चुनाव आयुक्त नियुक्ति केस: 28 सुनवाई के बाद सरकार बड़ी बेंच में बहस क्यों चाहती है? 2029 चुनाव से है कुछ कनेक्शन

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मामले में सरकार ने 28 सुनवाई के बाद बड़ी बेंच की मांग की है। जानें क्या है 2029 चुनाव का कनेक्शन और कोर्ट की टिप्पणी।

Jul 31, 2026 - 21:35
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चुनाव आयुक्त नियुक्ति केस: 28 सुनवाई के बाद सरकार बड़ी बेंच में बहस क्यों चाहती है? 2029 चुनाव से है कुछ कनेक्शन

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच कानूनी खींचतान तेज हो गई है और जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच इस मामले में अब तक 28 बार सुनवाई कर चुकी है। हालांकि, अब सरकार ने इस मामले को एक बड़ी संवैधानिक बेंच में ट्रांसफर करने की मांग की है। सरकार का तर्क है कि यह एक गंभीर संवैधानिक मसला है जिसमें कानून की व्याख्या की आवश्यकता है, इसलिए इसे कम से कम 5 जजों की बेंच द्वारा सुना जाना चाहिए।

सरकार की दलीलें और संवैधानिक प्रावधान

गुरुवार 30 जुलाई को हुई सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। तुषार मेहता ने अपनी दलीलों में अनुच्छेद 145 (3) का हवाला दिया, जो कहता है कि संविधान की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवालों की सुनवाई बड़ी बेंच को करनी चाहिए। मेहता ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 324 (2) के तहत संसद को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कानून बनाने का पूरा अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि अनुच्छेद 327 और 324 एक-दूसरे के पूरक हैं और इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे 5 जजों की बेंच के पास भेजा जाना चाहिए।

सॉलिसिटर जनरल ने कार्यपालिका के पक्ष में तर्क देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की पवित्रता पर शक नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर प्रधानमंत्री किसी को चुनते हैं और वह व्यक्ति भविष्य में कुछ गलत करता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि चयन प्रक्रिया ही गलत थी। मेहता ने दलील दी कि प्रधानमंत्री कार्यपालिका के प्रमुख होने के साथ-साथ विधायिका के प्रति भी जवाबदेह होते हैं। उन्होंने न्यायपालिका का उदाहरण देते हुए कहा कि देश में जज ही जज को चुनते हैं और पूरा देश इस प्रक्रिया पर विश्वास करता है। उनके अनुसार, यह नहीं कहा जा सकता कि जजों द्वारा जजों का चुनाव गलत है, ठीक उसी तरह कार्यपालिका की चयन प्रक्रिया पर भी भरोसा किया जाना चाहिए।

कोर्ट की टिप्पणी और याचिकाकर्ताओं का विरोध

तुषार मेहता की दलीलों पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और जब मेहता ने मंत्रियों और जजों की तुलना की, तो जस्टिस दत्ता ने उनसे पूछा कि क्या वह बता सकते हैं कि देश में कितने दागी मंत्री हैं? इस टिप्पणी ने कोर्ट के सख्त रुख को स्पष्ट कर दिया और सरकार ने 2023 के अनूप वर्णवाल केस का भी जिक्र किया, जिसकी सुनवाई 5 जजों की बेंच ने की थी। सरकार का कहना है कि उस फैसले में संसद को कानून बनाने का अधिकार दिया गया था, और यदि उस प्रक्रिया में किसी सुधार की बात है, तो उसे भी 5 जजों की बेंच को ही देखना चाहिए।

दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील विजय हंसरिया ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। हंसरिया ने कहा कि जब 28 दिनों की सुनवाई पूरी हो चुकी है, तब सरकार केस ट्रांसफर की मांग कर रही है, जो उनकी नीयत पर सवाल खड़े करता है। डॉक्टर जया गुप्ता और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने 2023 में यह याचिका दायर की थी। याचिका में मुख्य आपत्ति इस बात पर है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाए गए नए कानून में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) को चयन समिति से बाहर रखा गया है। एडीआर की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने भी पक्ष रखा।

2029 का चुनाव और रिटायरमेंट का गणित

इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू 2029 के लोकसभा चुनाव से जुड़ा है। मार्च 2029 में आम चुनाव प्रस्तावित हैं। इससे ठीक पहले चुनाव आयोग के शीर्ष पदों पर बड़े बदलाव होने वाले हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार जनवरी 2029 में रिटायर होने वाले हैं, जबकि चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू जुलाई 2028 में रिटायर हो जाएंगे। विजय हंसरिया के अनुसार, यदि यह मामला बड़ी बेंच को भेजा जाता है, तो सुनवाई में लंबा समय लग सकता है। ऐसी स्थिति में, सरकार वर्तमान प्रक्रिया के तहत ही नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कर पाएगी।

वर्तमान व्यवस्था में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली समिति में प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि इस प्रक्रिया में सरकार का पलड़ा भारी रहता है। सुनवाई के अंत में जस्टिस दत्ता ने एक पुरानी कहावत का जिक्र करते हुए कहा कि न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति न केवल पारदर्शी होनी चाहिए, बल्कि जनता की नजरों में पारदर्शी दिखनी भी चाहिए। कोर्ट ने अब सभी पक्षों से लिखित हलफनामा मांगा है, जिसके बाद इस पर अंतिम फैसला लिया जाएगा।

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