यूक्रेन में भारतीय शांति सेना? जेडी वेंस के सुझाव पर हंसे थे ट्रंप, किताब में बड़ा खुलासा
एक नई किताब का दावा है कि जेडी वेंस ने यूक्रेन में भारतीय शांति सेना भेजने का सुझाव दिया था, जिसे ट्रंप ने खारिज कर दिया। साथ ही ट्रंप ने भारत के टैरिफ पर भी सवाल उठाए।
न्यूयॉर्क टाइम्स के प्रसिद्ध पत्रकारों मैगी हैबरमैन और जोनाथन स्वान द्वारा लिखित एक नई पुस्तक 'रिजीम चेंज: इनसाइड द इंपीरियल प्रेसिडेंसी ऑफ डोनाल्ड ट्रंप' में यूक्रेन युद्ध और भारत के संदर्भ में कई चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। इस किताब में दावा किया गया है कि व्हाइट हाउस में यूक्रेन युद्ध पर अमेरिकी रणनीति को लेकर हुई एक महत्वपूर्ण चर्चा के दौरान, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने यह सुझाव दिया था कि यूक्रेन में शांति सेना के तौर पर भारत या सऊदी अरब के सैनिकों को तैनात किया जा सकता है और हालांकि, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सुझाव को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि भारतीय ऐसी किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे। यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब रूस और यूक्रेन के बीच 4 साल से अधिक समय से जंग जारी है और वैश्विक तनाव चरम पर है।
ओवल ऑफिस की बैठक और शांति योजना
किताब के अनुसार, यह चर्चा ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती दिनों में हुई थी। शपथ ग्रहण के महज 10 दिन बाद ओवल ऑफिस में एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई थी, जिसमें राष्ट्रपति ट्रंप और उनके शीर्ष सलाहकारों को रिटायर्ड आर्मी लेफ्टिनेंट जनरल कीथ केलॉग ब्रीफिंग दे रहे थे। केलॉग को राष्ट्रपति ने यूक्रेन और रूस के लिए विशेष राष्ट्रपति दूत के रूप में नियुक्त किया था और इस बैठक के दौरान केलॉग ने 'एन अमेरिका फर्स्ट प्लान: ट्रंप्स हिस्टोरिक पीस डील फॉर रशिया-यूक्रेन वॉर' नामक एक विस्तृत प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया गया था कि अमेरिका यूक्रेन के उन इलाकों पर रूस के दावों को औपचारिक मान्यता नहीं देगा जिन पर उसने कब्जा किया है, लेकिन इसमें एक बड़ी शर्त यह थी कि यूक्रेन बलपूर्वक उन खोए हुए इलाकों को वापस पाने की कोशिश नहीं करेगा और इसी रणनीति के तहत एक गैर-नाटो शांति सेना की तैनाती पर विचार किया गया था।
जेडी वेंस का सुझाव और ट्रंप की प्रतिक्रिया
" इसके बाद उन्होंने सुझाव दिया कि इस शांति सेना के लिए सऊदी अरब या भारत से सैनिकों को बुलाया जा सकता है और किताब में दावा किया गया है कि इस सुझाव पर ट्रंप मुस्कुराए और बोले, "भारतीय ऐसा नहीं करेंगे। " यह बयान भारत के प्रति ट्रंप के उस नजरिए को दर्शाता है जहां वे व्यापारिक और वित्तीय लेनदेन को प्राथमिकता देते हैं।
टैरिफ और व्यापार पर भारत के साथ तनातनी
किताब के एक अन्य अध्याय में भारत के साथ व्यापारिक संबंधों और टैरिफ पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। 10 मार्च को व्हाइट हाउस के रूजवेल्ट रूम में टेक्नोलॉजी सीईओ काउंसिल की एक बैठक हुई थी। इस बैठक में आईबीएम, एचपीई, डेल, एचपी इंक, क्वालकॉम और इंटेल जैसी दिग्गज कंपनियों के प्रमुख शामिल हुए थे। यह बैठक उस समय हुई थी जब 'स्पेशल गवर्नमेंट एम्पलॉयी' के तौर पर काम कर रहे अरबपति व्यवसायी एलन मस्क की कैबिनेट सचिवों के साथ कुछ अनबन की खबरें आई थीं। बैठक के दौरान अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लटनिक ने अधिकारियों से पूछा कि अमेरिका में नई फैक्ट्रियां लगाने के लिए उन्हें किन चीजों की आवश्यकता होगी।
भारत पर 175 प्रतिशत टैरिफ का आरोप
इसी बैठक में टैरिफ के मुद्दे पर बात करते हुए ट्रंप ने फिर से भारत का जिक्र किया और उन्होंने दावा किया कि भारत अमेरिकी सामानों पर 175 प्रतिशत तक की भारी ड्यूटी लगाता है। ट्रंप ने अपनी सख्त व्यापार नीति को दोहराते हुए कहा कि जो लोग अमेरिका में सामान नहीं बनाएंगे, उन्हें भारी टैरिफ का सामना करना होगा। उन्होंने कहा, "जो लोग यहां सामान नहीं बनाएंगे, उन्हें भारी टैरिफ देना होगा और 20 प्रतिशत नहीं, बल्कि 100 प्रतिशत। हमारे साथ बहुत नाइंसाफी होती है। " यह किताब दर्शाती है कि ट्रंप प्रशासन के दौरान भारत के साथ संबंधों में सुरक्षा और व्यापारिक हितों के बीच एक जटिल संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही थी और ट्रंप भारत की टैरिफ नीतियों से काफी असंतुष्ट थे।
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