तमिलनाडु में गायों की कुर्बानी पर पूर्ण रोक नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का फैसला पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में गाय और बछड़े के वध पर मद्रास हाईकोर्ट द्वारा लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध पर अंतरिम रोक लगा दी है।

Jul 13, 2026 - 14:35
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तमिलनाडु में गायों की कुर्बानी पर पूर्ण रोक नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का फैसला पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को एक बड़ी कानूनी राहत प्रदान की है। अदालत ने सोमवार 13 जुलाई को मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था कि बकरीद या किसी अन्य दिन राज्य में किसी भी गाय या बछड़े की हत्या न हो। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि प्रथम दृष्टया हाईकोर्ट के आदेश के अंतिम हिस्से में सुधार की आवश्यकता दिखाई देती है। इसी आधार पर शीर्ष अदालत ने फिलहाल उस हिस्से के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है।

बेंच का आदेश और नोटिस जारी

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण आदेश दिया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में औपचारिक नोटिस जारी कर संबंधित पक्षों से जवाब भी मांगा है और यह मामला तब चर्चा में आया जब मद्रास हाईकोर्ट ने राज्यव्यापी प्रतिबंध का आदेश दिया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

हाईकोर्ट का पिछला आदेश और उसकी दलीलें

मद्रास हाईकोर्ट ने मई 2026 में सरकार को आदेश दिया था कि वह राज्य में बकरीद या किसी भी अन्य दिन गाय और बछड़ों की हत्या या कुर्बानी पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित करे। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि गाय की बलि देना इस्लाम में कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने एक सरकारी आदेश का भी उल्लेख किया था जिसमें कहा गया था कि गोहत्या पर रोक लगाने से दूध के उत्पादन में वृद्धि होगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा था कि बकरीद पर गोहत्या इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक परंपरा का हिस्सा नहीं है।

तमिलनाडु सरकार की कानूनी दलीलें

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा। सरकार ने दलील दी कि मद्रास हाईकोर्ट का यह आदेश राज्य के तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 के प्रावधानों के विपरीत है। इस कानून के अनुसार, 10 साल से ज्यादा उम्र की ऐसी गायों का वध किया जा सकता है जो काम करने या प्रजनन के योग्य नहीं रह गई हैं, बशर्ते इसके लिए सक्षम अधिकारी से आवश्यक प्रमाणपत्र प्राप्त किया गया हो। सरकार का कहना है कि हाईकोर्ट ने इस वैधानिक प्रावधान को नजरअंदाज कर दिया है।

विभिन्न कानूनों का हवाला

सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, स्लॉटर हाउस नियम, 2001, तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय अधिनियम, 1998 और इससे संबंधित अन्य नियम पशुओं के वध की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं। हालांकि, इन कानूनों में कहीं भी पशु वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का कोई प्रावधान नहीं है। सरकार के अनुसार, हाईकोर्ट ने मौजूदा वैधानिक ढांचे के विपरीत जाकर यह आदेश पारित किया है, जो कानूनी रूप से सही नहीं है।

जनहित याचिका और हाईकोर्ट का फैसला

यह पूरा मामला हिंदू मक्कल काची के महासचिव के. सूर्य प्रसांत द्वारा दायर एक जनहित याचिका से शुरू हुआ था और मद्रास हाईकोर्ट की बेंच ने 27 मई को बकरीद से ठीक पहले इस पर आदेश दिया था। याचिकाकर्ता ने मूल रूप से केवल यह मांग की थी कि बकरीद के दौरान गोवंश का वध केवल अधिकृत स्थानों पर ही किया जाए और इसे सार्वजनिक स्थानों पर करने से रोका जाए। हालांकि, हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद पूरे तमिलनाडु में किसी भी दिन गाय और बछड़े के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दे दिया। तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि हाईकोर्ट का फैसला विरोधाभासी है क्योंकि एक तरफ कोर्ट ने माना कि वध अधिकृत बूचड़खानों में होना चाहिए, वहीं दूसरी ओर उसने पूर्ण रोक लगा दी। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने उस राहत से कहीं आगे बढ़कर आदेश दिया जिसकी मांग याचिकाकर्ता ने की ही नहीं थी। अब सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद, मद्रास हाईकोर्ट द्वारा लगाया गया राज्यव्यापी पूर्ण प्रतिबंध प्रभावी नहीं रहेगा और मामले की आगे सुनवाई जारी रहेगी।

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