West Bengal Election: सुप्रीम कोर्ट में TMC का बड़ा दावा, 31 सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा कटे वोट

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में SIR प्रक्रिया के दौरान हटाए गए वोटों और जीत के अंतर को लेकर टीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।

May 11, 2026 - 18:35
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West Bengal Election: सुप्रीम कोर्ट में TMC का बड़ा दावा, 31 सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा कटे वोट

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणामों और मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया को लेकर कानूनी विवाद एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत में गरमा गया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि राज्य में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान बड़ी संख्या में मतों की कटौती की गई थी, जिसका सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ा है। पार्टी ने दावा किया कि कई विधानसभा सीटों पर जीत का अंतर उन वोटों की संख्या से काफी कम है जिन्हें एसआईआर प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से हटा दिया गया था। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टीएमसी को इस पहलू पर नए आवेदन दाखिल करने की अनुमति प्रदान कर दी है।

एसआईआर प्रक्रिया और टीएमसी के गंभीर तर्क

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान टीएमसी के वरिष्ठ वकील कल्याण बंद्योपाध्याय ने बेंच के समक्ष महत्वपूर्ण तथ्य रखे। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल की 31 विधानसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जीत का अंतर एसआईआर एडज्यूडिकेशन प्रोसेस के दौरान हटाए गए लोगों की संख्या से कम था। टीएमसी का तर्क है कि यदि इन मतदाताओं के नाम सूची से नहीं हटाए जाते, तो चुनाव के नतीजे अलग हो सकते थे। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी ने अदालत में स्पष्ट रूप से कहा कि एसआईआर के तहत रद्द की गई सीटों का पश्चिम बंगाल के समग्र चुनाव परिणाम पर व्यापक और निर्णायक असर पड़ा है।

आंकड़ों का गणित और चुनावी विसंगतियां

वकील कल्याण बंद्योपाध्याय ने अदालत को आंकड़ों के जरिए इस विसंगति को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने एक विशिष्ट उदाहरण देते हुए बताया कि एक उम्मीदवार उस विशेष क्षेत्र में मात्र 862 वोटों के अंतर से चुनाव हार गया, जबकि उसी क्षेत्र में एडज्यूडिकेशन प्रक्रिया के नाम पर मतदाता सूची से 5432 से अधिक लोगों के नाम हटा दिए गए थे। टीएमसी ने दावा किया कि पूरी चुनावी प्रक्रिया के दौरान टीएमसी और भाजपा के बीच कुल वोटों का अंतर लगभग 32 लाख था, जबकि अपीलेट ट्रिब्यूनल के सामने वर्तमान में लगभग 35 लाख अपीलें लंबित पड़ी हैं। उन्होंने जस्टिस बागची की पिछली टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि यदि जीत का अंतर हटाए गए मतदाताओं की संख्या से कम है, तो इस मामले की गहन न्यायिक जांच की आवश्यकता हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश और निर्वाचन आयोग का रुख

सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। बेंच ने कल्याण बंद्योपाध्याय को निर्देश दिया कि वे सभी आवश्यक विवरणों के साथ एक इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन (IA) फाइल करें। जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि चुनाव परिणामों पर पड़े प्रभाव और हटाए गए मतदाताओं के संबंध में जो भी तथ्य हैं, उनके लिए एक स्वतंत्र आईए की आवश्यकता होगी। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील दामा शेषाद्रि नायडू ने टीएमसी की दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह की शिकायतों का सही समाधान चुनाव याचिका (Election Petition) दायर करना है, न कि इस तरह की रिट याचिकाएं।

अपीलीय न्यायाधिकरण की चुनौतियां और भविष्य की कार्यवाही

सुनवाई के दौरान अपीलीय न्यायाधिकरण की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे। कल्याण बंद्योपाध्याय ने बेंच को सूचित किया कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवगणनम ने अपीलीय न्यायाधिकरण के सदस्य के रूप में अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इस पर सीजेआई ने कहा कि अदालत किसी को मजबूर नहीं कर सकती, लेकिन प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना होगी कि लंबित अपीलों पर तेजी से फैसला हो। वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने बेंच को बताया कि वर्तमान गति को देखते हुए अपीलीय न्यायाधिकरण को सभी लंबित अपीलों को निपटाने में कम से कम 4 साल का समय लगेगा। अंत में, बेंच ने कहा कि यदि सही आवेदन दाखिल किया जाता है तो वह मामले की जांच करेगी और सीजेआई से रिपोर्ट मांगी जाएगी ताकि अपीलों के समाधान के लिए एक समयसीमा तय की जा सके और फिलहाल मामले को अगली सुनवाई तक के लिए टाल दिया गया है।

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