:बांग्लादेश चुनाव: क्या अमेरिका अब जमात-ए-इस्लामी के लिए कर रहा है 'फिल्डिंग' सेट?

बांग्लादेश में 12 फरवरी के चुनावों से पहले अमेरिकी राजनयिकों और जमात-ए-इस्लामी के बीच बढ़ती नजदीकी ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। जानिए क्या है पूरा मामला।

Jan 23, 2026 - 20:35
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:बांग्लादेश चुनाव: क्या अमेरिका अब जमात-ए-इस्लामी के लिए कर रहा है 'फिल्डिंग' सेट?

बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले संसदीय चुनावों को लेकर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। लेकिन इस बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने दक्षिण एशियाई राजनीति में हलचल मचा दी है और अमेरिकी मीडिया आउटलेट 'वॉशिंगटन पोस्ट' की एक हालिया रिपोर्ट ने दावा किया है कि बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामवादी पार्टी, जमात-ए-इस्लामी, आगामी चुनावों में एक बड़ी ताकत बनकर उभर रही है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राजनयिक इस पार्टी के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, जो ऐतिहासिक रूप से कट्टरपंथी विचारधारा के लिए जानी जाती रही है।

वॉशिंगटन पोस्ट का सनसनीखेज दावा

वॉशिंगटन पोस्ट को मिली एक ऑडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर यह दावा किया गया है कि ढाका में तैनात एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक ने बांग्लादेश के राजनीतिक भविष्य को लेकर बड़ी बात कही है। 1 दिसंबर को बांग्लादेश की महिला पत्रकारों के साथ हुई एक बंद कमरे की बैठक में, इस राजनयिक ने कथित तौर पर कहा कि बांग्लादेश अब 'इस्लामी तरीके' से बदल गया है। उन्होंने अनुमान लगाया कि 12 फरवरी के चुनावों में जमात-ए-इस्लामी अब तक का अपना सबसे शानदार प्रदर्शन करेगी। राजनयिक ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'हम चाहते हैं कि वे हमारे दोस्त हों और ' सुरक्षा कारणों से इस राजनयिक के नाम का खुलासा नहीं किया गया है, लेकिन इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है।

जमात-ए-इस्लामी का बदला हुआ अवतार

जमात-ए-इस्लामी का इतिहास काफी विवादास्पद रहा है। इस संगठन पर बांग्लादेश में कई बार प्रतिबंध लगाया जा चुका है। और इसके कई नेताओं पर युद्ध अपराधों के आरोप भी लगे हैं। पारंपरिक रूप से यह पार्टी शरीयत कानून के तहत शासन की वकालत करती रही है। हालांकि, हाल के वर्षों में जमात ने अपनी छवि को 'नरम' करने की कोशिश की है। पार्टी अब भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडे, सुशासन और जवाबदेही पर ध्यान केंद्रित कर रही है। पार्टी के प्रवक्ता मोहम्मद रहमान का कहना है कि उनका अब शरीयत कानून लागू करने का कोई इरादा नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शेख हसीना की सरकार के दौरान हाशिए पर धकेले जाने के बाद, अब यह पार्टी मुख्यधारा में लौटने के लिए बेताब है।

भारत के लिए क्यों है यह चिंता का विषय?

अटलांटिक काउंसिल में दक्षिण एशिया मामलों के वरिष्ठ फेलो माइकल कुगेलमैन का मानना है कि अमेरिका का जमात-ए-इस्लामी की ओर झुकाव भारत और अमेरिका के रिश्तों में तनाव पैदा कर सकता है और भारत लंबे समय से जमात-ए-इस्लामी को पाकिस्तान के करीब और अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखता रहा है। कुगेलमैन के अनुसार, भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर जमात सत्ता में आती है या मजबूत होती है, तो इससे कट्टरपंथ को बढ़ावा मिल सकता है। पहले से ही भारत और अमेरिका के बीच रूसी तेल की खरीद और व्यापारिक समझौतों को लेकर। कुछ मतभेद हैं, ऐसे में बांग्लादेश का यह मुद्दा आग में घी का काम कर सकता है।

अमेरिकी दूतावास की सफाई और भविष्य की राह

इस पूरे विवाद पर ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास की प्रवक्ता मोनिका शाई ने स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने कहा कि दिसंबर में हुई वह बैठक एक सामान्य और 'ऑफ-द-रिकॉर्ड' बातचीत थी और उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिका किसी एक विशेष राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करता है और वह बांग्लादेश की जनता द्वारा चुनी गई किसी भी सरकार के साथ काम करने के लिए तैयार है। हालांकि, राजनयिक की रिकॉर्डिंग में जिस तरह से जमात को 'दोस्त' बनाने की बात कही गई है, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। 12 फरवरी के चुनाव न केवल बांग्लादेश का भविष्य तय करेंगे, बल्कि यह भी दिखाएंगे। कि दक्षिण एशिया में अमेरिका और भारत के रणनीतिक हित किस दिशा में जा रहे हैं।

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