मुख्यमंत्री ने जो किया, वो ठीक नहीं… IPAC ED रेड में ममता बनर्जी की भूमिका से नाराज सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने IPAC ईडी रेड मामले में ममता बनर्जी के हस्तक्षेप को असामान्य बताया और राज्य सरकार की देरी पर नाराजगी जताई।

Mar 18, 2026 - 18:35
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मुख्यमंत्री ने जो किया, वो ठीक नहीं… IPAC ED रेड में ममता बनर्जी की भूमिका से नाराज सुप्रीम कोर्ट

उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को IPAC परिसर में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कथित भूमिका पर कड़ी आपत्ति जताई। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार द्वारा जवाब दाखिल करने के लिए और समय मांगने की याचिका पर विचार किया और सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का प्रशासनिक हस्तक्षेप न्यायिक मर्यादा के अनुकूल नहीं है।

मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप पर न्यायालय की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि जांच के दौरान मुख्यमंत्री जैसी उच्च संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति का हस्तक्षेप करना एक 'असामान्य' घटना है। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने टिप्पणी की कि जो कुछ भी हुआ वह एक सुखद स्थिति नहीं थी और अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी कानूनी जांच की शुचिता बनाए रखना अनिवार्य है और इसमें किसी भी प्रकार का बाहरी दबाव स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जांच एजेंसियों को अपना कार्य स्वतंत्र रूप से करने देना चाहिए।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के तर्क

केंद्र सरकार की ओर से पेश होते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि मुख्यमंत्री का जांच में दखल देना बेहद गंभीर मामला है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार केवल समय बर्बाद करने की कोशिश कर रही है। मेहता ने अदालत को याद दिलाया कि राज्य को पहले ही 4 सप्ताह का समय दिया जा चुका था, लेकिन इसके बावजूद कोई जवाब दाखिल नहीं किया गया। उन्होंने इसे केंद्रीय एजेंसियों के काम में जानबूझकर डाली गई बाधा बताया और कहा कि मुख्यमंत्री पर लगे आरोप गंभीर प्रकृति के हैं।

राज्य सरकार की समय विस्तार की मांग

पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने पीठ के समक्ष समय विस्तार के लिए याचिका दायर की। सिबल ने तर्क दिया कि राज्य को अपना पक्ष रखने के लिए और समय चाहिए। उन्होंने कहा कि जांच करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि कानून द्वारा दी गई एक शक्ति है। सिबल ने दलील दी कि राज्य सरकार अपना विस्तृत जवाब दाखिल करना चाहती है ताकि मामले के सभी पहलुओं को स्पष्ट किया जा सके और हालांकि, अदालत ने इस देरी पर असंतोष व्यक्त किया।

ईडी का हलफनामा और सुरक्षा गतिरोध

ईडी ने पहले ही सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया है, जिसमें छापेमारी के दौरान हुई घटनाओं का विवरण दिया गया है और हलफनामे के अनुसार, राज्य पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के बीच संभावित टकराव को टालने के लिए अधिकारियों को तलाशी अभियान रोकना पड़ा था। एजेंसी ने कहा कि कानून के अनुसार, तलाशी के दौरान किसी भी तीसरे व्यक्ति को परिसर के अंदर आने या वहां से सामान ले जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। सॉलिसिटर जनरल ने इसे जांच की गोपनीयता और सुरक्षा का उल्लंघन बताया।

जांच एजेंसियों के अधिकार और कानूनी प्रक्रिया

इस मामले में केंद्रीय एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र और राज्य के हस्तक्षेप पर भी चर्चा हुई। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि जांच एजेंसियों को किसी भी अपराध की जांच करने का अधिकार कानून द्वारा प्राप्त है और इसमें किसी तीसरे पक्ष का प्रवेश वर्जित है। अदालत ने राज्य सरकार को सचेत किया कि न्यायिक प्रक्रियाओं में देरी और प्रशासनिक हस्तक्षेप से जांच की निष्पक्षता प्रभावित होती है और मामले की अगली सुनवाई के लिए अदालत ने राज्य के आचरण पर अपनी टिप्पणियों को रिकॉर्ड में लिया है और प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है।

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