शेयर बाजार में हाहाकार: 12 फाइनेंशियल कंपनियों के 1 लाख 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा डूबे
24 सितंबर को शेयर बाजार में गिरावट से 12 फाइनेंशियल कंपनियों का मार्केट कैप 1 लाख 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा घट गया। बजाज फाइनेंस और पीबी फिनटेक को बड़ा नुकसान हुआ।
भारतीय शेयर बाजार में 24 सितंबर को एक बड़ा हाहाकार देखने को मिला, जब फाइनेंशियल सेक्टर के शेयरों में जबरदस्त बिकवाली का दौर चला। इंट्राडे कारोबार के दौरान स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि 12 प्रमुख फाइनेंस कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन यानी बाजार पूंजीकरण 1 लाख 12 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा घट गया। इस गिरावट ने निवेशकों के बीच चिंता की लहर पैदा कर दी है, क्योंकि बैंकिंग, फाइनेंस और इंश्योरेंस जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारी बिकवाली दर्ज की गई। बाजार में इस हलचल ने निवेशकों की संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाया है।
बाजार में गिरावट के मुख्य कारण
बाजार पर इस दबाव के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण जिम्मेदार रहे। एक तरफ अमेरिका में बढ़ती बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने निवेशकों को सतर्क कर दिया, वहीं दूसरी तरफ इंश्योरेंस सेक्टर के नियमों में प्रस्तावित बदलावों ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया और इंश्योरेंस सेक्टर के लिए जो नए नियम प्रस्तावित किए गए हैं, उन्हें लेकर बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। विशेष रूप से कमीशन ढांचे में बदलाव की खबरों ने निवेशकों को बिकवाली के लिए मजबूर किया, जिसका सीधा असर संबंधित कंपनियों के शेयरों पर पड़ा।
इन कंपनियों को हुआ सबसे बड़ा नुकसान
जिन 12 फाइनेंशियल कंपनियों के मार्केट कैप में बड़ी गिरावट आई, उनमें बजाज फाइनेंस को सबसे ज्यादा चोट पहुंची है। बजाज फाइनेंस का मार्केट कैप करीब 29000 करोड़ रुपये कम हो गया। इसके बाद पीबी फिनटेक का नंबर रहा, जिसके बाजार मूल्य में करीब 20000 करोड़ रुपये की कमी आई। बैंकिंग क्षेत्र के दिग्गजों की बात करें तो एचडीएफसी बैंक का मार्केट कैप लगभग 15000 करोड़ रुपये घट गया, जबकि एक्सिस बैंक को करीब 14000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि बाजार के बड़े खिलाड़ियों पर बिकवाली का कितना गहरा असर हुआ है।
इंश्योरेंस शेयरों पर दिखा सबसे ज्यादा दबाव
इंश्योरेंस सेक्टर से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में भी तेज गिरावट का रुख रहा। आंकड़ों के अनुसार, एचडीएफसी लाइफ का मार्केट कैप करीब 7600 करोड़ रुपये कम हुआ। मैक्स फाइनेंशियल के मार्केट कैप में 6800 करोड़ रुपये की गिरावट आई, जबकि आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ का बाजार मूल्य करीब 3000 करोड़ रुपये घट गया। इसके अलावा टर्टलमिनट के मार्केट कैप में भी करीब 802 करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई। इन चार प्रमुख इंश्योरेंस कंपनियों को मिलाकर कुल 38100 करोड़ रुपये के मार्केट कैप का नुकसान हुआ है, जो इस सेक्टर में मची खलबली को बयां करता है।
अन्य वित्तीय संस्थानों की स्थिति
गिरावट का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा और इसने अन्य वित्तीय संस्थानों को भी अपनी चपेट में ले लिया। एलएंडटी फाइनेंस के मार्केट कैप में करीब 6200 करोड़ रुपये की कमी आई। इसके साथ ही इंडसइंड बैंक, आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक के शेयरों में भी बिकवाली रही, जिससे इन तीनों बैंकों के मार्केट कैप में करीब 3000 करोड़ रुपये की गिरावट दर्ज की गई। बाजार के जानकारों का मानना है कि यह बिकवाली चौतरफा थी और इसने लगभग सभी बड़े वित्तीय संस्थानों के मूल्यांकन को प्रभावित किया है।
पीबी फिनटेक और कमीशन नियमों का असर
बाजार की सबसे बड़ी चिंता इंश्योरेंस कमीशन की सीमा को लेकर है। यदि कमीशन की सीमा कम की जाती है, तो हर पॉलिसी की बिक्री पर डिस्ट्रीब्यूटर्स की कमाई में बड़ी कटौती हो सकती है। इसका सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ेगा जो पूरी तरह से इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन पर निर्भर हैं और ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि प्रस्तावित कमीशन कटौती उनकी उम्मीद से कहीं ज्यादा है। बर्नस्टीन के मुताबिक, इसका सबसे ज्यादा असर पीबी फिनटेक पर पड़ सकता है और इसके अलावा, हेल्थ और टर्म इंश्योरेंस की ग्रोथ पर भी दबाव आने की संभावना जताई गई है, जो भविष्य की कमाई को प्रभावित कर सकता है।
ब्रोकरेज फर्मों का विश्लेषण और भविष्य की राह
हालांकि, बर्नस्टीन ने यह भी संकेत दिया है कि डिस्ट्रीब्यूशन लागत कम होने का कुछ फायदा भविष्य में ग्राहकों तक पहुंच सकता है, जिससे पॉलिसी की बिक्री बढ़ने की संभावना बन सकती है। दूसरी ओर, मैक्वेरी का मानना है कि प्रस्तावित व्यवस्था का असर अलग-अलग इंश्योरेंस चैनलों पर अलग-अलग तरीके से होगा और जेफरीज ने एक अनुमान पेश करते हुए कहा है कि यदि कमीशन दरों में 10 प्रतिशत की कमी आती है, तो पीबी फिनटेक और टर्टलमिनट जैसी कंपनियों की कमाई में 10 से 12 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। यह विश्लेषण बताता है कि नियामक बदलावों का असर कंपनियों के मुनाफे पर सीधा और गहरा हो सकता है।
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