Haryana Politics: BJP सरकार 17 को यूं ही नहीं शपथ ले रही,छिपा बड़ा सियासी संदेश

Haryana Politics: हरियाणा विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने तीसरी बार जीत दर्ज की. कांग्रेस जीती हुई सियासी बाजी हार गई और बीजेपी ने हारा हुआ चुनाव जीतकर रिकॉर्ड

Oct 14, 2024 - 11:25
Oct 14, 2024 - 12:32
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Haryana Politics: BJP सरकार 17 को यूं ही नहीं शपथ ले रही,छिपा बड़ा सियासी संदेश

Haryana Politics: हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 में बीजेपी ने लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल कर बड़ी राजनीतिक सफलता प्राप्त की है। चुनावी जीत के बाद अब सरकार गठन की प्रक्रिया जोरों पर है, और इस सिलसिले में 16 अक्टूबर को विधायक दल की बैठक में मुख्यमंत्री के चयन की प्रक्रिया संपन्न होगी। इसके बाद 17 अक्टूबर को शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन होगा। बीजेपी ने इस खास दिन को यूं ही नहीं चुना, बल्कि इसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति है, जिसके जरिए पार्टी ने हरियाणा की राजनीति में एक बड़ा सियासी संदेश देने की योजना बनाई है।

17 अक्टूबर: महर्षि वाल्मीकि जयंती और बीजेपी की रणनीति

17 अक्टूबर 2024 को महाकाव्य रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि की जयंती है। वाल्मीकि समाज के लोग इस दिन को परगट दिवस के रूप में मनाते हैं, जो उनके लिए एक महत्वपूर्ण पर्व है। बीजेपी ने इस अवसर को ध्यान में रखते हुए हरियाणा में अपने शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन रखा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पार्टी ने दलित समुदाय को एक महत्वपूर्ण संदेश देने की रणनीति अपनाई है। इसके माध्यम से बीजेपी दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है।

हरियाणा सरकार ने पहले ही वाल्मीकि जयंती को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर रखा है। इस तरह, बीजेपी ने अपने सियासी दांव-पेंच के जरिए यह सुनिश्चित किया है कि वाल्मीकि जयंती के दिन सरकार के शपथ ग्रहण से दलित समुदाय को विशेष रूप से जोड़ा जाए।

दलित वोट बैंक पर बीजेपी की नजर

हरियाणा के 2024 चुनावों में दलित वोट बैंक एक प्रमुख मुद्दा रहा। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों ने दलित समुदाय का समर्थन पाने के लिए पूरी ताकत लगाई। कांग्रेस की नेता कुमारी सैलजा को बीजेपी ने दलित स्वाभिमान के मुद्दे से जोड़कर कांग्रेस पर प्रहार किया था। इस राजनीतिक चाल का बीजेपी को लाभ मिला, और अब पार्टी वाल्मीकि जयंती के दिन शपथ ग्रहण का आयोजन कर इस संदेश को और मजबूत करने की कोशिश कर रही है कि वह दलितों के हित में कार्य कर रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत बीजेपी शासित अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री इस शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होंगे, जिससे इस आयोजन की अहमियत और बढ़ जाएगी।

महर्षि वाल्मीकि को सम्मान: बीजेपी की लगातार कोशिश

बीजेपी ने पहली बार महर्षि वाल्मीकि को ध्यान में रखते हुए यह कदम नहीं उठाया है। इससे पहले भी पार्टी ने कई मौकों पर महर्षि वाल्मीकि के योगदान को सम्मानित करने का प्रयास किया है। जनवरी 2024 में अयोध्या में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम महर्षि वाल्मीकि के नाम पर रखा गया था। इसी प्रकार, हरियाणा में बीजेपी सरकार ने अक्टूबर 2015 में कैथल विश्वविद्यालय का नाम बदलकर महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय कर दिया था। इसके साथ ही, पानीपत में रेलवे रोड चौराहे का नाम महर्षि वाल्मीकि चौक रखा गया था।

बीजेपी की दलितों को साधने की रणनीति

बीजेपी की राजनीति में महर्षि वाल्मीकि का सियासी महत्व है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने अपने कार्यकाल के दौरान कहा था कि अंत्योदय और सामाजिक समरसता उनकी सरकार का आदर्श वाक्य है। महर्षि वाल्मीकि के राम राज्य के सपने को साकार करने की दिशा में बीजेपी लगातार दलित समुदाय को साधने की रणनीति पर काम कर रही है। वाल्मीकि जयंती के अलावा, हरियाणा में बीजेपी ने अन्य संतों और उनके योगदान को भी मान्यता दी है। उदाहरण के लिए, 2022 में खट्टर सरकार ने घोषणा की थी कि चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास का नाम ‘संत कबीर कुटीर’ रखा जाएगा।

बीजेपी की जीत: दलित और ओबीसी वोट बैंक पर पकड़

हरियाणा में दलित समुदाय की आबादी लगभग 21% है, जो जाट समुदाय के बाद दूसरी सबसे बड़ी जाति है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने दलित-जाट समीकरण के सहारे बड़ी सफलता प्राप्त की थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इस समीकरण को तोड़ते हुए जीत हासिल की। दलित और ओबीसी वर्गों में अपनी पकड़ मजबूत कर बीजेपी ने हरियाणा में तीसरी बार सत्ता में वापसी की है।

बीजेपी ने गैर-जाटलैंड के साथ-साथ दलित और ओबीसी वर्गों में लगातार अपनी पकड़ बनाए रखी है, और इस बार वाल्मीकि जयंती के दिन शपथ ग्रहण समारोह आयोजित कर दलित समुदाय को एक और मजबूत संदेश देने की कोशिश की है। यह कदम बीजेपी की दलितों को अपने साथ मजबूती से जोड़ने की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है।

निष्कर्ष

हरियाणा में बीजेपी की तीसरी बार सत्ता में वापसी सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं है, बल्कि यह एक सियासी संदेश भी है। वाल्मीकि जयंती के दिन शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन कर बीजेपी ने एक बार फिर साबित किया है कि वह दलित समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिशों में लगी हुई है। महर्षि वाल्मीकि के नाम को केंद्र में रखते हुए बीजेपी की यह रणनीति भविष्य में भी उसके लिए राजनीतिक तौर पर फायदेमंद साबित हो सकती है।

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