पाकिस्तान में संवैधानिक संकट: राष्ट्रपति जरदारी की मंजूरी के बिना जजों की नियुक्ति की तैयारी

पाकिस्तान सरकार राष्ट्रपति जरदारी की मंजूरी के बिना 19 हाई कोर्ट जजों की नियुक्ति का नोटिफिकेशन जारी कर सकती है। 15 दिन की समय सीमा बीतने के बाद संवैधानिक संकट गहराया।

Aug 7, 2026 - 16:35
 0  0
पाकिस्तान में संवैधानिक संकट: राष्ट्रपति जरदारी की मंजूरी के बिना जजों की नियुक्ति की तैयारी

पाकिस्तान में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और संघीय सरकार के बीच हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति को लेकर एक गंभीर संवैधानिक गतिरोध पैदा हो गया है। डॉन की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार अब राष्ट्रपति की औपचारिक मंजूरी के बिना ही जजों की नियुक्ति का नोटिफिकेशन जारी करने के विकल्प पर विचार कर रही है। यह स्थिति तब उत्पन्न हुई है जब ज्यूडिशियल कमीशन ऑफ पाकिस्तान (JCP) ने जुलाई में 19 अतिरिक्त जजों की नियुक्ति की सिफारिश की थी, लेकिन राष्ट्रपति जरदारी ने अब तक इस प्रस्ताव यानी समरी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इस देरी की वजह से सरकार और राष्ट्रपति भवन के बीच सीधा टकराव देखने को मिल रहा है।

ज्यूडिशियल कमीशन की सिफारिशें और वर्तमान स्थिति

ज्यूडिशियल कमीशन ऑफ पाकिस्तान ने 20 और 21 जुलाई को आयोजित अपनी बैठकों में न्यायिक नियुक्तियों पर विस्तार से चर्चा की थी। इन बैठकों के दौरान, कमीशन ने हाई कोर्ट में 19 अतिरिक्त जजों की नियुक्ति की सिफारिश की। इसमें पेशावर हाई कोर्ट के चार अतिरिक्त जजों और लाहौर हाई कोर्ट के एक अतिरिक्त जज की सेवा को स्थायी करने का निर्णय लिया गया था। इसके अलावा, कमीशन ने सिंध हाई कोर्ट के एक जज का कार्यकाल बढ़ाने का भी फैसला लिया था। राष्ट्रपति द्वारा इस समरी को मंजूरी न दिए जाने के कारण कानून मंत्रालय अब तक आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी नहीं कर पाया है, जिससे न्यायिक कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

संवैधानिक अनुच्छेद 48(1) और सरकार की रणनीति

सरकारी सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 48(1) के तहत राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री द्वारा भेजे गए किसी भी प्रस्ताव या समरी पर दो हफ्ते के भीतर कार्रवाई करनी होती है। चूंकि इस मामले में निर्धारित 15 दिन की समय सीमा बीत चुकी है, इसलिए सरकार का मानना है कि वह स्वयं नोटिफिकेशन जारी करने के लिए संवैधानिक रूप से अधिकृत है। दूसरी ओर, राष्ट्रपति कार्यालय के सूत्रों ने इस संभावित कदम पर कड़ी चेतावनी दी है। उनका कहना है कि निर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार करने से देश में एक नया राजनीतिक और कानूनी संकट खड़ा हो सकता है। राष्ट्रपति भवन का मानना है कि इस संवेदनशील मुद्दे का समाधान राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच आपसी बातचीत के माध्यम से ही निकाला जाना चाहिए।

देरी का न्यायपालिका पर प्रभाव

नियुक्तियों में हो रही इस देरी का असर पाकिस्तान की अदालतों में पहले ही दिखने लगा है। पेशावर हाई कोर्ट के चार अतिरिक्त जज 4 अगस्त को अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद पद छोड़ चुके हैं क्योंकि उनकी नियुक्ति का नोटिफिकेशन समय पर नहीं आया। इसी तरह, सिंध हाई कोर्ट के एक जज भी 29 जुलाई को पदमुक्त हो गए। इन महत्वपूर्ण पदों के खाली होने से अदालती कार्यवाही पर बोझ बढ़ रहा है। संघीय कानून मंत्री अकील मलिक ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया है कि सरकार इस पूरे मामले को संवैधानिक दायरे में रहकर ही सुलझाना चाहती है ताकि न्यायपालिका की गरिमा और कार्यक्षमता बनी रहे और किसी भी प्रकार के कानूनी संकट से बचा जा सके।

इस्लामाबाद हाई कोर्ट में याचिका और सुनवाई

इस प्रशासनिक देरी के खिलाफ अब कानूनी लड़ाई भी शुरू हो गई है। वकील लुकमान जफर चौधरी ने अपने वकील जाहिद आसिफ चौधरी के माध्यम से इस्लामाबाद हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की है। इस याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि वह राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री द्वारा भेजी गई समरी को मंजूरी देने का निर्देश दे, जो JCP की सिफारिशों पर आधारित है। जस्टिस अरबाब मुहम्मद ताहिर ने गुरुवार को इस याचिका पर सुनवाई की और अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि JCP की 20 और 21 जुलाई की सिफारिशों के बाद 15 दिन से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन राष्ट्रपति ने अब तक कोई कदम नहीं उठाया है। वकील ने अदालत को यह भी बताया कि ऐसी खबरें हैं कि सरकार अगले 48 घंटों के भीतर इन नियुक्तियों के लिए नोटिफिकेशन जारी कर सकती है।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow