तेल संकट के बीच 27 देशों ने वर्ल्ड बैंक से मांगी इमरजेंसी मदद

मिडिल ईस्ट संघर्ष और तेल की बढ़ती कीमतों के कारण 27 देशों ने वर्ल्ड बैंक से आपातकालीन मदद मांगी है। केन्या और इराक ने सहायता की पुष्टि की।

May 23, 2026 - 15:35
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तेल संकट के बीच 27 देशों ने वर्ल्ड बैंक से मांगी इमरजेंसी मदद

मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष और वैश्विक तेल बाजार में मची उथल-पुथल ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक गंभीर संकट पैदा कर दिया है और इस तनावपूर्ण स्थिति के बीच, दुनिया के 27 देशों ने वर्ल्ड बैंक से आपातकालीन आर्थिक सहायता प्राप्त करने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी है। ईंधन की आसमान छूती कीमतों, कमजोर पड़ती सप्लाई चेन और खाद के गहराते संकट ने कई विकासशील देशों की कमर तोड़ दी है, जिससे वे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की ओर देखने को मजबूर हो गए हैं। केन्या और इराक जैसे देशों ने इस दिशा में तेजी दिखाते हुए वित्तीय सहायता की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया है।

इमरजेंसी फंड की बढ़ती मांग और वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट

वर्ल्ड बैंक की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद से ही दुनिया के 27 देशों ने इमरजेंसी फंड की मांग को लेकर सक्रियता दिखाई है। इन देशों ने अपने यहां ऐसे सिस्टम और तंत्र लागू करने की प्रक्रिया शुरू की है, जिनके माध्यम से जरूरत पड़ने पर वे विश्व बैंक से बहुत कम समय में फंड प्राप्त कर सकें। रॉयटर्स द्वारा प्राप्त एक आंतरिक दस्तावेज में इस बात का खुलासा किया गया है कि इन देशों ने अपनी आर्थिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया है और हालांकि, इस दस्तावेज में उन सभी देशों के नाम और उनके द्वारा मांगी गई सटीक राशि का विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। वर्ल्ड बैंक ने भी फिलहाल इस संवेदनशील मामले पर कोई आधिकारिक टिप्पणी करने से परहेज किया है।

रिपोर्ट के विवरण के अनुसार, 28 फरवरी से मिडिल ईस्ट में संघर्ष के विस्तार के बाद, तीन देशों ने नए क्राइसिस सपोर्ट सिस्टम को अपनी मंजूरी दे दी है। वहीं, अन्य देश अभी इस जटिल प्रक्रिया को पूरा करने में जुटे हुए हैं। ईरान युद्ध का व्यापक असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। तेल और गैस की कीमतों में हुई बेतहाशा बढ़ोतरी ने कई देशों के बजट को बिगाड़ दिया है। ऊर्जा बाजार में व्याप्त इस अस्थिरता के कारण वैश्विक सप्लाई चेन भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसके अतिरिक्त, खाद की सप्लाई में आ रही बाधाओं ने कृषि क्षेत्र के लिए भी बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है, जिससे आने वाले समय में खाद्य संकट का खतरा बढ़ सकता है।

केन्या और इराक ने की वित्तीय सहायता की पुष्टि

इस संकट के बीच केन्या और इराक ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि उन्होंने विश्व बैंक से त्वरित आर्थिक मदद की गुहार लगाई है। केन्या में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे वहां की आम जनता और परिवहन क्षेत्र पर भारी बोझ पड़ रहा है। दूसरी ओर, इराक को तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण अपनी कमाई में भारी गिरावट का सामना करना पड़ रहा है। इन दोनों देशों ने स्पष्ट किया है कि उन्हें अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए तत्काल वित्तीय बैकअप की जरूरत है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ये 27 देश उन 101 देशों की सूची में शामिल हैं, जिन्हें पहले से तैयार क्राइसिस फंड सिस्टम का लाभ मिल सकता है। इनमें से 54 देश रैपिड रिस्पॉन्स योजना का सक्रिय हिस्सा हैं। इस विशेष योजना के तहत, कोई भी सदस्य देश अपने मंजूर किए गए लेकिन अभी तक इस्तेमाल न किए गए फंड का 10 प्रतिशत हिस्सा किसी भी आपात स्थिति में तुरंत निकाल सकता है।

वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ की भूमिका

वर्ल्ड बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा ने पिछले महीने वैश्विक आर्थिक स्थिति पर चर्चा करते हुए कहा था कि बैंक जरूरत पड़ने पर 20 से 25 अरब डॉलर तक की तत्काल आर्थिक मदद उपलब्ध कराने में सक्षम है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पुराने प्रोजेक्ट्स के बचे हुए फंड और अन्य वित्तीय योजनाओं को मिलाकर अगले छह महीनों में यह सहायता राशि 60 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। भविष्य की जरूरतों को देखते हुए यह आंकड़ा 100 अरब डॉलर तक भी जा सकता है।

वहीं दूसरी ओर, इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) की प्रमुख क्रिस्टलीना जार्जिवा ने संकेत दिया था कि लगभग 12 देश आईएमएफ से भी वित्तीय मदद की मांग कर सकते हैं। हालांकि, अभी तक बहुत कम देशों ने इसके लिए आधिकारिक आवेदन दिया है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि कई देश आईएमएफ के बजाय वर्ल्ड बैंक से मदद लेना अधिक पसंद कर रहे हैं और इसका मुख्य कारण यह है कि आईएमएफ आमतौर पर कर्ज देने के बदले खर्च में कटौती और सख्त आर्थिक सुधारों जैसी कड़ी शर्तें लगाता है। पहले से ही आर्थिक और सामाजिक संकट से जूझ रहे देशों के लिए ऐसी शर्तें स्थिति को और अधिक तनावपूर्ण बना सकती हैं, इसलिए वे वर्ल्ड बैंक के लचीले रुख को प्राथमिकता दे रहे हैं।

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