Papmochani Ekadashi 2026: पापमोचनी एकादशी पर पूजा के समय पढ़ें ये व्रत कथा, मिलेगी सभी पापों से मुक्ति!

पापमोचनी एकादशी 2026 की तिथि, पूजा मुहूर्त और मेधावी ऋषि की पौराणिक व्रत कथा के बारे में विस्तार से जानें।

Mar 15, 2026 - 08:35
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Papmochani Ekadashi 2026: पापमोचनी एकादशी पर पूजा के समय पढ़ें ये व्रत कथा, मिलेगी सभी पापों से मुक्ति!

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है और चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह महत्वपूर्ण तिथि 14 मार्च को पड़ रही है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, यह एकादशी वर्ष की अंतिम एकादशी मानी जाती है, जो फाल्गुन और चैत्र मास के संधिकाल में आती है। इस दिन भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की आराधना की जाती है। शास्त्रों में उल्लेख है कि पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को मानसिक, वाचिक और शारीरिक पापों से मुक्ति प्राप्त होती है।

तिथि और शुभ मुहूर्त का विवरण

पंचांग गणना के अनुसार, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का प्रारंभ 13 मार्च 2026 को रात्रि 09:45 बजे होगा और इसका समापन 14 मार्च 2026 को रात्रि 08:12 बजे होगा। उदयातिथि की मान्यता के अनुसार, पापमोचनी एकादशी का व्रत 14 मार्च को ही रखा जाएगा। व्रत के पारण का समय 15 मार्च 2026 को प्रातः 06:31 बजे से प्रातः 08:52 बजे के बीच रहेगा। इस दौरान द्वादशी तिथि का विद्यमान होना अनिवार्य माना गया है और श्रद्धालु इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं और पूरे दिन निराहार या फलाहार रहकर भगवान विष्णु का ध्यान करते हैं।

मेधावी ऋषि और मंजुघोषा की पौराणिक कथा

पापमोचनी एकादशी की व्रत कथा अत्यंत प्राचीन और शिक्षाप्रद है। पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में चित्ररथ नामक एक अत्यंत सुंदर वन था, जहाँ मेधावी नाम के ऋषि कठोर तपस्या में लीन थे। उनकी तपस्या से भयभीत होकर देवराज इंद्र ने उनका तप भंग करने के लिए मंजुघोषा नामक अप्सरा को भेजा। मंजुघोषा ने अपने नृत्य, गायन और सौंदर्य से ऋषि को मोहित करने का प्रयास किया। कामदेव के प्रभाव और अप्सरा के आकर्षण में आकर मेधावी ऋषि अपनी तपस्या भूल गए और मंजुघोषा के साथ रति-क्रीड़ा में लीन हो गए। इस प्रकार 57 वर्ष का समय बीत गया, लेकिन ऋषि को समय का आभास नहीं हुआ।

ऋषि च्यवन का मार्गदर्शन और प्रायश्चित

जब मंजुघोषा ने वापस देवलोक जाने की अनुमति मांगी, तब मेधावी ऋषि को अपनी भूल और तपस्या के क्षय का बोध हुआ। क्रोधित होकर उन्होंने मंजुघोषा को पिशाचनी होने का श्राप दे दिया। श्राप से भयभीत अप्सरा ने क्षमा याचना की और मुक्ति का उपाय पूछा और ऋषि ने उसे चैत्र कृष्ण एकादशी यानी पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। इसके पश्चात मेधावी ऋषि अपने पिता च्यवन ऋषि के पास पहुंचे। च्यवन ऋषि ने पुत्र द्वारा किए गए कृत्य की निंदा की और उन्हें भी स्वयं के पापों के प्रायश्चित के लिए पापमोचनी एकादशी का व्रत करने का निर्देश दिया। पिता की आज्ञा मानकर मेधावी ऋषि ने पूर्ण निष्ठा से यह व्रत किया।

पूजा विधि और व्रत के नियम

पापमोचनी एकादशी के दिन पूजा की एक विशिष्ट विधि अपनाई जाती है और भक्त सुबह जल्दी उठकर पवित्र नदियों या घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान करते हैं। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। पूजा में पीले फूल, तुलसी दल, फल और पंचामृत का अर्पण किया जाता है। इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना और व्रत कथा सुनना अनिवार्य माना गया है। रात्रि के समय जागरण करने का भी विधान है, जिसमें भजन-कीर्तन के माध्यम से भगवान का स्मरण किया जाता है। अगले दिन द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।

धार्मिक महत्व और आध्यात्मिक फल

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