सांसद जॉन ब्रिटास ने दिल्ली पुलिस पर लगाया मारपीट का आरोप, CJI से स्वतंत्र जांच की मांग

सांसद जॉन ब्रिटास ने दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ पर मारपीट का आरोप लगाते हुए सीजेआई को पत्र लिखा है। उन्होंने स्वतंत्र एसआईटी जांच और साक्ष्यों की सुरक्षा की मांग की है।

Oct 12, 2026 - 08:35
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सांसद जॉन ब्रिटास ने दिल्ली पुलिस पर लगाया मारपीट का आरोप, CJI से स्वतंत्र जांच की मांग

राज्यसभा सांसद और माकपा (CPI-M) के वरिष्ठ नेता डॉ. जॉन ब्रिटास ने दिल्ली में पुलिस द्वारा उनके साथ किए गए कथित दुर्व्यवहार और मारपीट के मामले में न्याय की गुहार लगाई है। उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को एक औपचारिक पत्र लिखकर इस मामले में तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है और सांसद ने अनुरोध किया है कि इस पूरे प्रकरण की जांच दिल्ली पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) से पूरी तरह स्वतंत्र किसी एजेंसी के माध्यम से कराई जाए। इसके साथ ही उन्होंने यह भी मांग की है कि इस जांच प्रक्रिया को सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में रखा जाना चाहिए ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।

लोकतांत्रिक विरोध और कथित मारपीट का विवरण

डॉ. जॉन ब्रिटास ने अपने पत्र में आरोप लगाया है कि यह घटना उस समय हुई जब वह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित एक लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शन में शामिल थे। उन्होंने बताया कि जब वह मौके पर मौजूद पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे, तभी दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ के जवानों ने उनके साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया। सांसद का दावा है कि उन्हें जबरन घसीटा गया, उठाकर पुलिस वाहन में डाल दिया गया और वाहन के भीतर भी उनके साथ मारपीट की गई। इसके बाद उन्हें सड़क के किनारे छोड़ दिया गया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस अधिकारियों को उनके राज्यसभा सदस्य होने की जानकारी थी, फिर भी उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना का मुद्दा

सांसद ने अपने पत्र में एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने बताया कि जिस दिन यह घटना हुई, उससे कुछ ही घंटे पहले सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के प्रबंधन को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए थे। इन निर्देशों में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि शांतिपूर्ण और निहत्थे व्यक्तियों को केवल कानून के अनुसार ही हिरासत में लिया जाना चाहिए और सार्वजनिक परिवहन सेवाओं के सामान्य संचालन के साथ-साथ नागरिकों के स्वतंत्र आवागमन को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। ब्रिटास के अनुसार, इन निर्देशों के तत्काल बाद हुई यह घटना संवैधानिक अधिकारों और न्यायालय के आदेशों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

साक्ष्यों की सुरक्षा और अधिकारियों की जवाबदेही

जॉन ब्रिटास ने मांग की है कि इस मामले की जांच में केवल मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों तक ही सीमित न रहा जाए, बल्कि संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका और जिम्मेदारी भी तय की जाए। उन्होंने उल्लेख किया कि संबंधित पुलिस उपायुक्त (DCP) को इस घटना की जानकारी थी और उनके हस्तक्षेप के बाद ही उन्हें छोड़ा गया था। सांसद ने मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया है कि घटना से जुड़े सभी महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए और इसमें घटना के वीडियो, सीसीटीवी फुटेज, पुलिस वाहन की पहचान, ड्यूटी रोस्टर, आधिकारिक आदेश, वायरलेस संदेश और हिरासत से संबंधित सभी रिकॉर्ड शामिल होने चाहिए।

संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन और अनुच्छेद 32

पत्र में संविधान के अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। डॉ. ब्रिटास ने कहा कि अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार की रक्षा करते हैं, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार या संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना करना शारीरिक बल प्रयोग का आधार नहीं हो सकता। किसी भी प्रकार की हिरासत या बल प्रयोग कानूनसम्मत और आनुपातिक होना चाहिए। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि इस पत्र को अनुच्छेद 32 के तहत एक याचिका के रूप में देखा जाए, क्योंकि यह मामला केवल एक सांसद के साथ दुर्व्यवहार का नहीं, बल्कि आम नागरिकों की स्वतंत्रता और कानून के शासन से जुड़ा है।

स्वतंत्र एसआईटी और गवाहों की सुरक्षा की मांग

अंत में, राज्यसभा सांसद ने एक विशेष जांच टीम (SIT) के गठन का सुझाव दिया है, जिसमें दिल्ली पुलिस या सीआरपीएफ के वे अधिकारी शामिल न हों जो इस घटना का हिस्सा थे। उन्होंने मांग की है कि यह जांच टीम एक निर्धारित समयसीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपे। इसके अलावा, उन्होंने पत्रकारों और प्रत्यक्षदर्शियों को किसी भी संभावित दबाव या प्रतिशोध से सुरक्षा देने की भी अपील की है और ब्रिटास ने यह भी याद दिलाया कि इससे पहले भी विरोध-प्रदर्शनों के दौरान विपक्षी नेताओं को हिरासत में लेने और उन्हें भोजन तथा आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराने में देरी की खबरें आई थीं, जो चिंता का विषय हैं।

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