रतन राजपूत: 'लाली' की गुमनामी का सच, गंभीर बीमारी और आध्यात्म का सफर

टीवी स्टार रतन राजपूत की गुमनामी की कहानी। जानें कैसे 'लाली' ने डिप्रेशन और ऑटोइम्यून बीमारी से जंग जीती और अब पटना में आध्यात्म का जीवन जी रही हैं।

Apr 21, 2026 - 09:35
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रतन राजपूत: 'लाली' की गुमनामी का सच, गंभीर बीमारी और आध्यात्म का सफर

मशहूर हस्तियों की चकाचौंध भरी दुनिया बाहर से जितनी लुभावनी दिखती है, उसके पीछे का एकांत और संघर्ष अक्सर उतना ही गहरा होता है। ग्लैमर की इस दौड़ में कभी-कभी ऐसे मोड़ आते हैं, जहां एक कलाकार अपनी शोहरत और कामयाबी को पीछे छोड़कर शांति की तलाश में निकल जाता है और एक ऐसी अभिनेत्री, जिसने अपनी संजीदा अदाकारी से सालों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया और टीवी जगत की टॉप स्टार्स की सूची में जगह बनाई, अचानक गुमनामी के साये में चली गई। उनकी यह कहानी केवल करियर के उतार-चढ़ाव की नहीं, बल्कि जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजरने, खुद को भीतर से खोजने और एक अदृश्य बीमारी के खिलाफ लड़ी गई उस लंबी जंग की है, जिसने उन्हें कैमरों की रोशनी से दूर रहने पर मजबूर कर दिया और ये एक्ट्रेस कोई और नहीं बल्कि 'अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो' की 'लाली' यानी रतन राजपूत हैं।

करियर का शिखर और नियति का प्रहार

रतन राजपूत का अभिनय सफर सफलताओं से भरा रहा है। 'अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो' जैसे कल्ट शो ने उन्हें घर-घर में 'लाली' के रूप में पहचान दिलाई। इसके बाद 'महाभारत' और 'संतोषी मां' जैसे धारावाहिकों ने उनकी स्थिति और मजबूत की और यहाँ तक कि उनके स्वयंवर पर आधारित रियलिटी शो ने भी खूब चर्चा बटोरी। सब कुछ सही चल रहा था, लेकिन साल 2018 में उनके पिता के निधन ने उनकी पूरी दुनिया बदल दी। यह व्यक्तिगत क्षति उनके लिए एक गहरा सदमा थी, जिसने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया। गहरे अवसाद (डिप्रेशन) की गिरफ्त में आकर उन्होंने ग्लैमर की दुनिया से नाता तोड़ लिया और खुद को एकांत के हवाले कर दिया।

गांव की सादगी में खुद की तलाश

मुंबई की भागदौड़ भरी जिंदगी को अलविदा कहकर रतन ने एक अनजान गांव की राह चुनी। यह उनके लिए खुद को फिर से जीवित करने की एक प्रक्रिया थी। उन्होंने खेतों में पसीना बहाया, मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाया और अपनी पहचान छिपाकर एक साधारण ग्रामीण जीवन जिया। इस दौरान उन्होंने व्लॉगिंग के जरिए अपनी इस यात्रा को दुनिया के साथ साझा भी किया। आध्यात्म की ओर उनका झुकाव बढ़ा और उन्होंने चंडीगढ़ से लेकर वृंदावन तक के सफर में जीवन के गूढ़ अर्थों को समझने की कोशिश की। उन्होंने एक छात्र के रूप में हॉस्टल में रहकर नई चीजें सीखीं और परिवार के साथ रहकर अपनी जड़ों को मजबूत किया।

ऑटोइम्यून बीमारी और अंधेरे से जंग

हाल ही में रतन की अनुपस्थिति का एक और बड़ा कारण सामने आया। अभिनेत्री एक गंभीर 'ऑटोइम्यून' बीमारी की चपेट में आ गई थीं। इस शारीरिक तकलीफ ने उनकी स्थिति इतनी नाजुक कर दी थी कि वे तेज रोशनी बर्दाश्त नहीं कर पाती थीं। स्टूडियो की लाइट और कैमरों के सामने खड़ा होना तो दूर, उन्हें घर के भीतर भी काला चश्मा पहनना पड़ता था। इस बीमारी ने उन्हें अभिनय की दुनिया से और दूर कर दिया और करीब छह साल तक उन्होंने इस अदृश्य शत्रु से लड़ाई लड़ी। रिपोर्ट्स के अनुसार होम्योपैथी उपचार और धैर्य के साथ अब उनकी सेहत में सुधार है और वे धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर लौट रही हैं।

वर्तमान स्थिति और आध्यात्म का मार्ग

रतन राजपूत को आखिरी बार साल 2024 में प्रेमानंद जी महाराज के शरण में देखा गया था, जहां उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले पांच सालों से वे पूरी तरह आध्यात्म के मार्ग पर हैं। उनके लिए अब अभिनय जीवन का एकमात्र लक्ष्य नहीं रह गया है। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पड़ोसी के हवाले से यह जानकारी मिली कि रतन वर्तमान में पटना स्थित अपने घर में अपनों के बीच समय बिता रही हैं। हाल ही में वो पटना में अपने भांजे की बर्थडे का हिस्सा बनी थीं। वे स्वास्थ्य संबंधी बाधाओं को पार कर अब शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रही हैं।

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