बीकानेर के नोखा में धंसी जमीन: 40 फीट गहरा गड्ढा बनने से रिहायशी इलाके में दहशत

बीकानेर के नोखा में 40 फीट गहरा गड्ढा बनने से हड़कंप। डेढ़ साल पहले भी हुए थे हादसे। स्थानीय लोगों ने मुआवजे और शिफ्टिंग की मांग की।

Jun 13, 2026 - 22:35
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बीकानेर के नोखा में धंसी जमीन: 40 फीट गहरा गड्ढा बनने से रिहायशी इलाके में दहशत

बीकानेर जिले के नोखा कस्बे में एक रिहायशी इलाके में अचानक जमीन धंसने की घटना ने पूरे क्षेत्र में हड़कंप मचा दिया है। जमीन के इस तरह धंसने से वहां करीब 30 फीट चौड़ा और 40 फीट गहरा एक विशालकाय गड्ढा बन गया है। जैसे ही इस घटना की जानकारी आसपास के लोगों को मिली, मौके पर भारी भीड़ जमा हो गई। स्थानीय निवासियों का कहना है कि जमीन धंसने के कारण आसपास बने कई रिहायशी मकान अब खतरे की जद में आ गए हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में दहशत और असुरक्षा का माहौल व्याप्त है। यह घटना कस्बे के रोड़ा रोड स्थित काना महाराज की खेड़ी के पास घटित हुई है, जहां लोग अब अपने घरों में रहने से डर रहे हैं।

पुरानी घटनाओं का इतिहास और प्रशासन की भूमिका

उल्लेखनीय है कि जिस इलाके में यह हादसा हुआ है, वहां जमीन धंसने का यह कोई पहला मामला नहीं है। करीब डेढ़ साल पहले भी इसी क्षेत्र में जमीन धंसने के कारण 3 मकान पूरी तरह से जमींदोज हो गए थे। उस समय की तत्कालीन जिला कलेक्टर नम्रता वृष्णि ने स्वयं मौके का निरीक्षण किया था और स्थिति का जायजा लेकर आवश्यक निर्देश दिए थे। हालांकि, डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है, जिसके कारण आज फिर से वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई है। प्रभावित लोग अब प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि जल्द से जल्द पूरे क्षेत्र का तकनीकी सर्वे करवाया जाए और खतरे वाले स्थानों को चिह्नित किया जाए।

स्थानीय निवासियों की मांग और मुआवजे का सवाल

स्थानीय निवासी मगनाराम केंडली ने प्रशासन के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि इस क्षेत्र में आए दिन जमीन धंसने की घटनाएं होती रहती हैं और उन्होंने मांग की कि नगर पालिका को इन खतरनाक क्षेत्रों को अपने अधिकार क्षेत्र में लेकर वहां उचित तारबंदी करानी चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी व्यक्ति या पशु को कोई नुकसान न पहुंचे। मगनाराम ने उन लोगों के लिए मुआवजे की भी मांग की जिन्हें सरकार द्वारा पट्टे जारी किए गए थे, लेकिन उन्हें जमीन की इस स्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और उन्होंने एक पीड़ित महिला का उदाहरण देते हुए बताया कि उसका घर पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है और वह आज एक तंबू के नीचे रहने को मजबूर है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार ने ही पट्टे दिए और लोगों ने उसी आधार पर अपने जीवन की जमा पूंजी लगाकर मकान बनाए, तो अब इस असुरक्षा के लिए कौन जिम्मेदार है।

खदानों और कॉलोनाइजरों पर गंभीर आरोप

वहीं, एक अन्य स्थानीय निवासी लालचंद भादु ने बताया कि पिछले 2 वर्षों से यह सिलसिला लगातार चल रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि डेढ़ साल पहले जब 3 मकान धंसे थे, तब कलेक्ट्रेट की टीम ने दौरा किया था और इलाके को सुरक्षित करने के लिए बंद कर दिया गया था, लेकिन बाद में इसे फिर से खोल दिया गया। भादु ने बताया कि इन गड्ढों के कारण अब तक कम से कम 5 से 7 गायों की मौत हो चुकी है। उन्होंने इस भौगोलिक समस्या के पीछे का कारण बताते हुए आरोप लगाया कि यहां पहले पुरानी खदानें हुआ करती थीं और बाद में कुछ लालची कॉलोनाइजरों ने इन खदानों वाली जमीन को खरीद लिया और उन्हें केवल मिट्टी से भरकर ऊपर से समतल कर दिया। खदानों के किनारों पर गैस भर जाने और बारिश होने के कारण मिट्टी नीचे धंस जाती है, जिससे ऐसे गहरे गड्ढे बन जाते हैं। हालांकि इस बार कोई जनहानि नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो कोई बड़ा हादसा हो सकता है। क्षेत्रवासियों की मांग है कि सभी पट्टा धारकों को उचित मुआवजा देकर उन्हें किसी सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट किया जाए।

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