क्या ट्रंप की लीबिया चाल में फंसा ईरान, गद्दाफी जैसा होगा अंजाम?

ईरान द्वारा अमेरिका को यूरेनियम सौंपने की खबरों ने लीबिया मॉडल की यादें ताजा कर दी हैं। क्या ईरान भी गद्दाफी जैसी गलती कर रहा है?

May 24, 2026 - 23:35
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क्या ट्रंप की लीबिया चाल में फंसा ईरान, गद्दाफी जैसा होगा अंजाम?

व्हाइट हाउस से आई एक चौंकाने वाली खबर ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। खबर है कि ईरान अपना सबसे बड़ा सुरक्षा कवच, यानी अपना संवर्धित यूरेनियम अमेरिका को सौंपने पर राजी हो गया है। इस खबर के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या ईरान ने अब तक का सबसे बड़ा जुआ खेल दिया है? क्या डोनाल्ड ट्रंप के सामने अपना संवर्धित यूरेनियम सरेंडर करने का फैसला ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई की एक ऐतिहासिक भूल साबित होने वाली है और आज पूरी दुनिया में इस बात की चर्चा हो रही है कि क्या अमेरिका ईरान के साथ भी वही खेल खेलने जा रहा है, जो उसने 2003 में लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी के साथ खेला था। इस रणनीति को 'पहले हथियार लो, फिर देश को तबाह करो' के रूप में देखा जा रहा है।

लीबिया मॉडल और मुअम्मर गद्दाफी का हश्र

ईरान को लगता है कि इस समझौते से उसके ऊपर लगे आर्थिक प्रतिबंध हट जाएंगे, उसकी अरबों डॉलर की संपत्ति अनलॉक हो जाएगी और पश्चिम एशिया में शांति बहाल होगी। हालांकि, विशेषज्ञ इसे अमेरिका की एक सोची-समझी चाल का हिस्सा मान रहे हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि जिसने भी अमेरिका के बहकावे में आकर अपने शक्तिशाली हथियार सरेंडर किए, अमेरिका ने उसे इतिहास के पन्नों से मिटा दिया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण लीबिया का तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी है। साल 2003 में गद्दाफी ने अमेरिका पर भरोसा किया और अपना पूरा न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम वाशिंगटन के हवाले कर दिया। गद्दाफी को लगा था कि उनका देश बच जाएगा और दुनिया उन्हें स्वीकार कर लेगी, लेकिन ठीक 8 साल बाद, 2011 में अमेरिका और नाटो ने लीबिया पर हमला कर दिया और गद्दाफी का तख्तापलट हो गया।

गद्दाफी की आत्मघाती भूल और नेतन्याहू की सलाह

जिस गद्दाफी ने अपने हथियार सौंपे थे, उन्हें उनकी ही जनता ने सड़क पर घसीटकर गोली मार दी थी। गद्दाफी के करीबी आज भी इस बात को दोहराते हैं कि न्यूक्लियर प्रोग्राम बंद करना उनकी जिंदगी की सबसे आत्मघाती भूल थी। यह डर आज ईरान के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पिछले कुछ सालों में कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि डोनाल्ड ट्रंप को ईरान पर 'लीबिया मॉडल' ही लागू करना चाहिए और इसका मतलब है कि पहले बातचीत के जरिए ईरान को पूरी तरह निहत्था कर दो, उसका यूरेनियम जब्त कर लो और जब ईरान बिना दांत का शेर बन जाए, तो वहां सत्ता परिवर्तन यानी रिजीम चेंज का खेल शुरू करो। सवाल यह है कि क्या मुज्तबा खामेनेई ने गद्दाफी के इतिहास से कोई सबक नहीं सीखा?

यूक्रेन की गलती बनाम उत्तर कोरिया की ताकत

हथियार सरेंडर करने के बाद तबाह होने वाला लीबिया इकलौता देश नहीं है और 1994 में यूक्रेन ने बुडापेस्ट मेमोरेंडम के तहत अपने सारे परमाणु हथियार रूस और अमेरिका के भरोसे सरेंडर कर दिए थे और आज यूक्रेन का क्या अंजाम हो रहा है, वह पूरी दुनिया देख रही है। इसके ठीक उलट उत्तर कोरिया को देखा जा सकता है, जिसने तमाम प्रतिबंधों के बावजूद अपने परमाणु बम बनाए रखे और आज अमेरिका की हिम्मत नहीं है कि वह किम जोंग उन पर आंख उठाकर भी देख सके। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और इजराइल की इस चाल का यह पहला चरण है, जिसमें ईरान को समझौते के लालच में निहत्था किया जा रहा है।

तख्तापलट की रणनीति और ईरान की चुनौतियां

एक बार जब ईरान अपना यूरेनियम सौंप देगा, तो उसका परमाणु 'डिटेरेंस' हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। इसके बाद दूसरा चरण शुरू होगा। ईरान के पास भले ही हिजबुल्लाह, हूती और बैलिस्टिक मिसाइलें हों, लेकिन बिना न्यूक्लियर बैकअप के इजराइल के लिए ईरान के भीतर घुसकर तख्तापलट करना या उनके कमांडरों को मारना बेहद आसान हो जाएगा। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि ईरान के पास पूरे पश्चिम एशिया में फैली अपनी प्रॉक्सी सेना है, जो उसे लीबिया से अलग बनाती है। लेकिन खतरा यह है कि अगर अमेरिका ने 2 साल बाद इस डील को दोबारा तोड़ दिया, जैसा कि ट्रंप ने 2018 में जेसीपीओए डील के साथ किया था, तो ईरान के पास दोबारा यूरेनियम संवर्धित करने में सालों लग जाएंगे। फिलहाल ईरान ने इस पर अंतिम मुहर नहीं लगाई है, लेकिन अगर वह इस राह पर बढ़ता है, तो क्या वह गद्दाफी जैसे चक्रव्यूह से बच पाएगा?

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