ईरान या अमेरिका? 10 एक्सपर्ट्स ने बताया किसने जीती 4 महीने की जंग
4 महीने चले अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद विशेषज्ञों ने विश्लेषण किया है कि सैन्य नुकसान के बावजूद ईरान को रणनीतिक लाभ कैसे मिला और अमेरिका के लक्ष्य क्यों अधूरे रहे।
अमेरिका और ईरान के बीच लगभग 4 महीने तक चले भीषण युद्ध के समाप्त होने के बाद अब इस बात को लेकर वैश्विक स्तर पर बहस छिड़ गई है कि इस लड़ाई में वास्तव में जीत किसकी हुई है। हालांकि युद्ध को समाप्त करने के लिए एक समझौता हो चुका है, लेकिन सैन्य और रणनीतिक मोर्चों पर इसके परिणामों को लेकर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस युद्ध को समाप्त करने वाले समझौते को अपनी एक बड़ी सफलता के रूप में पेश किया है। इसके विपरीत, अमेरिकी पत्रिका न्यूजवीक द्वारा परामर्श किए गए 10 सैन्य और विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि जीत और हार का यह मामला इतना सरल नहीं है। अधिकांश विशेषज्ञों का तर्क है कि भारी सैन्य नुकसान झेलने के बावजूद ईरान को रणनीतिक रूप से बड़ा फायदा हुआ है।
ईरान को हुआ भारी सैन्य नुकसान
युद्ध के दौरान अमेरिका और इजराइल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई ने ईरान की सैन्य शक्ति को जबरदस्त चोट पहुंचाई। विशेषज्ञों के अनुसार, इस 4 महीने के संघर्ष में ईरान की नौसेना लगभग पूरी तरह से नष्ट हो गई। इसके साथ ही ईरानी वायुसेना को भी भारी क्षति का सामना करना पड़ा। ईरान के मिसाइल और परमाणु कार्यक्रमों को भी इन हमलों से बड़ा झटका लगा है, जिससे उनकी तकनीकी प्रगति कई साल पीछे चली गई है। सैन्य नुकसान के अलावा, ईरान ने अपने कई महत्वपूर्ण सैन्य अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं को भी इस युद्ध में खो दिया है। इन सबके बावजूद, ईरान की सरकार सत्ता में बनी रही और वहां कोई शासन परिवर्तन नहीं हुआ, जिसे ईरान की एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
ईरानी सत्ता को मिला रणनीतिक लाभ
लंदन स्थित रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट की विशेषज्ञ बुर्कु ओजचेलिक का विश्लेषण है कि इस युद्ध से आम ईरानी जनता को भले ही कष्ट हुआ हो, लेकिन ईरान के शासक वर्ग को इससे मजबूती मिली है। उनके अनुसार, युद्ध के बाद ईरान के भीतर कट्टरपंथी ताकतें और अधिक शक्तिशाली होकर उभरी हैं और इसके अलावा, इस युद्ध ने चीन और रूस जैसे देशों को यह कड़ा संदेश दिया है कि अमेरिका अपनी विशाल सैन्य शक्ति को हमेशा वांछित राजनीतिक सफलता में बदलने में सक्षम नहीं होता है। यह ईरान के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत की तरह है।
रियायतें और होर्मुज जलडमरूमध्य पर प्रभाव
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की प्रोफेसर मेलानी गार्सन का मानना है कि ईरान अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह दावा कर सकता है कि उसने अमेरिका और इजराइल जैसे शक्तिशाली देशों के हमलों का डटकर सामना किया है और ईरान ने न केवल अपनी संप्रभुता की रक्षा की, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर अपना प्रभाव भी बनाए रखा। युद्ध के बाद हुए समझौते के तहत ईरान ने पुनर्निर्माण के लिए फंड, प्रतिबंधों में राहत और अपनी जब्त की गई संपत्तियों की वापसी जैसी महत्वपूर्ण रियायतें हासिल कर ली हैं। यह दर्शाता है कि ईरान ने अपने नुकसान की भरपाई के लिए बेहतर सौदेबाजी की है।
विशेषज्ञों की बंटी हुई राय
हालांकि, सभी विशेषज्ञ ईरान को विजेता नहीं मानते। पूर्व पेंटागन अधिकारी जिम टाउनसेंड और ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के माइकल ओ हैनलोन जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध में कोई भी पक्ष स्पष्ट रूप से विजयी नहीं हुआ है। उनके अनुसार, दोनों पक्षों को अपनी-अपनी तरह से नुकसान उठाना पड़ा है। जहां अमेरिका की वैश्विक छवि को धक्का लगा है, वहीं ईरान की अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता काफी कमजोर हो गई है। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के मार्क कैंसियन का मानना है कि अमेरिका ने ईरान की नौसेना और मिसाइल उत्पादन क्षमता को नष्ट करके उसे सैन्य रूप से बहुत पीछे धकेल दिया है, लेकिन ईरान का ड्रोन और मिसाइल प्रभाव अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
अमेरिका के अधूरे रह गए लक्ष्य
युद्ध के अंत में यह स्पष्ट हो गया कि अमेरिका अपने कई प्रमुख लक्ष्यों को हासिल करने में विफल रहा। समझौते में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों की गतिविधियों पर कोई ठोस लगाम नहीं लगाई जा सकी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका ईरान में जिस शासन परिवर्तन की उम्मीद कर रहा था, वह भी सफल नहीं हो पाया और यही कारण है कि कई विशेषज्ञ इस युद्ध का सबसे बड़ा रणनीतिक विजेता ईरान को मान रहे हैं, क्योंकि वह भारी तबाही के बाद भी अपने अस्तित्व और प्रभाव को बचाने में सफल रहा।
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