सुनील आंबेकर का बड़ा बयान: 1947 में संघ मजबूत होता तो नहीं होता देश का बंटवारा

आरएसएस नेता सुनील आंबेकर ने विभाजन, संवाद की महत्ता और भारत के भविष्य के प्रति युवाओं के दृष्टिकोण पर अपने विचार साझा किए।

May 30, 2026 - 10:35
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सुनील आंबेकर का बड़ा बयान: 1947 में संघ मजबूत होता तो नहीं होता देश का बंटवारा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने भारत के विभाजन को इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक बताया है और नागपुर में आयोजित एक संगोष्ठी के दौरान आंबेकर ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि यदि 1947 में संघ आज की तरह मजबूत होता, तो देश का बंटवारा नहीं होता। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि वर्ष 1947 में संघ उतना मजबूत नहीं था जितना वह होना चाहता था, लेकिन इसके बावजूद संघ ने विभाजन के कठिन समय में हिंदुओं की सुरक्षा और उनके पुनर्वास के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।

संवाद और वैचारिक स्पष्टता

सुनील आंबेकर ने स्पष्ट किया कि संघ किसी भी व्यक्ति या समूह से नफरत या दुश्मनी नहीं रखता है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए अक्सर संघ के बारे में गलत जानकारियां और भ्रांतियां फैलाई जाती हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि संघ समाज के सभी वर्गों को अपना मानता है। संघ का मानना है कि संवाद और चर्चा ही समस्याओं के समाधान का सबसे प्रभावी माध्यम है और संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले द्वारा पाकिस्तान के साथ संवाद जारी रखने के संबंध में दिए गए बयान पर आंबेकर ने कहा कि संघ के इस दृष्टिकोण को गहराई से समझने की आवश्यकता है।

उन्होंने विस्तार से बताया कि संघ हमेशा से यह मानता रहा है कि लोगों के बीच आपसी बातचीत से जमीनी स्तर पर समस्याओं का समाधान निकलता है। दत्तात्रेय होसबले ने भी इसी मानवीय भावना को व्यक्त किया था। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार-से-सरकार के स्तर पर बातचीत करना पूरी तरह से एक राजनीतिक और कूटनीतिक निर्णय होता है। सरकार अपनी परिस्थितियों और आकलन के आधार पर यह तय करती है कि उसे कब और किससे बात करनी है और आरएसएस इस तरह के कूटनीतिक विषयों पर सरकार को तत्काल कोई सलाह नहीं देता है। उन्होंने कहा कि बातचीत से रिश्तों में निरंतरता बनी रहती है और भविष्य में कई जटिल समस्याओं के समाधान का रास्ता खुल सकता है।

नारों और विचारधारा पर प्रतिक्रिया

आजकल कुछ समूहों द्वारा लगाए जा रहे 'जय भीम, लाल सलाम' जैसे नारों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए आंबेकर ने कहा कि जब तक दुनिया में गौतम बुद्ध द्वारा दिखाया गया शांति और करुणा का मार्ग मौजूद है, तब तक कार्ल मार्क्स या किसी अन्य विदेशी विचारधारा के रास्ते पर चलने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त किए थे और हमें उनके मूल विचारों को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। आंबेकर ने वैश्विक परिस्थितियों का जिक्र करते हुए कहा कि दुनिया में चल रहे विभिन्न संघर्षों के कारण भारत भी कुछ क्षेत्रों में चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में सभी नागरिकों से सहयोग की अपेक्षा होती है और देश को आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने चाहिए।

लोकतंत्र और युवा शक्ति का महत्व

देश के युवाओं और उनके द्वारा व्यक्त किए जाने वाले मतभेदों पर आंबेकर ने कहा कि भारत एक जागरूक और जीवंत लोकतांत्रिक समाज है। यहां पारदर्शी चुनाव प्रणाली, स्वतंत्र मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से खुली चर्चा की एक मजबूत परंपरा है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में अलग-अलग विचारों का सामने आना और लोगों द्वारा अपनी राय व्यक्त करना एक सामान्य प्रक्रिया है। इसे किसी संकट के रूप में नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मजबूती के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने विश्वास जताया कि देश की संस्थाएं और लोकतांत्रिक तंत्र किसी भी परिस्थिति को संभालने में सक्षम हैं, इसलिए संघ को हर छोटे-बड़े मुद्दे पर हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं पड़ती।

आज की युवा पीढ़ी, जिसे 'जेन-ज़ी' कहा जाता है, के बारे में आंबेकर ने बहुत सकारात्मक विचार रखे। उन्होंने कहा कि आज के युवा भारत के भविष्य को लेकर बहुत आशावान हैं और उन्हें अपने राष्ट्र पर पूरा भरोसा है। ये युवा संविधान के दायरे में रहकर देश के विकास में अपना सक्रिय योगदान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत के युवाओं ने अपनी ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण के कार्यों में लगाया है, जिसके परिणामस्वरूप देश आज शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और उद्योग जैसे क्षेत्रों में निरंतर प्रगति कर रहा है। युवा शक्ति ही भारत की सबसे बड़ी पूंजी है और देश की तरक्की में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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