ऋषि सुनक का बड़ा बयान: त्वचा का रंग राष्ट्रीयता तय नहीं करता, मैं अंग्रेज और हिंदू दोनों हूं

पूर्व ब्रिटिश PM ऋषि सुनक ने कहा कि त्वचा का रंग राष्ट्रीयता तय नहीं करता। उन्होंने खुद को अंग्रेज और हिंदू बताते हुए टेबिट टेस्ट और इमिग्रेशन पर अपनी राय रखी।

Sep 21, 2026 - 19:35
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ऋषि सुनक का बड़ा बयान: त्वचा का रंग राष्ट्रीयता तय नहीं करता, मैं अंग्रेज और हिंदू दोनों हूं

ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने देश में जाति, रंग और राष्ट्रीय पहचान को लेकर एक नई और गंभीर चर्चा की शुरुआत कर दी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी भी व्यक्ति की त्वचा का रंग उसकी राष्ट्रीयता को परिभाषित नहीं करता है। अपनी पहचान को लेकर बात करते हुए सुनक ने गर्व के साथ कहा कि वे अंग्रेज भी हैं और हिंदू भी। गौरतलब है कि ऋषि सुनक भारतीय मूल के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया और 10 डाउनिंग स्ट्रीट में रहकर देश का नेतृत्व किया।

संडे टाइम्स में लेख और पहचान का सवाल

ऋषि सुनक ने संडे टाइम्स अखबार में लिखे अपने एक हालिया कॉलम में इन महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने पिछले सप्ताह लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड में दिए गए अपने एक भाषण का संदर्भ देते हुए बताया कि कैसे क्रिकेट और अन्य खेल विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने का काम करते हैं। सुनक ने इस बात पर चिंता जताई कि ब्रिटेन की महान लोकतांत्रिक उपलब्धियां वर्तमान में दबाव के दौर से गुजर रही हैं और उन्होंने कहा कि समाज को एकजुट रखने वाले ये सूत्र अब चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

देश के सामने मौजूद चुनौतियां

पूर्व प्रधानमंत्री ने उन चुनौतियों का भी जिक्र किया जो उनके अनुसार देश के लिए चिंता का विषय हैं। उन्होंने कहा कि हमें कुछ विशेष चुनौतियों का सामना करना होगा, जैसे कि इस्लामवाद से जुड़ी चुनौतियां। इसके साथ ही, उन्होंने हाल के वर्षों में सरकार द्वारा आप्रवासन यानी इमिग्रेशन को ठीक से नियंत्रित करने में मिली असफलता का भी उल्लेख किया। सुनक का मानना है कि इन विफलताओं के कारण देश में कई तरह की नई समस्याएं और चुनौतियां पैदा हुई हैं, जिनका समाधान किया जाना आवश्यक है।

राष्ट्रीयता और त्वचा के रंग का संबंध

सुनक ने एक और गंभीर खतरे की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि यह एक बड़ा खतरा है कि हम त्वचा के रंग को राष्ट्रीयता से जोड़ने लगें। उन्होंने चेतावनी दी कि हमें ब्रिटेन के लोगों के अलग-अलग वर्ग बनाने से बचना चाहिए। सुनक ने तर्क दिया कि ऐसा माहौल बन रहा है जहां हाल ही में आए लोगों को कभी भी उतना ब्रिटिश नहीं माना जाता, जितने कि वे लोग हैं जो 1707 से यहां रह रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह भेदभाव तब भी बना रहता है जब नए लोग समाज में पूरी तरह घुल-मिल गए हों और वे कितने ही बड़े देशभक्त क्यों न हों।

टेबिट टेस्ट की आलोचना

अपने लेख में सुनक ने 'टेबिट टेस्ट' का भी विशेष रूप से जिक्र किया। इस टेस्ट की शुरुआत अप्रैल 1990 में टोरी सांसद नॉर्मन टेबिट द्वारा की गई थी। उस समय टेबिट का तर्क था कि यदि प्रवासी लोग इंग्लैंड की क्रिकेट टीम के बजाय अपने मूल देश की टीम का समर्थन करते हैं, तो यह ब्रिटिश समाज में उनके न घुलने-मिलने और देश को न अपनाने का संकेत है और सुनक ने इस पुराने विचार की समीक्षा करते हुए आज की स्थिति पर अपनी राय रखी।

उल्टा टेबिट टेस्ट और भेदभाव

सुनक ने कहा कि टेबिट टेस्ट की आलोचना के बावजूद, वह एक ऐसा टेस्ट था जिसे कोई भी व्यक्ति इंग्लैंड का समर्थन करके पास कर सकता था। लेकिन अब एक 'उल्टा टेबिट टेस्ट' (reverse Tebbit test) देखने को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में यदि आप गोरे नहीं हैं, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप क्रिकेट में किसका समर्थन करते हैं, आपको यह महसूस कराया जाता है कि आप कभी अंग्रेज नहीं हो सकते और सुनक के अनुसार, किसी भी गैर-गोरे व्यक्ति के लिए इस 'उल्टे टेबिट टेस्ट' को पास करना नामुमकिन है क्योंकि यह सीधे तौर पर रंग को पहचान से जोड़ देता है।

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