Rajasthan:बच्चों के हक का दूध पाउडर मावा फैक्ट्रियों को 160-200 के भाव से बेच रहे हेड मास्टर

राजस्थान में बाल गोपाल योजना के तहत सरकारी स्कूलों में बच्चों के दूध पाउडर को हेडमास्टरों द्वारा मावा फैक्ट्रियों को बेचने का बड़ा घोटाला सामने आया है। इस भ्रष्टाचार से 69 लाख बच्चों का पोषण खतरे में है।

Oct 26, 2025 - 07:35
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Rajasthan:बच्चों के हक का दूध पाउडर मावा फैक्ट्रियों को 160-200 के भाव से बेच रहे हेड मास्टर

राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बच्चों के पोषण के लिए शुरू की गई 'बाल गोपाल योजना' अब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती दिख रही है। एक चौंकाने वाले खुलासे में सामने आया है कि इस योजना के तहत बच्चों को मिलने वाला दूध पाउडर हेडमास्टरों द्वारा मावा फैक्ट्रियों को 160-200 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से बेचा जा रहा है। यह गंभीर अनियमितता राज्य के 69 लाख स्कूली बच्चों के भविष्य और उनके स्वास्थ्य पर सीधा असर डाल रही है, जिसके लिए सरकार हर साल 722 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। यह खुलासा एक महीने की पड़ताल के बाद हुआ है, जिसमें कई हेडमास्टरों की संलिप्तता सामने आई है।

बाल गोपाल योजना का उद्देश्य और वर्तमान स्थिति

'बाल गोपाल योजना' का मुख्य उद्देश्य सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को कुपोषण से बचाना और उनके शारीरिक विकास को सुनिश्चित करना है। इस योजना के तहत, प्रत्येक बच्चे को सप्ताह में दो बार दूध पाउडर से बना दूध उपलब्ध कराया जाता है। 4 सितंबर 2024 को इसे 'मुख्यमंत्री बाल गोपाल योजना' से बदलकर 'पथ्यादाय बाल गोपाल योजना' कर दिया गया था। राष्ट्रीय सहकारी डेयरी विकास बोर्ड (RCDF) द्वारा स्कूलों तक दूध पाउडर की डोर-स्टेप डिलीवरी की जाती है। हालांकि, योजना के नेक इरादों के बावजूद, कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और शिक्षकों के कारण यह अपने लक्ष्य से भटक रही है। बच्चों को दूध पिलाने के बजाय, उनके हिस्से का पाउडर फैक्ट्रियों में भेजा। जा रहा है, जिससे मावा और अन्य दुग्ध उत्पाद बनाए जा रहे हैं।

भ्रष्टाचार का तरीका और खुलासे

जांच में सामने आया है कि हेडमास्टर और अन्य शिक्षक सुनियोजित तरीके से दूध पाउडर को डायवर्ट कर रहे हैं। जोधपुर और बालोतरा जैसे जिलों में कई उदाहरण सामने आए हैं। बालोतरा में, एक मावा फैक्ट्री के मालिक ने रिपोर्टर को बताया कि वे 200 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से पाउडर खरीदने को तैयार हैं। उन्होंने यह भी बताया कि अन्य ठेकेदार भी इसी दर पर खरीदते हैं और एक अन्य मामले में, जोधपुर के मनमाजी की ढाणी स्थित संस्कृत स्कूल के हेडमास्टर राजेश मीणा ने रिपोर्टर के मोबाइल पर 11 किलो दूध पाउडर 160 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेच दिया, जिसका भुगतान एक दोस्त राजेंद्र को यूपीआई के माध्यम से किया गया।

विभिन्न स्थानों से मिले सबूत

बालोतरा के जाटो की ढाणी में हेडमास्टर शीला भलाई को पेट्रोल पंप के पास चार थैलियां देते हुए देखा गया। वहीं, प्राथमिक विद्यालय नागनेशियों की ढाणी के हेडमास्टर सुरेश कुमार ने दोपहर में स्कूल से जाने के बाद नौ थैलियां दीं, जिनका नकद भुगतान किया गया और उन्होंने स्कूल टाइम के बाद आने को कहा था। जोधपुर के बाहरी भाग स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय के हेडमास्टर मंगलाराम ने रिपोर्टर को बताया कि दूसरी थैली में पैक करके देंगे ताकि पकड़े न जाएं। उन्होंने अपने प्रिंसिपल पप्पा राम गोदारा के छुट्टी के बाद आने को कहा। ये सभी खुलासे इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं, बल्कि एक संगठित भ्रष्टाचार का हिस्सा है।

बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर

प्रशासनिक कार्रवाई और आगे की राह

इस भ्रष्टाचार का सबसे बुरा असर उन लाखों बच्चों पर पड़ रहा है, जिन्हें कुपोषण से बचाने के लिए यह योजना शुरू की गई थी। दूध पाउडर में आवश्यक पोषक तत्व होते हैं जो बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। जब यह पाउडर बाजार में बेचा जाता है, तो बच्चे इन महत्वपूर्ण पोषक तत्वों से वंचित रह जाते हैं। यह न केवल योजना के उद्देश्य को विफल करता है, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य और भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है और एक किलो सरकारी दूध पाउडर से लगभग 10. 5 लीटर दूध या 2 और 5 किलो मावा बनता है। बाजार में भैंस के दूध से बना मावा 240 रुपये प्रति किलो मिलता है, जबकि चोरी के पाउडर से बना। मावा 90 रुपये प्रति किलो में उपलब्ध हो जाता है, जिससे भ्रष्टाचारियों को 150 रुपये प्रति किलो का मुनाफा होता है। इस मामले के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है और प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा निदेशक सीताराम जाट ने इसे गंभीर मामला बताया है और कहा है कि क्षेत्राधिकार के तहत इसमें जो भी लिप्त पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। ऐसे भ्रष्टाचार को रोकने के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत करना और दोषियों के खिलाफ त्वरित और कठोर कार्रवाई करना अत्यंत आवश्यक है। यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों के हक का एक भी दाना किसी भ्रष्ट अधिकारी या व्यापारी की जेब में न जाए और योजना का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचे। भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए नियमित ऑडिट, औचक निरीक्षण और सख्त कानूनी प्रावधान लागू किए जाने चाहिए और यह केवल एक योजना का सवाल नहीं, बल्कि देश के भविष्य और नैतिक मूल्यों का भी प्रश्न है।

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