ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अवमानना की मांग: वकील ने अटॉर्नी जनरल को लिखा पत्र

सुप्रीम कोर्ट के वकील ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही के लिए अटॉर्नी जनरल से अनुमति मांगी है।

Sep 24, 2026 - 14:35
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ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अवमानना की मांग: वकील ने अटॉर्नी जनरल को लिखा पत्र

मीडिया रिपोर्टों में किए गए दावों के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार एक बड़े कानूनी और प्रशासनिक विवाद में घिर गए हैं और इस पूरे मामले में एक नया मोड़ तब आया जब सुप्रीम कोर्ट के एक वकील ने उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की औपचारिक अनुमति मांगी। यह विवाद तब शुरू हुआ जब यह आरोप लगाया गया कि बहु-सदस्यीय चुनाव आयोग को इस तरह से चलाया जा रहा है जैसे कि सभी निर्णय केवल एक व्यक्ति द्वारा लिए जा रहे हों, जो कि संस्थागत मर्यादा और सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट के वकील ने अटॉर्नी जनरल को लिखा पत्र

वकील ब्रजेश सिंह ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमनी को एक पत्र लिखकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ क्रिमिनल कंटेम्प्ट की कार्रवाई शुरू करने की मांग की है। अपने पत्र में ब्रजेश सिंह ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने आयोग के कामकाज को इस तरह संचालित किया है जिससे अन्य आयुक्तों की भूमिका गौण हो गई है। पत्र में यह भी तर्क दिया गया है कि यह कार्यशैली सुप्रीम कोर्ट के उन पुराने फैसलों और व्यवस्थाओं के खिलाफ है जो चुनाव आयोग को एक बहु-सदस्यीय और स्वतंत्र संस्था के रूप में परिभाषित करते हैं।

अटॉर्नी जनरल की अनुमति की कानूनी अनिवार्यता

नियमों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में किसी भी उच्चाधिकारी के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से पहले देश के अटॉर्नी जनरल या सॉलिसीटर जनरल से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य होता है। वर्तमान में यह केवल कार्यवाही शुरू करने की एक मांग है और इस पर अभी तक कोई अदालती आदेश जारी नहीं हुआ है। अब इस पूरे मामले में अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमनी का रुख अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। यदि वे अनुमति देते हैं, तभी यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में आगे बढ़ पाएगा। कानूनी विशेषज्ञ और राजनीतिक विश्लेषक इस पत्र पर अटॉर्नी जनरल के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।

10 महीनों में 14 लिखित आपत्तियों का मामला

यह पूरा विवाद एक मीडिया रिपोर्ट के बाद सार्वजनिक हुआ जिसमें दावा किया गया कि ज्ञानेश कुमार अन्य दोनों आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना महत्वपूर्ण फैसले ले रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के अन्य दो सदस्यों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार आधिकारिक तौर पर अपनी लिखित आपत्ति दर्ज कराई है। इन दोनों आयुक्तों का आरोप है कि कई महत्वपूर्ण निर्णय और आदेश उनकी जानकारी के बिना और उन्हें अंधेरे में रखकर जारी किए गए, जो आयोग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाता है।

फॉर्म 6 और चुनावी डेटाबेस पर विवाद

आयुक्तों द्वारा दर्ज कराई गई आपत्तियों में कई तकनीकी और प्रशासनिक मुद्दे शामिल हैं और इनमें वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए उपयोग होने वाले फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को प्रमुखता से उठाया गया है। दोनों आयुक्तों ने इन बदलावों को अनधिकृत और अवैध करार दिया था। इसके अलावा, चुनावी डेटाबेस के केंद्रीकरण और स्पेशल समरी रिवीजन (एसआईआर) के दौरान मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने और उन्हें बहाल करने से जुड़े मुद्दों पर भी गंभीर मतभेद सामने आए हैं। आयुक्तों ने चुनाव आयोग के नए सेंट्रलाइज्ड आईटी सिस्टम ECINet की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मई से अगस्त के बीच लगभग 4 महीने तक पूरे चुनाव आयोग की एक भी औपचारिक बैठक आयोजित नहीं की गई थी।

चुनाव आयोग की ओर से दी गई सफाई

विवाद के तूल पकड़ने के बाद चुनाव आयोग ने इन आरोपों पर अपनी आधिकारिक सफाई पेश की है। आयोग का कहना है कि एसआईआर सहित आयोग के सभी महत्वपूर्ण फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति और मंजूरी से ही लिए गए थे। आयोग ने स्पष्ट किया कि आंतरिक बैठकों के दौरान अलग-अलग राय या टिप्पणियां आना एक सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के अनुसार, इन टिप्पणियों को संस्था में किसी भी प्रकार की टूट या असहमति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह लोकतांत्रिक चर्चा का प्रमाण है।

विपक्ष के हमले और राजनीतिक प्रतिक्रिया

मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर हुए इन खुलासों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर एकजुट होकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को घेर रहा है और कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर चुनाव आयोग को हाईजैक करने का सीधा आरोप लगाया है। प्रियंका गांधी ने इस मामले की गंभीरता पर जोर देते हुए कहा कि इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। वहीं, राहुल गांधी ने इसे संविधान पर सीधा हमला बताते हुए देशद्रोह की संज्ञा दी है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस मुद्दे पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। अब सबकी नजरें अटॉर्नी जनरल के फैसले पर टिकी हैं कि क्या ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अवमानना का मामला चलेगा या नहीं।

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