डोनाल्ड ट्रंप को इस साल भी नहीं मिलेगा शांति का नोबेल, जानिए क्या है कारण

डोनाल्ड ट्रंप को इस साल भी नोबेल शांति पुरस्कार मिलना मुश्किल है। जानें क्यों इजराइल और पाकिस्तान के नामांकन के बाद भी ट्रंप रेस से बाहर हो सकते हैं।

Oct 1, 2026 - 19:35
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डोनाल्ड ट्रंप को इस साल भी नहीं मिलेगा शांति का नोबेल, जानिए क्या है कारण

नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर दुनिया भर में चर्चाएं तेज हैं, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए इस साल भी यह सम्मान पाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इजराइल, कंबोडिया और पाकिस्तान जैसे देशों ने ट्रंप के नाम को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए आधिकारिक तौर पर नामित किया है। इसके बावजूद, विशेषज्ञों और सूत्रों का मानना है कि ट्रंप को इस साल यह पुरस्कार मिलना लगभग नामुमकिन है और नोबेल समिति के भीतर चल रही हलचल और वैश्विक राजनीतिक समीकरण ट्रंप की राह में बड़े रोड़े अटका रहे हैं।

ईरान के साथ युद्ध और उसका प्रभाव

डोनाल्ड ट्रंप की दावेदारी कमजोर होने के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका द्वारा ईरान के साथ छेड़ा गया युद्ध बताया जा रहा है और इस युद्ध ने न केवल मध्य पूर्व की स्थिरता को खतरे में डाला है, बल्कि इसके कारण लाखों लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। नोबेल समिति आमतौर पर उन व्यक्तियों को चुनती है जिन्होंने शांति स्थापना और संघर्ष विराम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। ईरान के साथ चल रहे इस भीषण संघर्ष और उससे उपजे मानवीय संकट ने ट्रंप की शांति दूत वाली छवि पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे समिति के लिए उन्हें चुनना मुश्किल हो गया है।

मचाडो प्रकरण और नोबेल समिति की साख

नोबेल समिति के लिए पिछला अनुभव काफी कड़वा रहा है। साल 2025 में वेनेजुएला की मचाडो को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। लेकिन पुरस्कार लेने के बाद मचाडो ने इसे डोनाल्ड ट्रंप को सौंप दिया था। इस घटना से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नोबेल समिति की काफी किरकिरी हुई थी और उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठे थे। यही कारण है कि इस बार समिति बेहद फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। समिति ऐसे व्यक्ति या संस्था की तलाश में है जो पुरस्कार की गरिमा को बनाए रख सके और किसी भी राजनीतिक दबाव में न आए।

इंटरनेशनल कोर्ट ट्रिब्यूनल की दावेदारी

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से जानकारी दी है कि नोबेल समिति इस बार इंटरनेशनल कोर्ट ट्रिब्यूनल को यह पुरस्कार देने पर गंभीरता से विचार कर रही है। यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा झटका हो सकता है क्योंकि अमेरिका ने हाल ही में इंटरनेशनल कोर्ट ट्रिब्यूनल पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। इतना ही नहीं, वाशिंगटन ने कोर्ट के फंड पर भी रोक लगा दी है। अगर ट्रिब्यूनल को यह पुरस्कार मिलता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणाली के प्रति नोबेल समिति के समर्थन का एक बड़ा संकेत होगा।

विशेषज्ञों की राय और अन्य दावेदार

ओस्लो के शांति अनुसंधान संस्थान के कार्यवाहक निदेशक हाकॉन गेर्लो का मानना है कि समिति इस बार किसी ऐसे व्यक्ति का चयन करेगी जो ट्रंप के धुर-विरोधी हों या उनके दबाव का सामना कर सकें और हाकॉन के अनुसार, ट्रंप को इस बार पुरस्कार न मिलने की स्थिति में वह विजेता पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकते हैं, जैसा कि पहले भी देखा गया है। इसलिए, लोकतंत्र और शांति का संदेश देने के लिए किसी विरोधी को चुनना समिति की रणनीति हो सकती है।

इस साल की रेस में डोनाल्ड ट्रंप के अलावा कई अन्य बड़े नाम भी शामिल हैं। इनमें पोप लियो, फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर यूएन के विशेष प्रतिवेदक और फ्रांसेस्का अल्बनीज के नाम सबसे आगे चल रहे हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल के डायरेक्टर करीम हग्गाग का कहना है कि पोप लियो इस दौड़ में सबसे मजबूत दावेदार हैं क्योंकि वह लगातार ट्रंप प्रशासन की नीतियों और युद्ध के खिलाफ मुखर रहे हैं। 9 अक्टूबर को होने वाली घोषणा में यह साफ हो जाएगा कि शांति का यह सर्वोच्च सम्मान किसके नाम होता है, लेकिन फिलहाल सारी चर्चाएं ट्रंप के इर्द-गिर्द ही सिमटी हुई हैं।

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