OBC क्रीमी लेयर मामला: केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत, 17 सितंबर तक के लिए टली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी क्रीमी लेयर मामले में केंद्र को राहत देने से इनकार किया। 17 सितंबर को होगी अगली सुनवाई। जानें 11 मार्च के आदेश और सरकार की चिंताओं के बारे में।

Sep 1, 2026 - 21:35
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OBC क्रीमी लेयर मामला: केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत, 17 सितंबर तक के लिए टली सुनवाई

ओबीसी क्रीमी लेयर मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई, जिसमें केंद्र सरकार को फिलहाल कोई राहत नहीं मिल सकी है। केंद्र सरकार ने अदालत से 11 मार्च को दिए गए आदेश को स्पष्ट करने और तत्काल राहत देने की मांग की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इससे साफ इनकार कर दिया। अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर को निर्धारित की गई है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की और सरकार की दलीलों को सुनने के बाद मामले को आगे के लिए टाल दिया। केंद्र सरकार मुख्य रूप से 11 मार्च को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश में बदलाव के साथ-साथ क्रीमी लेयर की परिभाषा में भी संशोधन की मांग कर रही है।

11 मार्च 2026 के फैसले की मुख्य बातें

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को दिए अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया था कि ओबीसी वर्ग में क्रीमी लेयर का निर्धारण करने के लिए केवल माता-पिता की वेतन से होने वाली आय को एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता है। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू), बैंकों या निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता के वेतन को आधार मानकर उनके बच्चों को केवल इसलिए आरक्षण के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता क्योंकि उनकी सैलरी तय सीमा से अधिक है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने यह माना था कि इस तरह का भेदभाव करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के तहत दिए गए समानता के सिद्धांत के पूरी तरह खिलाफ है।

सॉलिसिटर जनरल की दलीलें और प्रशासनिक चुनौतियां

इससे पहले 26 अगस्त को हुई सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए कहा था कि सरकार इस फैसले की समीक्षा या इसमें कोई संशोधन नहीं चाहती है। बल्कि, सरकार अदालत को उन जमीनी स्तर की कठिनाइयों से अवगत कराना चाहती है जो इस फैसले को पिछली तारीख से लागू करने में आ सकती हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि यदि इसे पिछली तारीख से लागू किया जाता है, तो ओबीसी उम्मीदवारों के पुराने बैचों की श्रेणी को नॉन-क्रीमी लेयर में बदलना होगा। इसके परिणामस्वरूप सिविल सेवाओं में कैडर, पद और सेवा आवंटन में बड़े पैमाने पर बदलाव करना अनिवार्य हो जाएगा। सॉलिसिटर जनरल ने चेतावनी दी कि आईएफएस, आईएएस और आईपीएस जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं में लंबे समय से कार्यरत उम्मीदवारों के लिए भी इसी तरह के बदलाव करने होंगे, जिससे प्रशासनिक स्तर पर भारी अराजकता फैल सकती है।

भर्तियों और शिक्षा पर दूरगामी प्रभाव

केंद्र सरकार का तर्क है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के फैसले को बिना किसी उचित नीतिगत हस्तक्षेप के लागू किया जाता है, तो इसका केंद्र सरकार के साथ-साथ 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों द्वारा की जाने वाली सरकारी भर्तियों पर बहुत गहरा असर पड़ेगा। इसके अलावा, उच्च शिक्षा संस्थानों में होने वाले प्रवेश पर भी इसका दूरगामी प्रभाव देखने को मिलेगा और सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि रेलवे, बैंक, डाक विभाग और अर्धसैनिक बलों जैसे देश के प्रमुख नियोक्ताओं और निकायों को क्रीमी लेयर के री-क्लासिफिकेशन यानी पुन: वर्गीकरण की मांग करने वाले लाखों आवेदनों और मुकदमों का सामना करना पड़ सकता है। इन्हीं जटिलताओं को देखते हुए सरकार ने अदालत से हस्तक्षेप की मांग की थी, जिस पर अब 17 सितंबर को विस्तार से चर्चा होगी।

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