौता
साल 2025 में डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के रूप में सत्ता में लौटे। इस बार उन्होंने अपने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) अभियान के तहत ईरान के साथ 19 जून को नए शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने का निर्णय लिया है। हालांकि, इस नई डील को लेकर विशेषज्ञों में मतभेद हैं। जानकारों का कहना है कि ओबामा की डील ट्रंप की वर्तमान डील की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट थी, जिसमें परमाणु कार्यक्रम की निगरानी के बेहतर इंतजाम थे। ट्रंप इस बार भी ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय समूहों के मुद्दे को समझौते में शामिल करने में पूरी तरह सफल नहीं रहे हैं, जबकि इन्हीं मुद्दों को लेकर वे ओबामा की आलोचना करते थे। अब सवाल यह उठ रहा है कि 108 दिनों के युद्ध और भारी नुकसान के बाद जो समझौता हुआ है, वह ओबामा की पुरानी डील से कितना अलग और बेहतर है।
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