अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में भारी उछाल: भारतीय शेयर बाजार के लिए खतरे की घंटी
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और वैश्विक कर्ज संकट का भारतीय शेयर बाजार पर असर। जानिए क्यों निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है।
भारत की लगभग 145 करोड़ की विशाल आबादी में से 21 करोड़ से अधिक लोग अब सीधे तौर पर शेयर बाजार में निवेश कर रहे हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि देश की वर्तमान अर्थव्यवस्था पूरी तरह से शेयर बाजार से जुड़ चुकी है और दलाल स्ट्रीट का उतार-चढ़ाव देश की आर्थिक रगों में रक्त की तरह दौड़ रहा है। हालांकि, पिछले दो वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो शेयर बाजार ने निवेशकों को कोई बहुत बड़ा रिटर्न नहीं दिया है। गौर करने वाली बात यह है कि काफी समय बीत जाने के बाद भी बाजार ने कोई नया कीर्तिमान स्थापित नहीं किया है, जिससे निवेशकों में बेचैनी बढ़ रही है।
अमेरिका से आता नया आर्थिक खतरा
अब शेयर बाजार के सामने अमेरिका से एक नया और गंभीर खतरा मंडरा रहा है। यह खतरा किसी व्यापारिक टैरिफ या प्रतिबंध से संबंधित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध अमेरिकी सरकारी बॉन्ड यील्ड से है, जो कई दशकों के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। इसके साथ ही जापान की बॉन्ड यील्ड भी 30 साल के उच्चतम स्तर पर है। भारत में भी सरकारी बॉन्ड यील्ड फिलहाल शेयर बाजार के कई सेक्टरों की तुलना में बेहतर रिटर्न दे रही है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में सख्ती के निरंतर संकेतों ने वैश्विक इक्विटी बाजारों में हलचल तेज कर दी है। आइए इन सभी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।
दशकों के उच्चतम स्तर पर सरकारी बॉन्ड यील्ड
दुनिया के सबसे बड़े बॉन्ड मार्केट से अब खतरे के संकेत मिल रहे हैं और 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड बढ़कर लगभग तीन साल के सबसे ऊंचे स्तर 4 दशमलव 81 प्रतिशत पर पहुंच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह 5 प्रतिशत की ओर बढ़ती है, तो पहले से ही अस्थिर शेयर बाजारों में भारी गिरावट आ सकती है। भारतीय बाजार भी इससे अछूता नहीं है; बुधवार को भारतीय सरकारी बॉन्ड में गिरावट देखी गई और यील्ड कुछ समय के लिए 7 प्रतिशत के पार चली गई। वैश्विक कर्ज बाजार में बिकवाली और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें निवेशकों के भरोसे को तोड़ रही हैं।
जब विकसित देशों में यील्ड बढ़ती है, तो भारत जैसे उभरते बाजारों के कर्ज (डेट) का आकर्षण कम हो जाता है, जिससे विदेशी पूंजी की निकासी (कैपिटल आउटफ्लो) बढ़ सकती है। जापान में 10 साल के बॉन्ड की यील्ड 3 प्रतिशत से ऊपर चली गई है, जो 30 वर्षों में सबसे अधिक है। ऑस्ट्रेलिया में यह आंकड़ा 5 दशमलव 198 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो 15 वर्षों का रिकॉर्ड है। ब्रिटेन में 30 साल के कर्ज की लागत 30 वर्षों के उच्चतम स्तर पर है, जबकि जर्मनी और फ्रांस में यील्ड क्रमशः 2011 और 2008 के स्तर पर पहुंच गई है। अमेरिका में 30 साल के बॉन्ड की यील्ड अगस्त की शुरुआत में 2007 के बाद के उच्चतम स्तर पर देखी गई थी।
बॉन्ड यील्ड बढ़ने के मुख्य कारण
इस बढ़ोतरी के पीछे कई बड़े कारण जिम्मेदार हैं और सबसे प्रमुख कारण बड़ी अर्थव्यवस्थाओं द्वारा लिया जा रहा भारी कर्ज है। अमेरिका सहित कई देशों ने घाटे की भरपाई के लिए अपना कर्ज काफी बढ़ा लिया है और अमेरिकी फेडरल कर्ज अब पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर गया है। जनवरी 2025 में डोनाल्ड ट्रंप की संभावित वापसी के संकेतों के बीच अमेरिका का कुल कर्ज 3 दशमलव 8 ट्रिलियन डॉलर बढ़ चुका है। इससे पहले जो बाइडन के कार्यकाल में इसमें लगभग 8 दशमलव 5 ट्रिलियन डॉलर की वृद्धि हुई थी।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर बढ़ता खर्च भी बॉन्ड मार्केट पर दबाव डाल रहा है। बड़ी टेक कंपनियां डेटा सेंटर और एआई मॉडल के लिए भारी कर्ज ले रही हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अल्फाबेट, अमेजन, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट और ओरेकल जैसी पांच बड़ी कंपनियों ने इस साल एआई निवेश के लिए 220 बिलियन डॉलर का कर्ज लिया है, जो पिछले साल से दोगुना है। इस कारण वैश्विक कॉर्पोरेट बॉन्ड जारी करने की प्रक्रिया में तेजी आई है और 2026 में अब तक यह आंकड़ा रिकॉर्ड 4 दशमलव 9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जो पिछले साल की तुलना में 14 प्रतिशत अधिक है।
तेल की कीमतें और फेड का सख्त रुख
अमेरिका और ईरान के बीच फरवरी से जारी संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है, जिससे मध्य पूर्व में तनाव बना हुआ है और ऊर्जा की कीमतें बढ़ने का खतरा बरकरार है। सर्दियों के मौसम से पहले ईंधन की मांग बढ़ने और घटते स्टॉक के कारण वैश्विक महंगाई दर ऊपर जा रही है और अमेरिकी प्रशासन की नीतियां और ईरान के सहयोगियों पर नए प्रतिबंधों की धमकी कीमतों में और आग लगा सकती है।
अमेरिकी फेड के चेयरमैन केविन वॉर्श ने स्पष्ट किया है कि यदि महंगाई 2 प्रतिशत के लक्ष्य पर वापस नहीं आती है, तो केंद्रीय बैंक को सख्त कदम उठाने होंगे। इसका सीधा मतलब ब्याज दरों में बढ़ोतरी हो सकता है। सीएमई फेडवॉच के आंकड़ों के अनुसार, ब्याज दरें बढ़ने की संभावना जो एक हफ्ते पहले 41 प्रतिशत थी, वह अब बढ़कर 66 प्रतिशत हो गई है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या है जोखिम?
भारतीय शेयर बाजार के लिए सबसे बड़ा जोखिम एफआईआई (FII) की निकासी है। जब अमेरिका में सुरक्षित बॉन्ड पर 5 प्रतिशत रिटर्न मिल रहा हो, तो विदेशी निवेशक भारत जैसे जोखिम भरे बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी ट्रेजरी में लगाते हैं। इसके अलावा, ऊंची बॉन्ड यील्ड से इक्विटी का आकर्षण कम होता है, जिससे भारतीय शेयरों के ऊंचे पी/ई (P/E) वैल्यूएशन पर दबाव पड़ता है।
घरेलू स्तर पर, भारतीय बॉन्ड यील्ड के 7 प्रतिशत के पार जाने से कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो गया है, जिससे उनके मुनाफे पर असर पड़ेगा। कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता के कारण मध्य पूर्व का तनाव 'इंपोर्टेड महंगाई' ला सकता है, जिससे आरबीआई के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो जाएगा। साथ ही, डॉलर की मजबूती से रुपया कमजोर हो सकता है, जिससे आयात और महंगा होगा। निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे इस दौर में कर्ज मुक्त और मजबूत कैश फ्लो वाली कंपनियों पर ही ध्यान दें।
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