ईरान में सियासी घमासान: अमेरिका से समझौते के बाद राष्ट्रपति पर तख्तापलट का आरोप

अमेरिका के साथ समझौते के बाद ईरान में राजनीतिक घमासान छिड़ गया है। कट्टरपंथी राष्ट्रपति पेजेशकियन पर तख्तापलट का आरोप लगा रहे हैं। जानें क्या है पूरा विवाद।

Jul 19, 2026 - 15:35
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ईरान में सियासी घमासान: अमेरिका से समझौते के बाद राष्ट्रपति पर तख्तापलट का आरोप

अमेरिका के साथ हुए हालिया समझौते के बाद ईरान के भीतर एक बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है और इस कूटनीतिक कदम ने देश के भीतर कट्टरपंथी धड़ों को नाराज कर दिया है, जो अब राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और विदेश मंत्री अब्बास अराघची पर इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगा रहे हैं। तनाव का नजारा तेहरान में दिवंगत सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के जनाजे के दौरान साफ देखा गया। जब राष्ट्रपति पेजेशकियन जनाजे के साथ चल रहे थे, तो वहां मौजूद काले कपड़े पहने कट्टरपंथियों ने उनके खिलाफ 'समझौता करने वाले की मौत' जैसे तीखे नारे लगाए। स्थिति तब और बिगड़ गई जब विदेश मंत्री अब्बास अराघची पर पथराव किया गया और उन्हें गद्दार कहा गया, जिसके बाद उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए वहां से तुरंत हटना पड़ा।

सॉफ्ट तख्तापलट के आरोपों की सच्चाई

सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के कट्टरपंथी गुटों में यह धारणा मजबूत हो रही है कि वाशिंगटन के साथ समझौता करने वाले नेताओं ने क्रांतिकारी आदर्शों के खिलाफ एक 'सॉफ्ट तख्तापलट' कर दिया है। कट्टरपंथियों का दावा है कि इन नेताओं ने नए सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई की इच्छा के विरुद्ध जाकर अमेरिका के सामने घुटने टेक दिए हैं। इस पूरे विवाद के केंद्र में मुज्तबा खामेनेई की रहस्यमयी अनुपस्थिति भी है। वे पिछले कुछ समय से जनता की नजरों से पूरी तरह गायब हैं, जिससे यह अफवाह फैल रही है कि वे या तो अस्वस्थ हैं या सुरक्षा कारणों से छिपे हुए हैं। 'व्हाट ईरानियंस वांट' के लेखक और विशेषज्ञ अराश अजीजी का कहना है कि मुज्तबा की अनुपस्थिति ने एक शून्य पैदा कर दिया है, जिसका फायदा उठाकर राष्ट्रपति पेजेशकियन, विदेश मंत्री अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बघेर गालिबाफ प्रभावी रूप से देश चला रहे हैं। इसी वजह से कट्टरपंथी उन पर तख्तापलट का आरोप लगा रहे हैं।

कट्टरपंथियों की खुली धमकियां

इस समझौते का विरोध केवल सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी इसकी गूंज है। कट्टरपंथी सांसद महमूद नबावियन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर चेतावनी देते हुए लिखा कि क्या देश में कोई तख्तापलट होने वाला है? उन्होंने शहीद इमाम के खून का बदला लेने की कसम खाई और वहीं, सांसद कामरान गज़ानफ़री ने सरकार के दावों को सफेद झूठ करार दिया। सबसे गंभीर धमकी धार्मिक गायक मोहम्मद अली बख्शी की ओर से आई, जिन्होंने एक सार्वजनिक समारोह में राष्ट्रपति को सीधे तौर पर चेतावनी दी कि अगर सुप्रीम लीडर की शर्तें पूरी नहीं हुईं, तो उनकी तलवार और राष्ट्रपति का गला होगा। हैरानी की बात यह है कि इस तरह की खुली धमकी के बावजूद बख्शी के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की गई है।

होर्मुज स्ट्रेट और सीजफायर का संकट

विवाद की सबसे बड़ी जड़ होर्मुज स्ट्रेट को खोलने का फैसला है। 'द गार्जियन' के मुताबिक, कट्टरपंथी अखबार 'केहान' के संपादक होसैन शरियातमदारी ने सवाल उठाया है कि ईरान ने अपने सबसे मजबूत सौदेबाजी के हथियार को बिना किसी ठोस गारंटी के क्यों छोड़ दिया। कट्टरपंथियों का तर्क है कि इस समझौते में प्रतिबंधों से राहत का कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं है और इस तनाव का असर जमीन पर भी दिखा जब ईरान और अमेरिका के बीच हुआ नाजुक युद्धविराम टूटने की कगार पर पहुंच गया। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों को निशाना बनाकर अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की, जिसके जवाब में अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई की। हालांकि, स्पीकर गालिबाफ के सलाहकार मेहदी मोहम्मदी ने इन आलोचनाओं को खारिज करते हुए 3 मुख्य तर्क दिए हैं: पहला, यह डील युद्ध खत्म करेगी; दूसरा, होर्मुज में शिपिंग का नियंत्रण ईरानी व्यवस्था के तहत होगा; और तीसरा, ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने की अपनी पुरानी नीति को ही दोहराया है, कोई नया प्रतिबंध स्वीकार नहीं किया है।

ईरान में सत्ता के तीन ध्रुव

वर्तमान में ईरान की राजनीति 3 मुख्य ध्रुवों में बंट गई है। पहला धड़ा सुधारवादियों का है जो अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए पश्चिम से संबंध सुधारना चाहता है। दूसरा धड़ा 'पायदारी फ्रंट' जैसे कट्टरपंथियों का है जो अमेरिका से सीधे टकराव के पक्ष में हैं। तीसरा ध्रुव गायब सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई का है, जिनकी चुप्पी ने इस पूरे संकट को और अधिक जटिल बना दिया है।

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