ट्रंप ने कनाडा पर 50 प्रतिशत टैरिफ का फैसला टाला, आखिरी पल में हुई बड़ी डील

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा के 20 अरब डॉलर के सामान पर 50 प्रतिशत टैरिफ टाल दिया है। पीएम मार्क कार्नी के साथ हुई डील के बाद यह फैसला लिया गया।

Aug 19, 2026 - 12:35
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ट्रंप ने कनाडा पर 50 प्रतिशत टैरिफ का फैसला टाला, आखिरी पल में हुई बड़ी डील

अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक संबंधों में एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा के साथ एक महत्वपूर्ण व्यापारिक समझौता होने के बाद 20 अरब डॉलर के कनाडाई सामानों पर प्रस्तावित 50 प्रतिशत के भारी टैरिफ को फिलहाल टालने का फैसला किया है। यह भारी-भरकम आयात शुल्क 20 अगस्त की सुबह से लागू होने वाला था, लेकिन अंतिम समय में हुई कूटनीतिक बातचीत ने इस संकट को टाल दिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इस समझौते की पुष्टि की है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक युद्ध की आशंका फिलहाल कम हो गई है।

आखिरी मिनट में कैसे बनी समझौते पर बात

इस पूरे मामले में समय का बहुत बड़ा महत्व था क्योंकि अमेरिका और कनाडा के बीच इस समझौते को लेकर बुधवार दोपहर 12 बजकर 1 मिनट की डेडलाइन तय की गई थी। यदि यह समय सीमा समाप्त हो जाती, तो हॉकी स्टिक से लेकर मेडिकल क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले टंग डिप्रेसर जैसे करीब 20 अरब डॉलर के कनाडाई उत्पादों पर 50 प्रतिशत टैक्स लागू हो जाता। इस स्थिति से बचने के लिए वाशिंगटन और ओटावा के बीच कूटनीतिक स्तर पर लगातार संवाद जारी रहा। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच पिछले दो दिनों में दो बार फोन पर लंबी और विस्तृत चर्चा हुई। मंगलवार दोपहर को भी दोनों नेताओं ने बातचीत की थी। इससे पहले सोमवार को प्रधानमंत्री कार्नी ने संकेत दिया था कि बातचीत बहुत ही नाजुक मोड़ पर है और किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले सार्वजनिक बयान देना जल्दबाजी होगी। अंततः यह प्रयास सफल रहा और ट्रंप ने अगले तीन दिनों के लिए टैरिफ पर रोक लगा दी है ताकि समझौते के दस्तावेजों को अंतिम रूप दिया जा सके।

नई डील की मुख्य विशेषताएं और फायदे

यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) के अनुसार, इस नए समझौते को अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इस डील में अमेरिकी सामानों के लिए कनाडाई बाजार तक व्यापक पहुंच सुनिश्चित करना, आर्थिक सुरक्षा को बढ़ावा देना और डिजिटल ट्रेड जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है। इसका मुख्य लक्ष्य अमेरिकी बाजार, वहां के श्रमिकों और कनाडाई सहयोगियों के हितों की रक्षा करना है। इसके साथ ही, राष्ट्रपति ट्रंप ने एक और बड़ा संकेत दिया है कि इस समझौते के सफल होने के बाद कीस्टोन एक्सएल पाइपलाइन प्रोजेक्ट को भी दोबारा शुरू किया जा सकता है। गौरतलब है कि इस बड़े प्रोजेक्ट को पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन ने काफी समय पहले बंद करवा दिया था, लेकिन अब इसे फिर से शुरू करने की संभावना बढ़ गई है।

दशकों पुराने विवाद और मजबूत सीमा संबंध

अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक रिश्ते हमेशा से उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। दोनों देश दशकों से सॉफ्टवुड लकड़ी के आयात और कनाडा के सुरक्षित डेयरी बाजार में अमेरिका की पहुंच जैसे मुद्दों पर एक-दूसरे के सामने खड़े रहे हैं। इन मतभेदों के बावजूद, दोनों देशों के बीच का आर्थिक और सामाजिक जुड़ाव बहुत गहरा है। करीब 5525 मील लंबी बिना किसी पहरे वाली सीमा से हर दिन लगभग 330000 लोग और 2 अरब डॉलर का माल गुजरता है। इसके अलावा, लगभग 8 लाख कनाडाई नागरिक अमेरिका में निवास करते हैं। ट्रंप लंबे समय से अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए टैरिफ को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। उन्होंने दबाव बनाने के लिए कई बार कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने जैसी टिप्पणियां भी की हैं, जो उनके कड़े रुख को दर्शाती हैं।

ट्रंप की व्यापक टैरिफ नीति और कानूनी चुनौतियां

अपने दूसरे कार्यकाल में डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ को अपनी आर्थिक नीतियों का केंद्र बिंदु बनाया है। पिछले साल उन्होंने अमेरिकी व्यापार घाटे को राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करते हुए लगभग हर देश से होने वाले आयात पर भारी टैक्स लगाने की कोशिश की थी। हालांकि, फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस कदम को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था और कहा था कि उन्होंने अपने अधिकारों का उल्लंघन किया है। इस अदालती फैसले के बाद संघीय सरकार को आयातकों का पैसा वापस करना पड़ा था। इसके बावजूद ट्रंप ने अपना रुख नरम नहीं किया और स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए पिछले महीने ही 59 देशों और यूरोपीय संघ पर 10 से 12 प्रतिशत 50 पैसे का नया आयात शुल्क लगा दिया। यह अमेरिका के कुल आयात का 99 प्रतिशत हिस्सा है। ट्रंप का तर्क है कि ये देश जबरन मजदूरी से बने उत्पादों के आयात को रोकने में विफल रहे हैं, इसलिए उन पर यह टैक्स लगाना जरूरी है।

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