सेबी ने मार्केट बायबैक नियमों में किया बड़ा बदलाव, निवेशकों को मिलेगी राहत

सेबी ने 1 अगस्त से ओपन मार्केट बायबैक को फिर से शुरू करने की अनुमति दी है। म्यूचुअल फंड और एआईएफ के लिए नियमों को सरल बनाया गया है और सिक्योरिटीज ट्रांसफर की सीमा बढ़ाई गई है।

Jun 20, 2026 - 12:35
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सेबी ने मार्केट बायबैक नियमों में किया बड़ा बदलाव, निवेशकों को मिलेगी राहत

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कॉर्पोरेट जगत और निवेशकों के लिए कई महत्वपूर्ण फैसलों की घोषणा की है। मार्केट रेगुलेटर ने स्टॉक एक्सचेंज के माध्यम से ओपन मार्केट शेयर बायबैक को फिर से शुरू करने की मंजूरी दे दी है। सेबी के इस बड़े फैसले के बाद अब कंपनियां 1 अगस्त से खुले बाजार से अपने शेयर वापस खरीद सकेंगी। इस पूरी प्रक्रिया के लिए 66 वर्किंग डेज की एक निश्चित समय सीमा तय की गई है। सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) के इस कदम का मुख्य उद्देश्य कंपनियों के लिए बायबैक की प्रक्रिया को सरल बनाना और कागजी कार्रवाई को कम करना है। अब कंपनियां बिना किसी विशेष बायबैक विंडो के नियमित ट्रेडिंग सिस्टम के जरिए अपने शेयरों की खरीदारी कर सकेंगी, जिससे उन्हें पूंजी आवंटन में अधिक लचीलापन मिलेगा।

ओपन मार्केट बायबैक की वापसी और इसके मायने

सेबी ने साल 2025 में ओपन मार्केट बायबैक को धीरे-धीरे बंद करने का निर्णय लिया था। उस समय रेगुलेटर का मानना था कि यह व्यवस्था शेयरधारकों के बीच असमानता पैदा कर सकती है और इसमें टैक्स से जुड़ी कुछ खामियां भी देखी गई थीं। ऐसा माना जाता था कि यह सिस्टम कुछ चुनिंदा निवेशकों के पक्ष में काम कर सकता है। हालांकि, अब बोर्ड मीटिंग में लिए गए नए फैसले का उद्देश्य कंपनियों की ऑपरेशनल एफिशिएंसी को बेहतर बनाना है। जब कोई कंपनी अपने ही शेयर बाजार से वापस खरीदती है, तो उसे बायबैक कहा जाता है। इस प्रक्रिया के बाद बाजार में कंपनी के कुल शेयरों की संख्या कम हो जाती है। कंपनियां आमतौर पर ऐसा तब करती हैं जब उनके पास अतिरिक्त नकदी उपलब्ध हो या उन्हें लगे कि उनके शेयरों की कीमत वास्तविक मूल्य से कम है और बायबैक से न केवल निवेशकों का भरोसा बढ़ता है, बल्कि प्रति शेयर कमाई यानी ईपीएस में भी सुधार होता है और कई बार यह शेयर की कीमत को सहारा देने में भी मदद करता है।

म्यूचुअल फंड और एआईएफ के लिए नए नियम

सेबी ने म्यूचुअल फंड के लिए उधार लेने के नियमों में भी ढील दी है और म्यूचुअल फंड नियम 2026 में बदलाव के बाद अब फंड हाउसों को इंट्रा-डे उधार लेने की अनुमति होगी। इससे पे-इन और पे-आउट सेटलमेंट, विदेशी मुद्रा से जुड़ी देनदारियों और डेरिवेटिव पोजीशन पर मार्क-टू-मार्केट भुगतान से जुड़े समय के अंतर को दूर किया जा सकेगा। सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने स्पष्ट किया कि इस कदम का उद्देश्य फंड मैनेजरों को दैनिक लिक्विडिटी मिसमैच को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने में मदद करना है, बशर्ते यह उधार उसी दिन बाजार बंद होने से पहले चुका दिया जाए। इसके अलावा, अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (एआईएफ) के लिए गरुड़ (GARUDA) नाम का एक नया ग्रीन-चैनल सिस्टम शुरू किया गया है और इस फ्रेमवर्क के तहत योग्य एआईएफ स्कीमें अब प्लेसमेंट मेमोरेंडम फाइल करने के मात्र 10 वर्किंग डेज के भीतर फंड जुटाना शुरू कर सकेंगी, जबकि पहले इसके लिए 30 दिन का इंतजार करना पड़ता था।

सिक्योरिटीज ट्रांसफर की प्रक्रिया हुई आसान

निवेशकों की सुविधा के लिए सेबी ने किसी निवेशक की मृत्यु के बाद सिक्योरिटीज ट्रांसफर यानी ट्रांसमिशन की प्रक्रिया को भी काफी सरल बना दिया है। रेगुलेटर ने कम मूल्य वाले दावों के लिए क्विक ट्रांसमिशन प्रोसेसिंग (QTP) नाम की एक नई श्रेणी शुरू की है। नए नियमों के अनुसार, QTP की सुविधा फिजिकल सिक्योरिटीज के लिए 10000 रुपये तक और डीमैट सिक्योरिटीज के लिए 30000 रुपये तक के दावों पर मिलेगी। इसके साथ ही, आसान दस्तावेजों के जरिए ट्रांसमिशन की सीमा को भी दोगुना कर दिया गया है। अब फिजिकल होल्डिंग्स के लिए यह सीमा 10 लाख रुपये और डीमैट होल्डिंग्स के लिए 30 लाख रुपये कर दी गई है। इससे नॉमिनी और कानूनी वारिसों के लिए अपने वित्तीय एसेट्स पर दावा करना बहुत आसान और तेज हो जाएगा।

एआईएफ सेक्टर के आंकड़े और गवर्नेंस

देश में एआईएफ सेक्टर का तेजी से विस्तार हो रहा है और आंकड़ों के अनुसार, 31 मार्च 2026 तक भारत में रजिस्टर्ड एआईएफ की कुल संख्या 1849 थी और इनका कुल कमिटमेंट 15 लाख 74 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। सेबी ने अब एक्रेडिटेड निवेशकों वाली स्कीमों और एंजेल फंड्स के लिए मर्चेंट बैंकर के जरिए दस्तावेज फाइल करने की अनिवार्यता को भी खत्म कर दिया है। अब ऐसी स्कीमें दस्तावेज जमा करते ही लॉन्च की जा सकेंगी। इसके अलावा, सेबी ने अपने सदस्यों के लिए एक नया कोड ऑफ कंडक्ट और सेबी कर्मचारी सेवा नियम 2001 में बदलावों को भी मंजूरी दी है। ये बदलाव एक हाई-लेवल कमेटी की सिफारिशों पर आधारित हैं, ताकि हितों के टकराव को रोका जा सके और सूचनाओं को साझा करने से जुड़े नियमों को और अधिक सख्त बनाया जा सके।

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