चुनाव आयोग में शक्ति संघर्ष: क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के पास है वीटो पावर?
चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों के बीच शक्तियों के बंटवारे और 14 लिखित आपत्तियों पर विस्तृत रिपोर्ट।
चुनाव आयोग के अंदर सब कुछ ठीक चल रहा है या नहीं, इस पर एक रिपोर्ट के बाद नई बहस छिड़ गई है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और काम करने के तरीके पर लिखित आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों में नए वोटरों की एंट्री, वोटर लिस्ट से नाम हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव और वोटर डेटाबेस को एक जगह से कंट्रोल करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। दोनों आयुक्तों ने कुछ कदमों को अनऑथराइज्ड और इललीगल तक बताया और हालांकि, ECI से जुड़े सूत्रों ने इन दावों से अलग तस्वीर पेश करते हुए कहा है कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले दोनों चुनाव आयुक्तों और CEC की मंजूरी से सर्वसम्मति में लिए गए। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में CEC ज्ञानेश कुमार के पास कितनी ताकत है? क्या दो चुनाव आयुक्त CEC के सामने बेबस हैं? क्या CEC अकेले कोई फैसला ले सकते हैं? और अगर तीनों के बीच मतभेद हो जाए तो आखिर फैसला किसका माना जाएगा? इन सवालों का जवाब संविधान के Article 324 और 2023 के चुनाव आयुक्त कानून में मिलता है।
चुनाव आयोग का ढांचा और संवैधानिक स्थिति
भारत का चुनाव आयोग संविधान के Article 324 के तहत बना संवैधानिक संस्थान है। इसमें एक Chief Election Commissioner यानी CEC और राष्ट्रपति जितने अन्य Election Commissioners तय करें, उतने EC हो सकते हैं। मौजूदा तीन सदस्यीय आयोग में ज्ञानेश कुमार CEC हैं, जबकि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी Election Commissioners हैं। CEC आयोग के चेयरमैन होते हैं। हालांकि, चेयरमैन होने का मतलब यह नहीं है कि CEC के पास बाकी दोनों आयुक्तों से ज्यादा वोटिंग पावर है। ECI अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर कहता है कि सभी Election Commissioners को डिसीजन लेने में बराबर की भूमिका हासिल है और बहुसदस्यीय आयोग में फैसले मेजॉरिटी वोट से लिए जाते हैं। 2023 का कानून भी CEC और ECs के बीच डिसीजन लेने में बराबरी की व्यवस्था रखता है। मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग की बैठकों और कामकाज में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन उन्हें अकेले पूरी चुनाव आयोग की तरफ से हर फैसला लेने का अधिकार नहीं है।
निर्णय लेने की प्रक्रिया और 2023 का कानून
2023 के कानून में कमीशन के काम के लिए कलेक्टिव डिसीजन लेने का प्रावधान है। कानून के मुताबिक आयोग का काम जहां तक संभव हो, सभी की सहमति से किया जाना चाहिए। 2023 की कानून की धारा 18 (1) कहती है कि चुनाव आयोग अपने कामकाज की प्रक्रिया और अलग-अलग कामों का बंटवारा सभी सदस्यों की सर्वसम्मति से तय कर सकता है। यानी CEC और Election Commissioners के बीच कौन सा काम किसे दिया जाएगा और आयोग किसी मामले पर किस प्रक्रिया से काम करेगा, यह तय करने के लिए सभी सदस्यों की सहमति जरूरी है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि आयोग का हर फैसला तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से ही होना जरूरी है। यह प्रावधान खास तौर पर कमीशन के कामकाज की प्रक्रिया और काम के बंटवारे से जुड़ा है। दोनों चुनाव आयुक्त केवल CEC की मदद करने वाले अधिकारी नहीं हैं। वे चुनाव आयोग के सदस्य हैं और आयोग के फैसलों में उनकी बराबर की भूमिका है।
क्या CEC ज्ञानेश कुमार दोनों EC को ओवररूल कर सकते हैं?
सिर्फ CEC होने के आधार पर ज्ञानेश कुमार अन्य दो आयुक्तों को ओवररूल नहीं कर सकते और 2023 के Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act में आयोग के कामकाज को लेकर Section 18 अहम है। इसके मुताबिक आयोग का काम जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। लेकिन अगर CEC और दूसरे इलेक्शन कमिश्नर के बीच किसी मुद्दे पर राय अलग हो जाती है, तो मामला मेजॉरिटी ओपिनियन यानी बहुमत से तय होगा। इसके लिए कानून की धारा 18 (2) में बकायदा प्रावधान लिखा हुआ है। इसका सीधा उदाहरण यह है कि अगर किसी मुद्दे पर ज्ञानेश कुमार की राय एक तरफ है और सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी दूसरी तरफ हैं, तो दो आयुक्तों की राय मेजॉरिटी होगी। दूसरी तरफ अगर CEC और एक EC एक राय में हैं और दूसरा EC अलग राय रखता है, तो CEC वाली तरफ का फैसला मेजॉरिटी से लागू होगा। इसलिए CEC के पास अकेले वीटो या फाइनल डिसीजन करने की शक्ति नहीं है।
14 आपत्तियों का पूरा मामला और विवाद के बिंदु
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों में नए वोटरों की एंट्री, वोटर लिस्ट से नाम हटाने, वोटर डेटाबेस तक अधिकारियों की पहुंच और कुछ एडमिनिस्ट्रेटिव फैसले शामिल थे और रिपोर्ट के मुताबिक मई में Form-6 में SIR से जुड़े सवाल जोड़े जाने पर दोनों EC ने आपत्ति की थी। उनका तर्क था कि Form-6 वैधानिक नियमों के तहत तय है और उसमें बदलाव के लिए Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन की जरूरत होगी। बाद में संधू ने इस बदलाव को अनऑथराइज्ड एंड इललीगल बताते हुए इसे हटाने की मांग की। इसी तरह ECINet और वोटर डेटाबेस को लेकर भी दोनों आयुक्तों ने सवाल उठाए। उन्होंने आशंका जताई कि वोटर लिस्ट के डेटा तक पहुंच धीरे-धीरे दिल्ली में सेंट्रलाइज हो रही है और इससे जमीन पर काम करने वाले Electoral Registration Officers की भूमिका प्रभावित हो सकती है और 16 और 24 अप्रैल को संधू और जोशी ने अधिकारियों को लिखकर कहा कि ECI के नाम से निकलने वाले कम्युनिकेशंस के लिए आयोग की मंजूरी जरूरी है।
पद से हटाने की प्रक्रिया में अंतर
डिसीजन मेकिंग में CEC और EC को बराबर की भूमिका मिली है, लेकिन पद से हटाने के मामले में दोनों की संवैधानिक स्थिति अलग है। संविधान के Article 324 के तहत CEC को सुप्रीम कोर्ट के जज के समान प्रक्रिया से हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में स्पेशल मेजॉरिटी से प्रस्ताव और उसके आधार पर राष्ट्रपति का आदेश जरूरी होता है। वहीं किसी अन्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए CEC की रिकमेंडेशन जरूरी होती है और pRS ने 2023 के कानून के एनालिसिस में इस अंतर को स्पष्ट किया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2023 में कहा था कि ECs के लिए CEC जैसी रिमूवल प्रोटेक्शन देना संसद के विचार का विषय है और इसके लिए संवैधानिक संशोधन की जरूरत होगी। यानी एक तरफ तीनों की डिसीजन मेकिंग पावर बराबर है, लेकिन दूसरी तरफ पद से हटाने की संवैधानिक सुरक्षा एक जैसी नहीं है। अगर कोई सदस्य लिखित तौर पर अपनी आपत्ति दर्ज करता है, तो वह आयोग के अंदर हुई असहमति का रिकॉर्ड बन जाता है, जो भविष्य में महत्वपूर्ण हो सकता है।
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