भारत की गिरती फर्टिलिटी रेट पर एलन मस्क की चेतावनी, दिल्ली का आंकड़ा फिनलैंड से भी कम

एलन मस्क ने भारत की गिरती जन्म दर पर चिंता जताई है। भारत की फर्टिलिटी रेट 1 दशमलव 9 है, जबकि दिल्ली में यह 1 दशमलव 2 के स्तर पर पहुंच गई है।

Jun 7, 2026 - 10:35
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भारत की गिरती फर्टिलिटी रेट पर एलन मस्क की चेतावनी, दिल्ली का आंकड़ा फिनलैंड से भी कम

स्पेसएक्स के सीईओ और दिग्गज अरबपति एलन मस्क ने भारत के जनसांख्यिकीय भविष्य को लेकर एक बड़ी चेतावनी जारी की है। मस्क का कहना है कि भारत की जन्म दर अब उस रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे गिर गई है जो जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक होती है और इसका सीधा अर्थ यह है कि भविष्य में भारत की आबादी घटने का खतरा पैदा हो गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी बात रखते हुए मस्क ने लिखा कि भारत की जन्म दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे आ चुकी है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि समाज के सबसे अधिक शिक्षित वर्ग के बीच यह गिरावट कई साल पहले ही दर्ज की जा चुकी थी। मस्क ने यह टिप्पणी एएफ पोस्ट नामक मीडिया आउटलेट द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के आधार पर की है।

रिप्लेसमेंट लेवल और गिरती जन्म दर

एएफ पोस्ट के दावों के अनुसार, भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब देश की कुल फर्टिलिटी रेट रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुंची है। आंकड़ों के मुताबिक, मात्र एक दशक के भीतर भारत की फर्टिलिटी रेट 2 दशमलव 3 से घटकर 1 दशमलव 9 के स्तर पर आ गई है। जनसंख्या विज्ञान के अनुसार, किसी भी देश की आबादी को स्थिर रखने के लिए 2 दशमलव 1 का रिप्लेसमेंट लेवल जरूरी माना जाता है। भारत का 1 दशमलव 9 का आंकड़ा यह दर्शाता है कि औसतन भारतीय महिलाएं अब उतनी संख्या में बच्चे पैदा नहीं कर रही हैं जो वर्तमान जनसंख्या को प्रतिस्थापित करने के लिए पर्याप्त हों। विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट भविष्य में कार्यबल की कमी का कारण बन सकती है।

दिल्ली की स्थिति फिनलैंड से भी गंभीर

रिपोर्ट में देश की राजधानी दिल्ली की स्थिति को विशेष रूप से चिंताजनक बताया गया है। दिल्ली में फर्टिलिटी रेट गिरकर मात्र 1 दशमलव 2 रह गई है। यह स्तर फिनलैंड जैसे विकसित देशों की जन्म दर से भी कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि जन्म दर में यह भारी गिरावट लंबे समय में देश की अर्थव्यवस्था, युवा आबादी के अनुपात और सामाजिक ढांचे पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है और दिल्ली जैसे महानगरों में यह बदलाव बहुत तेजी से देखा जा रहा है, जो भविष्य की चुनौतियों का संकेत है। यह तुलना दर्शाती है कि शहरी क्षेत्रों में जीवनशैली और आर्थिक कारणों से परिवार नियोजन के तरीकों में बड़ा बदलाव आया है।

यूएनएफपीए और द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट

इस पूरे मामले में द इकोनॉमिस्ट के एक लेख का भी संदर्भ दिया गया है, जिसका शीर्षक था कि भारत की आबादी जल्द ही घटने लगेगी और शायद यह गिरावट बहुत तेज होगी और पिछले साल यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (यूएनएफपीए) की स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन रिपोर्ट में भी इस बात की पुष्टि की गई थी कि भारत की कुल फर्टिलिटी रेट घटकर 1 दशमलव 9 जन्म प्रति महिला रह गई है। हालांकि भारत की मौजूदा आबादी 1 दशमलव 46 अरब से अधिक है और साल 2023 में भारत ने चीन को पछाड़कर दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश का दर्जा हासिल किया था, लेकिन प्रजनन दर के आंकड़े भविष्य की दूसरी तस्वीर पेश कर रहे हैं।

स्वास्थ्य और सामाजिक असमानताएं

यूएनएफपीए की वेबसाइट के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में प्रजनन दर में गिरावट के बावजूद भारत की आबादी एक अरब से काफी ऊपर बनी हुई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के बाद भी देश में बड़ी असमानताएं मौजूद हैं। मातृ मृत्यु दर और लैंगिक भेदभाव का स्तर अभी भी ऊंचा बना हुआ है। कम उम्र में विवाह और गर्भावस्था को 24 साल से कम उम्र की महिलाओं में मातृ मृत्यु के उच्च आंकड़ों के लिए जिम्मेदार माना गया है। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि घटती फर्टिलिटी रेट का वास्तविक असर आने वाले समय में स्पष्ट रूप से दिखाई देगा, जिससे देश के कार्यबल, संसाधनों के प्रबंधन और सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों पर गहरा असर पड़ेगा।

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